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Success Story: सोशल मीडिया बना रोजगार का रास्ता, सागर के रहली में युवा ने शुरू की मशरूम की खेती

Success Story: आज के दौर में जब युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, ऐसे समय में सागर जिले के रहली ब्लॉक से एक प्रेरणादायक उदाहरण सामने आया है। वार्ड नंबर 03 निवासी मोनू तिवारी ने अपने साथी सोनू के साथ मिलकर मशरूम की खेती को अपनाया और आत्मनिर्भरता की दिशा में मजबूत कदम बढ़ाया है।

बिना किसी सरकारी प्रशिक्षण या महंगे कोर्स के, केवल सोशल मीडिया और इंटरनेट के माध्यम से जानकारी जुटाकर मोनू ने अपने घर के एक छोटे से कमरे से मशरूम उत्पादन की शुरुआत की। यह प्रयोग अब धीरे-धीरे एक स्थायी आजीविका के रूप में उभर रहा है।

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सोशल मीडिया बना गुरु

मोनू तिवारी बताते हैं कि उन्होंने यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वीडियो देखकर मशरूम की खेती की बारीकियां समझीं। "मैंने कहीं बाहर जाकर ट्रेनिंग नहीं ली। घर बैठे मोबाइल पर देखकर ही खेती सीखी और पहला प्रयोग किया," - मोनू तिवारी

30-40 दिनों में तैयार होती है फसल

10 नवंबर से शुरू की गई मशरूम की खेती में महज 30 से 40 दिनों में फसल तैयार हो जाती है। अब तक करीब 10 किलो मशरूम का उत्पादन किया जा चुका है, जिसे गुणवत्ता जांच और बाजार संभावनाओं के लिए जबलपुर, दमोह, सागर और स्थानीय सब्जी मंडी में सैंपल के तौर पर भेजा गया।

जबलपुर में मशरूम की गुणवत्ता को पास किया जा चुका है, जिससे बाजार में अच्छी मांग की उम्मीद जगी है।

कम लागत, बेहतर मुनाफा

  • मोनू के अनुसार मशरूम की खेती में लागत लगभग 80 से 90 रुपये प्रति किलो आती है, जबकि
  • फुटकर बाजार में कीमत: 350 से 400 रुपये प्रति किलो
  • थोक बाजार में कीमत: 150 से 200 रुपये प्रति किलो
  • इस तरह कम जगह और सीमित संसाधनों में भी यह खेती अच्छी आमदनी का जरिया बन सकती है।

चुनौतियां भी कम नहीं

मोनू बताते हैं कि मशरूम की खेती आसान जरूर है, लेकिन इसमें निरंतर देखरेख जरूरी होती है। गर्मियों में तापमान को 25 डिग्री सेल्सियस के आसपास बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है। इसके बावजूद वे लगातार प्रयोग और सुधार के साथ आगे बढ़ रहे हैं।

युवाओं के लिए प्रेरणा

मोनू और सोनू की इस पहल ने आसपास के युवाओं को भी प्रेरित किया है। अब वे भविष्य में बड़े स्तर पर मशरूम उत्पादन कर अन्य युवाओं को रोजगार से जोड़ने की योजना बना रहे हैं।

आत्मनिर्भर भारत की मिसाल

यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की सफलता नहीं, बल्कि यह दर्शाती है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म और सही सोच के साथ ग्रामीण युवा भी आत्मनिर्भर बन सकते हैं। मशरूम की खेती जैसे विकल्प कम लागत में स्थायी रोजगार का मजबूत आधार बन सकते हैं।

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