Bihar Election: नीतीश कुमार ने सवर्ण आयोग बना एक ही तीर से साधे कई निशान, तेजस्वी-कन्हैया को दी टेंशन

Bihar Election: बिहार विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उच्च जाति आयोग बनाकर बड़ा दांव चला है। राज्य में अल्पसंख्यक आयोग गठन के फैसले के अगले ही दिन उन्होंने उच्च जाति आयोग के गठन का ऐलान कर दिया। राजनीति के जानकार इसे सोच-समझकर खेला गया दांव बता रहे हैं। इस आयोग के गठन से उन्होंने सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की अपनी मंशा समझाने की कोशिश की है। हालांकि, एक ही तीर से उन्होंने तेजस्वी यादव और कन्हैया कुमार जैसे युवा नेताओं को भी बड़ी चोट पहुंचा दी है। समझें नीतीश ने एक तीर से कैसे कई समीकरण साधे हैं।

नीतीश कुमार को चुनावी राजनीति के धुरंधर नेताओं में शुमार किया जाता है। उनके आलोचक और समर्थक दोनों ही यह बात मानते हैं कि नीतीश समय के साथ बदलने और चुनावी मूड भांपने में माहिर हैं। युवाओं के बीच तेजस्वी, कन्हैया कुमार और गठबंधन के ही चिराग पासवान जैसे विकल्पों और खास तौर पर सवर्णों के वोट छिटकने की आशंका को देखकर उन्होंने बड़ा दांव चल दिया है।

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Bihar Election में नीतीश के एक दांव ने युवा नेताओं को किया चित

बिहार के जातीय समीकरणों की बात करें तो सवर्ण जातियों का प्रतिशत (ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत, कायस्थ) लगभग 15 फीसदी है। तेजस्वी यादव का मुख्य वोट बैंक MY (मुसलमान और यादव) समीकरण है। दूसरी ओर कांग्रेस भी इस बार अपना प्रचार युवाओं और महिलाओं पर फोकस करने की कोशिश में थी। तेजस्वी की भी कोशिश अपने इस समीकरण में युवा और महिलाओं को जोड़ने की थी। पिछले चुनाव में सवर्णों के कुछ हिस्से और खास तौर पर युवाओं में बीजेपी और जेडीयू से नाराजगी देखी गई थी। ऐसे वक्त में नीतीश ने सवर्ण आयोग बनाकर अपने गठबंधन के वोट बैंक को एकजुट करना सुनिश्चित कर दिया है। इसके साथ ही उन्होंने तेजस्वी और कन्हैया के युवा वोटरों में सेंधमारी करने के इरादों पर भी पानी फेरने का काम किया है।

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पप्पू यादव की महत्वाकांक्षाओं का क्या होगा?

बिहार विधानसभा चुनाव की बात हो, तो पप्पू यादव का जिक्र जरूरी हो जाता है। पप्पू यादव खुद को यादव समुदाय के सर्वमान्य नेता के तौर पर पेश करना चाहते हैं, लेकिन राजद में रहते हुए उनकी यह महत्वाकांक्षा पूरी नहीं हो सकती थी। कांग्रेस में भी वह गए, लेकिन सारे विकल्प आजमाने के बाद भी उनके हाथ कुछ नहीं लगा और आखिरकार उन्हें वोकसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उतरना पड़ा। इंडिया गठबंधन में रहते हुए कांग्रेस आरजेडी और लालू परिवार को असहज नहीं करना चाहती है। पप्पू यादव के पास अपना एक कल्ट व्यक्तित्व जरूर है, लेकिन चुनावी मशीनरी के लिहाज से पर्याप्त संगठन नहीं है। ऐसे में इस विधानसभा चुनाव में उनकी रही-सही संभावनाओं पर भी नीतीश कुमार ने पानी फेर दिया है।

PK के लिए भी नीतीश कुमार ने बढ़ाई मुश्किलें

प्रशांत किशोर बिहार को जातिवादी राजनीति के चश्मे से मुक्त करने का दावा करते हैं, लेकिन फिलहाल चुनावी समीकरणों में जाति का खेल अहम नजर आ रहा है। पीके खुद भी सवर्ण जाति से आते हैं और एनडीए से नाराज युवा और सवर्ण वोट उनकी पार्टी को मिल सकते थे। अब नीतीश कुमार ने चुनाव से ठीक पहले सवर्ण आयोग बनाकर पीके के लिए भी मुश्किलें बढ़ाने का ही काम किया है।

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