Bihar Chunav Kissa CM Ka: मुख्यमंत्री बनने से पहले ही बन गए थे 'प्रधानमंत्री', नेहरू को दी थी सीधी चुनौती
Bihar Chunav Kissa CM Ka: बिहार का सियासी पारा इन दिनों काफी ऊपर है और चुनावी संग्राम के औपचारिक ऐलान के बाद सभी दलों के नेता जमकर चुनाव प्रचार कर रहे हैं। सियासत के लिहाज से यह सूबा हमेशा दिलचस्प रहा है। आपातकाल में जेपी का आंदोलन हो या फिर आजादी की लड़ाई, बिहार से ही निर्णायक संग्राम शुरू हुए हैं। यही वजह है कि इस प्रदेश को आंदोलनों की भूमि भी कहा जाता है। इस प्रदेश के सीएम भी हमेशा चर्चा में रहे हैं और देश के राजनीतिक पटल पर उनकी अलग पहचान रही।
आज बात करते हैं बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉक्टर श्रीकृष्ण सिंह थे जिन्हें जनता ने प्यार से श्री बाबू का सम्मान दिया था। आजादी के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के बाद वह बिहार के पहले मुख्यमंत्री बने थे। उन्हें प्रदेश के आधुनिकीकरण का श्रेय दिया जाता है। बरौनी में उर्वरक फैक्ट्री लगाना हो या बिहार में उद्योग-धंधों का विकास, श्री बाबू के नेतृत्व में ही प्रदेश को कई बड़ी सौगात मिलीं।

Bihar Chunav Kissa CM Ka: मुख्यमंत्री से पहले बने थे प्रधानमंत्री
श्री बाबू कभी देश के प्रधानमंत्री नहीं बन सके, लेकिन उनके नाम यह दिलचस्प रिकॉर्ड है कि सीएम बनने से पहले वह पीएम भी बन गए थे। दरअसल साल 1935 में भारत सरकार अधिनियम (Government of India Act 1935) लागू हुआ था। इसके तहत राज्यों को सीमित स्वायत्तता दी गई थी। इस एक्ट के तहत राज्यों में चुनाव हुए और सूबे के मुखिया को प्रधानमंत्री कहा गया था। 1937 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी ने बिहार में बड़ी जीत हासिल की और श्री कृष्ण सिंह को सर्वसम्मति से सरकार का मुखिया चुना गया। बिहार के प्रधानमंत्री के तौर पर उन्होंने इस पद पर 1939 तक काम किया। इस तरह से वह सीएम बनने से पहले पीएम बन गए थे। हालांकि, आजादी के बाद नई व्यवस्था शुरू हुई और बिहार के वह पहले मुख्यमंत्री बने।
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Bihar को आधुनिकीकरण से जोड़ने के लिए किए जाते हैं याद
श्री बाबू को आधुनिक बिहार का निर्माता कहा जाता है। आजादी के बाद देश मुश्किल दौर से गुजर रहा था और इसे देखते हुए उन्होंने वक्त की नब्ज पकड़ी। श्री बाबू समझ गए थे कि सिर्फ कृषि और कुछ सरकारी नौकरियों के भरोसे प्रदेश का विकास संभव नहीं है। बिहार की तरक्की के लिए उद्योग धंधों का विकास और रोजगार के अवसर बनाने होंगे।
केंद्र सरकार बिहार में रिफाइनरी नहीं देना चाहती थी, लेकिन श्री बाबू की जिद और प्रयासों की वजह से बिहार में रिफाइनरी लगी। वह अपनी ही सरकार और पीएम पंडित जवाहर लाल नेहरू के खिलाफ अनशन पर बैठ गए। उनकी कोशिशों का नतीजा रहा कि बरौनी रिफाइनरी बिहार को मिली। बरौनी में उर्वरक फैक्ट्री भी आई और कई और फैक्ट्रियां खुलीं। हालांकि, बिहार के बंटवारे के बाद इनमें से कई फैक्ट्रियां झारखंड में चली गईं।
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बाबाधाम मंदिर में कराई थी दलितों की एंट्री
श्री बाबू को बिहार में जमींदारी प्रथा को खत्म करने का भी श्रेय आता है। भूमिहार जाति से आने के बावजूद वह जाति-प्रथा और सामाजिक भेदभाव के सख्त खिलाफ थे। श्री बाबू ने खुद देवघर के प्रसिद्ध बाबाधाम मंदिर में साथ जाकर दलित श्रद्धालुओं का प्रवेश शुरू करवाया था। उनकी इस मुहिम का सवर्ण जातियों ने कड़ा विरोध भी किया था। देवघर के पंडों ने इसका भारी विरोध किया, लेकिन श्री बाबू टस से मस नहीं हुए और मंदिर में दलितों के प्रवेश को मान्यता देकर ही माने। श्री बाबू राजनीति में परिवारवाद को बढ़ावा देने के सख्त खिलाफ थे और समाज में शिक्षा की जागृति पर बहुत ज़ोर देते थे।
चुनाव के दौरान नहीं करते थे अपने क्षेत्र में प्रचार
श्री बाबू का मानना था कि नेता को अपने निर्वाचन क्षेत्र में समय बिताना चाहिए और जनता से सीधे संवाद करना जरूरी है। वह सीएम रहते हुए पूरे बिहार का दौरा करते थे, लेकिन खास तौर पर अपने निर्वाचन क्षेत्र में जरूर जाते थे। श्री बाबू का कार्यकर्ताओं और आम जनता से ऐसा संवाद था कि अक्सर वह अपने कार्यकर्ताओं को उनके नाम से जानते थे।
उन्होंने यह नियम बनाया था कि चुनाव के दौरान क्षेत्र का दौरा वोट मांगने के लिए नहीं करना है। बाकी समय वह खूब दौरा करते थे। श्री बाबू का जीवन सादगी और शुचिता की मिसाल थी। राजनीति में रहते हुए उन्होंने कभी परिवार के लिए संपत्ति बनाने का काम नहीं किया। उन्होंने बेहद सादगी के साथ अपनी पूरी जिंदगी बिताई। श्री बाबू का जीवन इस लिहाज से मिसाल है।
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