Nitish Kumar: बिहार के मुख्यमंत्री के लिए भी BJP बनी मजबूरी! क्यों लालू के साथ जाना अब है मुश्किल? पढ़िए 5 वजह
Nitish Kumar: बिहार में अगले साल विधानसभा चुनावों के सिलसिले में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने एक ऐसी टिप्पणी कर दी कि बिहार की राजनीति में विशेष रूप से विपक्ष की ओर से भूचाल खड़ा कर दिया गया। ऐसी कयासबाजियां शुरू हुईं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नाराज हैं और फिर से लालू यादव के आरजेडी के साथ जा सकते हैं। लेकिन,हम यहां आपको वह पांच वजह बताना चाहते हैं, जिससे नहीं लगता कि जेडीयू अध्यक्ष फिर से कोई ऐसा फैसला ले सकते हैं।
दरअसल, एक टीवी इंटरव्यू में शाह से जब बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए के मुख्यमंत्री के चेहरा को लेकर प्रश्न किया गया था तो उन्होंने कहा, 'हम मिल-बैठकर निर्णय लेंगे। फैसला लेने के बाद आपको हम बताएंगे।' तब से लेकर बिहार बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल और उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी तक इसपर सफाई दे चुके हैं। चौधरी ने साफ किया है कि बिहार में नीतीश और पीएम नरेंद्र मोदी की ही अगुवाई में एनडीए चुनाव लड़ेगा।

Nitish Kumar: भाजपा भी नीतीश कुमार के लिए मजबूरी बन चुकी है!
बीजेपी के अलावा बिहार एनडीए में शामिल हिंदुस्तान आवाम मोर्चा (सेक्युलर) और एलजेपी (राम विलास पासवान) सभी ने नीतीश कुमार की अगुवाई में भरोसा जताया है। जब शाह की टिप्पणी के बाद एनडीए में एक असमंजस का माहौल बना था, तब वनइंडिया ने एक रिपोर्ट में बताया था कि बिहार में नीतीश क्यों बीजेपी के लिए मजबूरी बन चुके हैं। लेकिन, इस रिपोर्ट में हम आपको बताएंगे कि नीतीश ही बीजेपी की मजबूरी नहीं हैं, भाजपा भी नीतीश कुमार के लिए मजबूरी बन चुकी है।
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Nitish Kumar: 1) फिर से क्यों 'पलटू राम' कहलाना चाहेंगे नीतीश?
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को बार-बार पाला बदलने की वजह से उनके विरोधी उनपर 'पलटू राम' होने का तंज कसते हैं। खुद नीतीश कुमार को भी अपनी इस छवि का एहसास है। नीतीश इसी साल जनवरी में लालू यादव की आरजेडी का साथ छोड़कर वापस बीजेपी साथ आ गए थे।
पिछले सितंबर में ही उन्होंने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा की मौजूदगी में दिल्ली के एक कार्यक्रम में कहा था, 'हमारे संबंध 1990 के दशक से हैं...बिहार में जितने भी अच्छे कार्य हुए हैं, वह हमारा (एनडीए) ही किया हुआ है।'
उन्होंने राजद या लालू का बिना नाम लिए कहा, 'हमसे पहले जो सत्ता में थे, उन्होंने कुछ नहीं किया। दो बार उनके साथ जाना मेरी गलती थी। लेकिन, अब मैं वैसी गलती नहीं दोहराना चाहता। मैं यही रहूंगा (एनडीए)।' उन्होंने यह भी कहा कि अब 'हमेशा के लिए' बीजेपी के साथ रहूंगे।
Nitish Kumar: 2) क्या तेजस्वी यादव के नेतृत्व में चुनाव लड़ने के लिए तैयार होंगे?
2022 के अगस्त में जब नीतीश पलटी मारकर आरजेडी के साथ महागठबंधन में चले गए थे, तब 75 विधायकों वाली लालू की पार्टी ने उन्हें इसीलिए सीएम पद पर रहने दिया, क्योंकि उनके पास विकल्प नहीं था। वह किसी तरह से बीजेपी को सत्ता से दूर रखना चाहते थे।
इस दौरान नीतीश कुमार ने सार्वजनिक मंच से 2025 के विधानसभा चुनावों में अपने तत्कालीन डिप्टी और लालू के बेटे तेजस्वी यादव को नेतृत्व सौंपने का वादा कर चुके थे।
ऐसे में जब आरजेडी तेजस्वी यादव को अगला मुख्यमंत्री बनाने के लिए पूरजोर मेहनत कर रही है, नीतीश निश्चित से अनिश्चित की ओर रुख क्यों करना चाहेंगे?
Nitish Kumar: 3) एनडीए का चेहरा बने रहने पर लग चुकी है मुहर
नीतीश आज की राजनीति के बहुत ही धुरंधर खिलाड़ी हैं। उन्हें मालूम है कि विधानसभा चुनावों के लिए बीजेपी के सामने एनडीए के लिए उनके नेतृत्व का कोई विकल्प नहीं है। बीजेपी को पता है कि महिला वोटरों को उन्होंने अपना एक बड़ा वोट बैंक बना रखा है। यानी वह निश्चिंत हैं कि विधानसभा चुनावों तक वही एनडीए की अगुवाई करेंगे और इस वजह से उनकी करीब एक साल तक की कुर्सी तो गारंटी है!
Nitish Kumar: 4) केंद्र में सत्ताधारी दल की दोस्ती में ही फायदा!
केंद्र में बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार है। अकेले नीतीश के पाला बदलने पर भी उसकी स्थिरता को खतरा पहुंचने की फिलहाल तो दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं दिखती। यानी 2029 तक केंद्र के साथ दोस्ती में ही उनकी सियासी भलाई छिपी है।
बिहार के सीएम 73 बसंत देख चुके हैं। अगर उम्र का तकाजा नहीं होता तो वह पहले से ही तेजस्वी का नेतृत्व स्वीकार करने की बात क्यों कर रहे होते? ऐसे में वह फिर से लालू के साथ जाने की क्यों सोचेंगे?
Nitish Kumar: 5) महाराष्ट्र वाली स्थिति बनी भी तो भी नीतीश के लिए बीजेपी ही बेहतर विकल्प!
अगर नीतीश कभी तेजस्वी को नेता मानने की बात कह चुके हैं तो इससे यह संकेत निकलता है कि उनके मन में सक्रिय राजनीति से रिटायरमेंट की खिचड़ी भी कहीं न कहीं जरूर पक रही है।
अगर बिहार में भी महाराष्ट्र वाला सीन दोहराए जाने की अटकलें लग रही हैं तो क्या नीतीश इतने कच्चे खिलाड़ी हैं कि बीजेपी के बहुमत के करीब पहुंचने पर भी वह मुख्यमंत्री बने रहने के लिए अड़े रहेंगे?
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ऐसे में भी उन्हें केंद्र की भाजपा सरकार से बेहतर रिटायरमेंट प्लानिंग का विकल्प कौन दे सकता है? क्या राजद के साथ जाने पर उन्हें इस तरह का कोई विकल्प मिलने की संभावना दूर-दूर तक दिखाई दे रही होगी?
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