Bihar Chunav Kissa CM Ka: बिहार के वो सीएम जिन्होंने बैलगाड़ी की यात्रा कर जुटाया था 1 लाख का चंदा

Bihar Chunav Kissa CM Ka: बिहार विधानसभा चुनाव की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है राजनीतिक बयानबाजियों का दौर भी तेज हो गया है। दिग्गज नेता एक-दूसरे पर रोज ताबड़तोड़ हमले कर रहे हैं। सियासत के लिहाज से बिहार हमेशा ज्वलंत प्रदेश रहा है और यहां से कई अहम आंदोलन भी हुए हैं। जयप्रकाश नारायण हों या बिहार के पहले सीएम श्री बाबू, इन्होंने अपने राजनीतिक कद से देश को दिशा दिखाने का काम किया है।

एक दौर ऐसा भी था जब इस प्रदेश के नेताओं ने राजनीतिक गरिमा और शुचिता के लिहाज से पूरे देश को दिशा दी थी। ऐसा ही एक किस्सा प्रदेश के बड़े सियासी चेहरे और गांधी जी के खास सहयोगियों में से एक रहे दीप नारायण सिंह का है।

Bihar Chunav Kissa CM Ka

दीप बाबू का जीवन आज भी आदर्श

दीप नारायण सिंह ने प्रदेश में बतौर वित्त मंत्री और मुख्यमंत्री अपनी सेवाएं दीं। हालांकि, सीएम के तौर पर उनका कार्यकाल सिर्फ 1 फरवरी 1961 से 18 फरवरी 1961 तक ही रहा था। आजादी से पहले उन्होंने प्रदेश में स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत करने में अहम योगदान दिया था। दीप नारायण सिंह को प्यार से दीप बाबू कहा जाता है। अपने जीवनकाल में उन्होंने प्रदेश में शिक्षा और समाज सुधार के लिए काफी काम किया था।

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Bihar Chunav Kissa CM Ka: जुटाया था एक लाख का चंदा

दीपनारायण सिंह ने लंदन से कानून की शिक्षा ली थी और वहां से लौटकर स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया। 1920 में वह महात्मा गांधी से पहली बार मिले और उसके बाद आजीवन उनके बताए पथ पर ही चलते रहे। स्वराज फंड के लिए जब चंदा जुटाने की बात आई, तो दीप बाबू ने अभूतपूर्व काम किया था। उन्होंने बिहार के अलग-अलग हिस्सों में बैलगाड़ी पर बैठकर चंदा जुटाया। उनके व्यक्तित्व और विचारों से लोग इस कदर प्रभावित हो जाते थे कि तुरंत अपनी सामर्थ्य के मुताबिक चंदा देने लगते थे। यही वजह है कि आजादी से पहले भीषण गरीबी के दिनों में भी लोगों ने स्वराज फंड के लिए बढ़-चढ़कर योगदान दिया। उन्होंने एक लाख रुपये का चंदा जमा किया था।

महात्मा गांधी से भी थे करीबी रिश्ते

महात्मा गांधी से दीपनारायण सिंह की निकटता का अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि भागलपुर आने पर बापू उनके घर पर ही ठहरते थे। 1930 के नमक सत्याग्रह के दौरान जब डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद को जब गिरफ्तार किया गया था, तो उन्होंने मिशन आगे ले जाने की जिम्मेदारी दीप बाबू को सौंपी थी। इस दौरान सत्याग्रह को आगे ले जाने के लिए उन्होंने पटना, आरा और बक्सर की यात्रा की थी। उन्हें इस आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए दिल्ली से गिरफ्तार भी किया गया था।

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13 साल की उम्र से ही जुड़ गए थे स्वाधीनता आंदोलन से

-दीपनारायण सिंह का जन्म 26 जनवरी 1875 को भागलपुर जिले के जमींदार तेजनारायण सिंह के घर में हुआ था। जमींदार परिवार से ताल्लुक रखने के बावजूद उनका परिवार राष्ट्रसेवा से जुड़ा हुआ था। दीप बाबू भी पिता के साथ ही बचपन से कांग्रेस के कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे।

-13 साल की उम्र में उन्होंने अपने पिता के साथ 1888 में इलाहाबाद अधिवेशन में भाग लिया था। कम उम्र से ही वह देश के लिए आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए। स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद वह लंदन गए थे और वहां से उन्होंने कानून की पढ़ाई की।

-1905-06 में वह अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य बने थे। 1906 से 1910 तक बिहार के लगभग सभी प्रांतीय सम्मेलनों की अध्यक्षता की थी।

-1909 में उन्हें बिहार प्रांतीय कांग्रेस कमेटी का सचिव बनाया गया था। 1928 में बिहार कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष भी बने।

-उन्होंने अपनी पूरी संपत्ति दान कर दी थी और अपनी संपत्ति के एक हिस्से से विद्यालय और अनाथालय की स्थापना की थी।

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