Bihar Chunav: आरजेडी कैंडिडेट्स लिस्ट में MY का दम, 143 में से 51 यादव, कितने सवर्णों को दिया टिकट?
Bihar Chunav RJD Candidates List: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने अपने परंपरागत 'MY समीकरण' (मुस्लिम-यादव) पर दांव लगाया है। बिहार की आबादी में भी इस वर्ग का तकरीबन 25 फीसदी से ज्यादा का हिस्सा है। मुस्लिम और यादव वोट बैंक करीब 40 से ज्यादा सीटों पर चुनाव नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। यही देखते हुए तेजस्वी याादव ने इस बार सबसे बड़ा दांव भी इसी वर्ग के वोट बैंक पर लगाया है। पार्टी ने 143 सीटों में से 51 यादव उम्मीदवार उतारे हैं।
बिहार विधानसभा चुनाव में इस बार आरजेडी 143 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। इसमें सबसे ज्यादा 51 सीटें यादव उम्मीदवारों को दी गई हैं। माना जा रहा है कि यह फैसला पार्टी के कोर वोट बैंक को मजबूत करने और मैदान में जातीय संतुलन बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा है।

RJD ने मुस्लिम और यादव वोट बैंक पर लगाया दांव
⦁ तेजस्वी यादव के नेतृत्व में आरजेडी ने इस बार युवाओं और सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखकर टिकट बंटवारा किया है। यादव उम्मीदवारों के अलावा, पार्टी ने 19 टिकट मुस्लिम कैंडिडेट्स को दिए हैं।
⦁ सवर्ण समाज के उम्मीदवारों की संख्या बेहद सीमित रखी गई है। 14 सवर्ण उम्मीदवारों को टिकट दिए हैं, जिनमें राजपूत, भूमिहार और ब्राह्मण समुदाय से कुछ नाम शामिल हैं।
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⦁ एनडीए के वोट बैंक में सेंधमारी के लिए कुशवाहा जाति से आने वाले 11 उम्मीदवारों को उतारा है। इसके अलावा, उम्मीदवारों का चयन करते हुए क्षेत्र के जातीय और सामाजिक समीकरणों का ध्यान रखा गया है।
⦁ राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि आरजेडी का यह कदम उसके पारंपरिक वोट बैंक को एकजुट करने का प्रयास है। 2020 के चुनाव में भी आरजेडी ने यादव और मुस्लिम वर्ग पर केंद्रित रणनीति अपनाई थी, जिससे पार्टी को काफी फायदा मिला था।
Bihar Chunav में MY फैक्टर का दिख सकता है असर
बिहार के जातीय और सामाजिक समीकरण को देखें, तो प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम और यादव एक बड़ा वर्ग हैं। लालू यादव के राजनीतिक जीवन की सफलता में इन दोनों वर्ग का खास स्थान रहा था। हालांकि, 2005 के बाद यादव और मुस्लिम वोट बैंक के दम पर पार्टी सत्ता में अब तक अपने दम पर वापसी नहीं कर पाई है। इसकी एक बड़ी वजह ओबीसी की अन्य जातियों, दलितों और महादलितों का वोट नीतीश कुमार और एनडीए के खाते में जाना भी रहा है। शहरी और सवर्ण वोटर आज भी मजबूती से बीजेपी के साथ हैं। अब देखना है कि इस चुनाव में इस सोशल इंजीनियरिंग का असर कितना होता है।
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