बिहार में पहली बार 1970 में लागू हुई थी शराबबंदी, चुनावी सरगर्मी के बाच जानिए जन-नायक कर्पूरी ठाकुर की कहानी
Legacy of Karpoori Thakur: बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक है। चारों ओर चुनाव की तैयारियां जोरों पर हैं। राजनीतिक दलों की ओर से मुख्यमंत्री फेस का ऐलान भी हो चुका है। इसी के बीच हम आपको लेकर चल रहे हैं बिहार के उन मुख्यमंत्रियों की दुनिया में, जिन्होंने राज्य की राजनीति और समाज पर गहरी छाप छोड़ी। आज हम बात करेंगे बिहार के 11वें मुख्यमंत्री, जन-नायक कर्पूरी ठाकुर की।
कर्पूरी ठाकुर दो बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनके कार्यकाल लंबे नहीं रहे। इसके बावजूद उन्होंने शिक्षा और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में कई नए प्रयोग किए। कर्पूरी ठाकुर ने अंग्रेजी को अनिवार्य विषय से हटाया और राज्य में पहली बार शराबबंदी की घोषणा की। उनकी दूरदर्शिता और जनता के प्रति सच्ची निष्ठा के कारण उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

कर्पूरी ठाकुर का जन्म और बचपन
कर्पूरी ठाकुर का जन्म 24 जनवरी 1924 को समस्तीपुर जिले के पितौंझिया गांव में हुआ। आज यह गांव कर्पूरी ग्राम के नाम से जाना जाता है। उनके पिता गोकुल ठाकुर नाई थे और जन्म के समय उनके पास अपने बेटे के लिए गर्म कपड़े तक नहीं थे। जन्म के बाद कर्पूरी को मां के पास सूखी खास में लिटा दिया गया। कहा जाता है कि एक साधु उनके घर आए और नवजात कर्पूरी को देखकर भविष्यवाणी की कि यह बच्चा बड़ा आदमी बनेगा।
कर्पूरी की छह बहनें और एक भाई कभी स्कूल नहीं गए, लेकिन उन्होंने पढ़ाई के लिए जिद की और पिता से स्लेट और चूने के टुकड़े मांग लिए। पिता शुरू में उन्हें नाई का काम सीखने के लिए प्रेरित कर रहे थे, लेकिन बाद में कर्पूरी का नाम गांव के स्कूल में दर्ज कर दिया गया।
8 साल की उम्र में शादी, शिक्षा का संघर्ष
कर्पूरी की शादी महज 8 साल की उम्र में मुजफ्फरपुर की फुलेश्वरी देवी से हुई। तीन साल बाद 11 साल की उम्र में गौना हो गया और दोनों साथ रहने लगे। उन्होंने ताजपुर के बॉयज मिडिल इंग्लिश स्कूल से शिक्षा शुरू की और बाद में तिरहुत अकादमी में पढ़ाई की। 10वीं में पढ़ाई के दौरान, जब फीस के लिए 2 रुपये की जरूरत थी, उनके पिता ने जमींदार बच्चा सिंह से मदद मांगी। जमींदार ने पहले 27 बाल्टी पानी निकालने के बाद ही फीस देने की अनुमति दी।
कर्पूरी ने फर्स्ट डिवीजन में 10वीं पास की और अपने परिवार में यह पहला अवसर था। जमींदार के सामने पिता ने खुशी जाहिर की, लेकिन जमींदार ने सम्मान के नाम पर उन्हें अपना पैर दबाने को कहा। कर्पूरी ने इसे मान लिया लेकिन बाद में इसे अपने मन से निकाल दिया।
स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी
कर्पूरी ठाकुर ने पढ़ाई के दौरान रामधारी सिंह दिनकर, शिवपूजन सहाय और गोपाल सिंह नेपाली को पढ़ा। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने कॉलेज छोड़कर आंदोलन में भाग लिया। दरभंगा में छात्रों की बैठक में उनका भाषण लोगों को प्रेरित करने वाला रहा। बाद में वह नेपाल गए और वहां जयप्रकाश नारायण (जेपी) से मिले। उन्होंने अंडरग्राउंड आंदोलन में हिस्सा लिया और बंदूक चलाना तथा बम बनाना भी सीखा। अक्टूबर 1942 में उन्हें गिरफ्तार किया गया और 26 महीने जेल में रहे। जेल से रिहाई के बाद उन्होंने नारा दिया, "कमाने वाला खाएगा, लूटने वाला जाएगा, नया जमाना आएगा," जो गांव-गांव में फैल गया।
राजनीति में कैसे रखा कदम?
1947 में स्वतंत्रता के बाद कर्पूरी अपने गांव के स्कूल में पढ़ाने लगे, लेकिन जल्दी ही सक्रिय राजनीति में शामिल हो गए। 1952 में उन्होंने ताजपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। वे मजदूरों और वंचित वर्ग के अधिकारों के लिए लड़ते रहे। मजदूर हड़ताल का नेतृत्व करने के लिए उन्हें कई बार गिरफ्तार भी किया गया। 1970 में उन्होंने टेल्को मजदूरों के समर्थन में 28 दिन तक आमरण अनशन किया।
शिक्षा में बदलाव और पहला मुख्यमंत्री पद
1967 में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार में कर्पूरी ठाकुर उपमुख्यमंत्री बने और उन्हें शिक्षा मंत्रालय मिला। उन्होंने राज्य में अंग्रेजी को अनिवार्य विषय से हटाया। उनके फैसले के बाद जो छात्र अंग्रेजी में पास नहीं होते थे, उन्हें भी पास माना जाने लगा। इसके चलते मीडिया और विपक्ष ने इसे 'कर्पूरी डिवीजन से पास' कहकर चर्चा में रखा। 22 दिसंबर 1970 को कर्पूरी ठाकुर बिहार के 11वें मुख्यमंत्री बने। उन्होंने पहली बार राज्य में शराबबंदी लागू की।
वृद्धावस्था पेंशन और समाज कल्याण
मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपने माता-पिता से आशीर्वाद लिया। बुजुर्गों की कठिनाई समझकर उन्होंने वृद्धावस्था पेंशन योजना शुरू की। 60 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों को मासिक 10 रुपये की पेंशन देने का सिलसिला शुरू हुआ।
जनवरी 1977 में आपातकाल के बाद जनता पार्टी बनी। जून 1977 में बिहार विधानसभा चुनावों में पार्टी ने भारी जीत हासिल की। 24 जून 1977 को कर्पूरी ठाकुर दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। इस कार्यकाल में उन्होंने पहली बार बिहार में पिछड़ों के लिए आरक्षण लागू किया। महिलाओं और आर्थिक रूप से कमजोर उच्च जातियों के लिए भी आरक्षण की घोषणा की।
19 अप्रैल 1979 को विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव के कारण उनकी सरकार गिर गई। इसके बाद जून 1980 से फरवरी 1988 तक वह बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे। 17 फरवरी 1988 को उनका निधन हार्ट अटैक से हुआ।
भारत रत्न से सम्मानित
कर्पूरी ठाकुर को 2024 में मरणोपरांत भारत रत्न से नवाजा गया। उनके योगदान और समाज के प्रति समर्पण के कारण लोग आज भी उन्हें 'जन-नायक' के नाम से याद करते हैं। उनका जीवन बिहार के गरीब, पिछड़े और वंचित लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
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