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Arif Mohammed Khan: चुनाव से पहले आरिफ मोहम्मद खान को क्यों बनाया बिहार का राज्यपाल? ये 5 वजह चौंका सकती है

Arif Mohammed Khan: मंगलवार की रात जब राष्ट्रपति भवन से केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान के पटना राजभवन तबादले की खबर आई तो सियासी महकमे में सभी चौंक गए। क्योंकि, बिहार के मौजूदा राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर के मुकाबले वह राजनीति में ज्यादा जाने-माने चेहरे रहे हैं और एक ऐसा नाम हैं जो तिरुवनंतपुरम राजभवन में रहते हुए भी राष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियों में बने रहते हैं।

आरिफ मोहम्मद खान इस्लाम धर्म में सुधार और मुसलमानों की परंपराओं पर अपने प्रगतिशील विचारों के लिए मशहूर हैं। 73 वर्षीय खान खासकर मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के बहुत बड़े पैरोकार माने जाते हैं। तीन तलाक से लेकर बहू-विवाह प्रथा तक के वह कट्टर विरोधी रहे हैं। वह सितंबर 2019 से केरल के राज्यपाल के रूप में कार्यरत रहे हैं।

arif mohammed khan

Arif Mohammed Khan: 1) एनडीए के खिलाफ मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण रोकने के लिए!

वनइंडिया ने आरिफ मोहम्मद खान को बिहार तबादला किए जाने को लेकर पटना के एक वरिष्ठ पत्रकार अमरनाथ झा से बात की है। उनका कहना है कि 'पहली नजर में तो मुझे इसके पीछे यही वजह लगती है कि आने वाले चुनावों में मुसलमान एनडीए के खिलाफ आक्रामक वोटिंग न करें, यही हो सकता है।'

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वहीं एक स्थानीय बीजेपी नेता ने कहा कि 'लगता है कि यह मुस्लिम ध्रुवीकरण रोकने के लिए किया गया है। नीतीश कुमार भी मुसलमान चेहरा के माध्यम से मुस्लिम वोट बैंक में सेंधमारी करना चाहते होंगे।'

Arif Mohammed Khan: 2) आरिफ मोहम्मद खान का 'लिबरल मुस्लिम' वाला चेहरा

आरिफ मोहम्मद खान का राज्यपाल के संवैधानिक पद पर पहुंचने से पहले सक्रिय राजनीति में बहुत लंबा करियर रहा है। उन्होंने छात्र राजनीति से शुरुआत की। फिर भारतीय क्रांति दल से राजनीति में आए और कांग्रेस की सरकार में केंद्र में मंत्री भी बने। कांग्रेस के साथ-साथ बसपा के टिकट पर भी जीतकर संसद पहुंचे।

2004 में बीजेपी के साथ जुड़े, लेकिन पूरे करियर में मुस्लिम सुधारों के लिए आवाज उठाते रहे और मुस्लिम महिलाओं के लिए प्रगतिशील विचारों की पैरवी करते रहे। शाहबानो केस को लेकर उन्हें राजीव गांधी की सरकार इसीलिए छोड़नी पड़ी, क्योंकि वह एक बुजुर्ग पीड़ित मुस्लिम महिला के लिए आवाज उठाना चाहते थे, लेकिन कांग्रेस में रहते यह मुमकिन नहीं था।

राजभवन में एक मुस्लिम चेहरा होने की वजह से एनडीए को विपक्ष के तर्कों के खिलाफ भी एक हथियार भी मिल सकता है कि बीजेपी मुसलमानों की उपेक्षा करती है। उसके पास यह दलील होगी कि वह कट्टरपंथी मुसलमानों की नहीं, मुस्लिम समुदाय की प्रगति के विचारों की हिमायती है।

Arif Mohammed Khan: 3) बिहार के साथ ही यूपी भी साधने की कोशिश!

आरिफ मोहम्मद खान उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं और उनका पूरा राजनीतिक करियर प्रदेश की राजनीति से सजा और संवरा है। वह यूपी विधानसभा के भी सदस्य रह चुके हैं और कानपुर और बहराइच का कांग्रेस सांसद के रूप में और बहराइच का एक बार बसपा के एमपी के रूप में लोकसभा का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। हालांकि, 2004 में कैसरगंज से बीजेपी के टिकट पर उन्हें सफलता नहीं मिली थी।

पड़ोसी राज्य में राज्यपाल बनाकर भाजपा उत्तर प्रदेश के प्रगतिशील और सुधारवादी मुसलमानों को भी एक संदेश देना चाहती है। साथ ही साथ-साथ वक्फ बोर्ड विधेयक के मुद्दे पर विपक्ष की ओर से बनाए गए माहौल के खिलाफ इसकी एक काट भी हो सकती है।

Arif Mohammed Khan: 4) आरिफ मोहम्मद खान की खुद की भी इच्छा हो सकती है!

केरल के गवर्नर के तौर पर आरिफ मोहम्मद खान का कार्यकाल बहुत ही विवादों से भरा रहा है। मुख्यमंत्री पिनराई विजयन की अगुवाई वाली लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) की सरकार के साथ उनके अनेकों मुद्दों पर टकराव हो चुके हैं। कई मामले अदालत तक में पहुंचे हैं। वरिष्ठ पत्रकार झा ने संभावना जताई है कि 'हो सकता हो कि इस तबादले में खान की खुद की भी इच्छा रही हो'। क्योंकि,हो सकता है कि बचा हुआ कार्यकाल वह शांतिपूर्ण तरीके से पूरा करना चाहते हों।

Arif Mohammed Khan: 5) राजभवन में स्थानीय नेताओं की आसानी से एंट्री मुश्किल!

आरिफ मोहम्मद खान का व्यक्तित्व अलग है। नेताओं के लिए उन्हें आसानी से प्रभावित कर पाना मुश्किल है। निश्चित रूप से उनके तबादले में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की भी सहमति रही है।

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बीजेपी के उसी नेता ने बताया कि 'नीतीश नहीं चाहते कि राजभवन में उनके अलावा बाकी नेताओं की एंट्री आसान रहे और जो जब चाहे कोई भी राज्यपाल से समय लेकर मिल आए। इसलिए उन्हें एक ऐसा राज्यपाल चाहिए जिन तक केंद्र के अलावा उनके लिए ही पहुंच सुलभ रहे और हर कोई वहां तक आसानी से नहीं पहुंच पाए।'

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