Bihar 2.0: बिहार में आएगी उद्योग की बहार और रोजगार! क्या कर रही डबल इंजन सरकार?
Bihar Industrial Boom: जिनका बचपन 90 के दशक से पहले बीता है उन्हें याद होगा। प्राइमरी कक्षा में एक किताब हुआ करती थी "बिहार वैभव" जिसमें ऐतिहासिक विरासत के अतिरिक्त पढ़ाया जाता था बिहार के भौगोलिक संसाधन और उद्योग-धंधे। उसी किताब में बच्चे पढ़़ते थे बरौनी का तेलशोधक कारखाना, उर्बरक कारखाना, थर्मल पावर, सिंदरी का सिमेंट कारखाना, ड़ालमिया नगर का रोहतास सुगर मिल्स और बिस्किट फैक्ट्री, मढ़ौरा का मॉर्टन टॉफी, हायाघाट का अशोक पेपर मिल, समस्तीपुर का ठाकुर पेपर मिल, रामेश्वर जूट मिल, मुज़फ्फरपुर का सूतापट्टी, मोकामा में बाटा शू फैक्ट्री और ऐसे अनेक उद्योग-व्यापार।
मेरा बचपन जिस शहर में बीता वहां था रामेश्वर जूट मिल। जूट मिल का सायरन हमें बखूबी याद है। उसी से हमारी सुबह होती थी। टिफिन का डब्बा साइकिल से लटकाए लोगों का हुजूम दिखता था फैक्ट्री की ओर जाते हुए। जूट मिल के कैंपस में आवासीय कॉलोनी भी बनी हुई थी। बिजली, पानी, डिस्पेंसरी सब कुछ उपलब्ध था। करीब ही रेलवे स्टेशन बनाया गया 'मुक्तापुर' जहां से जूट का उत्पाद रेल से भेजा जाता था।

दरअसल उद्योग केवल प्रत्यक्ष ही नहीं अप्रत्यक्ष रोजगार भी सृजन करते हैं। जैसे जूट मिल के पास परचून, किराना, चाय-नाश्ते की दुकानें, इलेक्ट्रिशियन, पलंबर, साइकिल रिपेयर करने वाले और ऐसे अनेक पेशेवर भी बसे हुए थे। आजीविका के लिए उन्हें देश-परदेस में भटकना नहीं पड़ता था।
फिर आया नब्बे का दशक। बिहार में तथाकथित सामाजिक न्याय की सरकार आई। पूंजीवाद के विरोध के नाम पर अराजकता को बढ़़ावा मिला। स्थानीय उद्योग को न मूलभूत सुविधाएं मिलती हैं ना आवश्यक संरक्षण। राजनीति के साये में पलता बेलगाम अपराध और बेखौफ अपराधियों का सॉफ्ट टार्गेट बने बिहार के उद्योग। फिर एक-एक कर नीजि उद्योगों का पलायन शुरू हो गया और राजकीय उपक्रम सरकारी उपेक्षा के शिकार होते गए। दर्ज़नों शुगर मिल, जूट मिल, पेपर मिल सब बंद हो गए।
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अशोक पेपर मिल - एक केस स्टडी
यह समझने के लिए कि कैसे सरकारी अमले की लापरवाही बिहार में उद्योग व्यवसाय की बदहाली का कारण बनी, आइए एक नज़र ड़ालते हैं हायाघाट के अशोक पेपर मिल की यात्रा पर-
- अशोक पेपर मिल की स्थापना 1958 में दरभंगा महाराज ने की थी। राज दरभंगा के भरोसे पर स्थानीय किसानों ने मिल के लिए जमीन दिया।
- प्राइवेट मैनेजमेंट के अधीन तीन दशक चलने वाला यह पेपर मिल क्षेत्र में पेपर की अच्छी गुणवत्ता के लिए जाना जाता था।
- साल 1989 में मिल का मालिकाना हक बिहार सरकार को सौंपा दिया गया, लेकिन 1990 तक सरकार ने मिल पर नियंत्रण नहीं लिया।
- मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा और सर्वोच्च न्यायाल ने बिहार सरकार के उद्योग विभाग के सचिव को निर्देश दिया कि अशोक पेपर मिल को फिर से चालू करने की योजना प्रस्तुत करें।
- 6 साल के बाद बिहार सरकार ने 1996 में कोर्ट में ड्राफ्ट प्रस्तुत करते हुए निजीकरण की सिफ़ारिश की जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। याद कीजिए 1996 में बिहार में वो सरकार थी, जो आज नीजिकरण का विरोध करती है।
- 1997 में आईडीबीआई बैंक मर्चेंट बैंकर बनी और सौदा मुंबई की नुवो कैपिटल एंड फ़ाइनेंस लिमिटेड के मालिक धरम गोधा को मिल गया। मतलब बिहार के एक उद्योग का मालिकाना हक मुंबई चला गया।
- जल्द ही यह मिल भी कई अन्य की तरह प्रदेश में बदहाल कानून-व्यवस्था, इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी की भेंट चढ़ गई।
- आखिरकार नवंबर 2003 से यह मिल पूरी तरह से ठप हो गया। अब तो मिल की बिल्डिंग भी खंडहर में बदल चुकी है।
दरअसल, प्रदेश में उद्योग-व्यवसाय की दयनीय स्थिति सिर्फ संसाधनहीनता के कारण नहीं बल्कि उस मानसिक दिवालिएपन की वजह से भी हुई, जिसमें भविष्य को लेकर कोई रूपरेखा नहीं थी। मंडल और कमंडल के नाम पर सिर्फ लोगों को भुलावा देने वाला मस्खरापन था। याद कीजिए उस समय के रहनुमा कैसे आधुनिक तकनीक का मज़ाक उड़ाते हुए कहते थे, "कंप्यूटर से दूध निकलेगा क्या?"
एक वक्त था जब यह तानाकशी बिहार की नियति मानी जाती थी। उद्योग से वंचित, अवसरों से महरूम, एक ऐसा राज्य, जहां युवाओं के पास रोजी-रोटी की तलाश में पलायन के सिवा कोई चारा नहीं था। डेढ़ दशक के लालू-राबड़ी युग के बाद बिहार की सत्ता में आई भारतीय जनता पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड) की गठबंधन सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी, उद्योग-व्यवसाय को पुनः पटरी पर लाना।
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उपहास के बाद उम्मीद की किरण?
भाजपा-जदयू सरकार के शुरुआती वर्ष तो कानून-व्यवस्था, इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक जगत का भरोसा बहाल करने में निकल गए। इस मामले में एक और कठिनाई थी, केंद्र-राज्य समन्वय। काफी समय तक बिहार और केंद्र में अलग-अलग पार्टी और गठबंधन की सरकारें ही थी।
व्यावहारिक तौर पर देखें, तो 2014 में केंद्र में मोदी सरकार आने के तीन वर्ष बाद नीतीश जी की घरवापसी हुई और पहली बार ये संयोग बना कि केंद्र और राज्य दोनों जगह राजग सरकार थी, यानि कि डबल इंजन की सरकार। पिछले कुछ वर्षों में बिहार ने उल्लेखनीय कदम उठाए हैं।
भाजपा-जदयू गठबंधन सरकार उद्योग-बहाली, इंफ्रास्ट्रक्चर और रोजगार को लेकर कितना गंभीर है, ये समझने के लिए इस दिशा में सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की समीक्षा करनी होगी। आइए देखते हैं डबल इंजन की सरकार ने आखिर पिछले कुछ वर्षों में किया क्या है...
बिहार औद्योगिक निवेश संवर्धन नीति
सरकार 2016 में "बिहार औद्योगिक निवेश संवर्धन नीति" का प्रारूप लेकर आई, जिसने राज्य में निवेश के लिए अनुकूल माहौल बनाने की दिशा में पहला कदम उठाया। इस नीति का मुख्य लक्ष्य था, राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में उद्योग का योगदान 25% और प्रति वर्ष 15% से अधिक औद्योगिक विकास दर हासिल करना। इसके लिए सरकार ने फुड प्रोसेसिंग, पर्यटन, लघु मशीन निर्माण, आईटी, वस्त्र, चमड़ा और रिन्युएवल एनर्जी जैसे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान की।
बिहार सरकार द्वारा अगस्त 2025 में स्वीकृत "बिहार औद्योगिक निवेश संवर्धन पैकेज" इस दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। 40 करोड़ रुपये की ब्याज सब्सिडी और मुफ्त भूमि आवंटन देने वाले इस पैकेज की मुख्य विशेषताओं पर एक नज़र:-
- 100 करोड़ रुपये से अधिक निवेश और 1000 से ज़्यादा प्रत्यक्ष रोजगार देने वाली इकाइयों को 10 एकड़ तक मुफ्त भूमि
- 1000 करोड़ रुपये से अधिक निवेश वाली परियोजनाओं के लिए 25 एकड़ तक भूमि
- फॉर्च्यून 500 कंपनियों के लिए 10 एकड़ मुफ्त भूमि
- 14 वर्षों तक 300% एसजीएसटी प्रतिपूर्ति
बिहार बिजनेस कनेक्ट
बिहार बिजनेस कनेक्ट 2024 शिखर सम्मेलन के परिणाम सरकार के नई सोच का प्रमाण हैं। कुल 1.81 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए, जो पिछले वर्ष के 53,000 करोड़ रुपये से तिगुना अधिक है। यह वृद्धि रिन्युएवल एनर्जी, मैनुफैक्चरिंग, फुड-प्रोसेसिंग, आईटी और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्रों में दिखी है। पिछले दो वर्षों में बिहार को 12,000 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव मिले हैं, जो 2,500 करोड़ रुपये के पिछले रिकॉर्ड से काफी अधिक है।
एनर्जी सेक्टर में सरकार की पहल
राष्ट्रीय हाइड्रो पावर कॉर्पोरेशन (एनएचपीसी) द्वारा 5,500 करोड़ रुपये के निवेश से 1,000 मेगावाट सौर ऊर्जा क्षमता का विकास, फ्लोटिंग सोलर प्रोजेक्ट्स, बैटरी स्टोरेज और ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन सुविधाओं की स्थापना से लगभग 800 नौकरियां सृजित हो रही हैं। यह परियोजना बिहार को हरित ऊर्जा के क्षेत्र में अग्रणी राज्य बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
कपड़ा उद्योग की संभावनाएं और विकास
बिहार का वस्त्र उद्योग तेजी से विकसित हो रहा है। पटना, मुजफ्फरपुर, दरभंगा और भागलपुर को अपैरल हब बनाने पर काम किया जा रहा है, जिससे भारी पैमाने पर रोजगार मिलने और ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं में नई जान आने की संभावना है। 2020 से 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार वस्त्र उद्योग की उपलब्धियां:-
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ऑपरेशनल अपैरल यूनिट: 12 से बढ़़कर 40+ (230% वृद्धि)
- सृजित नौकरियां: 2,500 से बढ़़कर 15,000+ (500% वृद्धि)
- महिला भागीदारी: 30% से बढ़कर 50%
- औसत ऑपरेटर वेतन: ₹8,000-10,000 से बढ़कर ₹10,000-12,000 (25% वृद्धि)
- 2005 से 2020 के बीच बिहार के 8 लाख से अधिक युवाओं को सरकारी नौकरियां मिलीं। वर्तमान में, लगभग 5.16 लाख युवाओं को पहले से ही सरकारी नौकरियां मिल चुकी हैं।
- 2020 के बाद से राज्य ने लगभग 7.24 लाख सरकारी नौकरियां दी है, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर बिहार रोजगार सृजन में एक महत्वपूर्ण भागीदार बन गया है। ई-श्रम पोर्टल के अनुसार, 2.9 करोड़ लोग अभी भी रोजगार की तलाश में प्रदेश से बाहर रह रहे हैं, लेकिन यह संख्या लगातार घट रही है।
- प्रदेश सरकार ने 2025-2030 के लिए 1 करोड़ युवाओं को सरकारी नौकरी और रोजगार के अवसर प्रदान करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। "सात निश्चय - 2.0" योजना के तहत सरकार ने अपना प्रारंभिक लक्ष्य 10 लाख सरकारी नौकरियों और 10 लाख रोजगार के अवसरों से बढ़ाकर 12 लाख सरकारी नौकरियां और 38 लाख अन्य रोजगार के अवसर कर दिया है।
- कौशल विकास को बढ़़ावा देने के लिए जननायक कर्पूरी ठाकुर स्किल यूनिवर्सिटी की स्थापना की जा रही है। यह विश्वविद्यालय युवाओं को स्वरोजगार के अवसरों से जोड़ने के लिए कौशल विकास प्रशिक्षण देगा।
- मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत प्रति परिवार एक महिला को सितंबर में छोटा व्यवसाय शुरू करने के लिए 10,000 रुपये मिलेंगे। छह महीने बाद, प्रदर्शन के आधार पर अतिरिक्त 2 लाख रुपये की सहायता प्रदान की जाएगी।
- इन उपलब्धियों के बावजूद कुछ गुंजाइश अभी बाकी है। जैसे कि औद्योगिक बिजली की लगातार सप्लाई, प्रशिक्षण और अपस्किलिंग, परिवहन इंफ्रास्ट्रक्चर वगैरह। बिहार औद्योगिक बहार के लिए ये कार्यक्रम सरकार को अपनी प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर रखना चाहिए।
भागलपुर अपैरल फैक्टरी की केस स्टडी इस सफलता का उदाहरण है। 200 एडवांस सिलाई मशीनों की क्षमता वाली यह फैक्टरी पहले चरण में 500 से अधिक स्थानीय नौकरियां सृजित कर रही है, जिसमें 60% महिला कार्यरत हैं।
निजी उद्योगों के रुझान
अडानी समूह ने बिहार में 20,000 करोड़ रुपये की लागत से 1,600 मेगावाट अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल कोल-फायर्ड पावर प्लांट की स्थापना का लक्ष्य रखा है, जिससे करीब 1,500 स्थायी नौकरियां और 12,000 अस्थाई रोजगार की संभावना है। यह परियोजना न केवल राज्य की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाती है, बल्कि हजारों परिवारों को प्रत्यक्ष आजीविका से जोड़ती है।
बेगूसराय में पेप्सिको की 550 करोड़ रुपये की बॉटलिंग प्लांट (अतिरिक्त 220 करोड़ रुपये के विस्तार के साथ) बरौनी टाउनशिप में 50 एकड़ में फैली है और 16.22 मिलियन बोतलकेसेस की वार्षिक उत्पादन क्षमता के साथ 500 से अधिक प्रत्यक्ष रोजगार के अवसर सृजित कर रही है। यह परियोजना दिखाती है कि कैसे बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब बिहार को इंवेस्टमेंट डेस्टिनेशन के रूप में देख रही हैं।
सरकारी क्षेत्र में रोजगार
भविष्य की तैयारी
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