Bhopal News: भोपाल गैस त्रासदी: डाउ केमिकल पर मुकदमे की सुनवाई, कोर्ट में CBI और भोपाल ग्रुप ने रखा पक्ष
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की एक स्थानीय अदालत में 1984 की भोपाल गैस त्रासदी के लिए डाउ केमिकल पर मुकदमा चलाने की मांग को लेकर दायर याचिकाओं पर बुधवार को सुनवाई हुई। यह त्रासदी, जिसे दुनिया की सबसे भयावह औद्योगिक दुर्घटना माना जाता है, 2-3 दिसंबर 1984 की रात को यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (UCIL) के कीटनाशक कारखाने से मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) गैस के रिसाव के कारण हुई थी।
इस हादसे में हजारों लोग मारे गए थे, और लाखों लोग गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से प्रभावित हुए थे। ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास (JMFC) हेमलता अहिरवार की कोर्ट में हुई इस सुनवाई में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) और भोपाल ग्रुप फॉर इन्फॉर्मेशन एंड एक्शन (BGIA) ने अपने तर्क रखे।

सुनवाई मात्र 1 मिनट 40 सेकंड तक चली, और अगली सुनवाई के लिए 23 अगस्त 2025 की तारीख तय की गई। वन इंडिया हिंदी की यह विशेष रिपोर्ट लाई है इस सुनवाई और भोपाल गैस त्रासदी के कानूनी संघर्ष की पूरी कहानी।
सुनवाई का विवरण: CBI और BGIA ने रखा पक्ष
कोर्ट A1, भोपाल जिला न्यायालय में हुई इस सुनवाई में CBI की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनफूल विश्नोई, अवि सिंह, और प्रसन्ना ने पक्ष रखा। वहीं, भोपाल ग्रुप फॉर इन्फॉर्मेशन एंड एक्शन (BGIA) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लुथरा और रविंद्र श्रीवास्तव उपस्थित रहे। सुनवाई का मुख्य मुद्दा यह था कि क्या भोपाल की अदालत को डाउ केमिकल, जो 2001 में यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन (UCC) का अधिग्रहण कर चुकी है, पर मुकदमा चलाने का अधिकार है।
CBI ने तर्क दिया कि आपराधिक अधिकार क्षेत्र उस स्थान पर आधारित होता है जहां अपराध हुआ। चूंकि भोपाल गैस त्रासदी मध्य प्रदेश में हुई, इसलिए भारतीय अदालतों को इस मामले में सुनवाई का पूरा अधिकार है। दूसरी ओर, डाउ केमिकल ने अपनी दलील में कहा कि वह एक अमेरिकी कंपनी है, और इसलिए भारतीय अदालतें उस पर कार्यवाही नहीं कर सकतीं। वरिष्ठ अधिवक्ता अवि सिंह ने इसे समय बर्बाद करने की रणनीति करार देते हुए कहा, "डाउ केमिकल एक तरफ कहता है कि भारतीय अदालतें उस पर मुकदमा नहीं चला सकतीं, और दूसरी तरफ उसी कोर्ट में अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर यह दावा करता है कि कोर्ट को सुनवाई का अधिकार ही नहीं है। यह विरोधाभास उनकी मंशा को दर्शाता है।"
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने दोनों पक्षों के तर्कों को सुना और मामले को गहराई से समझने के लिए अगली तारीख 23 अगस्त 2025 तय की।
भोपाल गैस त्रासदी: एक त्रासद इतिहास
2-3 दिसंबर 1984 की रात को भोपाल में यूनियन कार्बाइड के कारखाने से 42 टन मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) गैस का रिसाव हुआ था। इस हादसे में 3,500 से 25,000 लोगों की मौत हुई थी, और 5 लाख से अधिक लोग गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं जैसे श्वसन रोग, अंधापन, और जन्मजात विकृतियों से प्रभावित हुए। 2006 के सरकारी हलफनामे के अनुसार, इस त्रासदी से 5,58,125 लोग प्रभावित हुए, जिनमें 38,478 को अस्थायी चोटें और 3,900 को गंभीर और स्थायी अक्षमता हुई।
हादसे के समय कारखाने में कई सुरक्षा खामियां थीं। अक्टूबर 1984 में टैंक E610 में नाइट्रोजन गैस का दबाव बनाए रखने की क्षमता खत्म हो गई थी, जिसके कारण 42 टन MIC को बाहर निकालना असंभव हो गया था। इसके अलावा, वेंट गैस स्क्रबर्स, फ्लेयर टावर, और स्टीम बॉयलर जैसे सुरक्षा उपकरण भी खराब थे। हादसे की रात पानी के एक पाइप में रिसाव के कारण टैंक में रासायनिक प्रतिक्रिया शुरू हुई, जिसने इस भयावह त्रासदी को जन्म दिया।
डाउ केमिकल और यूनियन कार्बाइड: कानूनी जटिलताएं
यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन (UCC), जिसके भारतीय सहायक UCIL ने भोपाल में कारखाना संचालित किया था, को इस हादसे का मुख्य जिम्मेदार माना गया। 1989 में UCC ने भारतीय सरकार के साथ 470 मिलियन अमेरिकी डॉलर के समझौते को स्वीकार किया, जो पीड़ितों के लिए मुआवजे के रूप में था। हालांकि, यह राशि प्रभावितों की संख्या और दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं की तुलना में बहुत कम मानी गई।
2001 में डाउ केमिकल ने UCC का अधिग्रहण किया, जिसके बाद यह सवाल उठा कि क्या डाउ को UCIL की देनदारियों का जिम्मेदार माना जाए। CBI और भोपाल ग्रुप फॉर इन्फॉर्मेशन एंड एक्शन जैसे संगठनों ने 2004 से डाउ केमिकल को इस मामले में शामिल करने की मांग की। डाउ ने बार-बार दावा किया कि वह एक अमेरिकी कंपनी है और भारतीय अदालतों के अधिकार क्षेत्र में नहीं आती। 2023 में डाउ के वकीलों ने पहली बार भोपाल की अदालत में उपस्थिति दर्ज की, लेकिन उन्होंने यह दलील दी कि कोर्ट को सुनवाई का अधिकार नहीं है।
2010 में भोपाल की एक अदालत ने UCIL के सात भारतीय कर्मचारियों, जिनमें तत्कालीन चेयरमैन केशव महिंद्रा शामिल थे, को लापरवाही से मृत्यु का कारण बनने का दोषी ठहराया और प्रत्येक को 2 साल की सजा और लगभग 2,000 डॉलर का जुर्माना लगाया। सभी को जल्द ही जमानत पर रिहा कर दिया गया। हालांकि, वॉरेन एंडरसन, UCC के तत्कालीन CEO, और UCC को भगोड़ा घोषित किया गया, क्योंकि वे भारतीय अदालतों में पेश नहीं हुए।
पीड़ितों की मांग: न्याय और जवाबदेही
भोपाल ग्रुप फॉर इन्फॉर्मेशन एंड एक्शन की सह-संयोजक रचना ढींगरा ने सुनवाई के बाद कहा, "डाउ केमिकल 31 साल से भगोड़ा है। यह त्रासदी हजारों लोगों की हत्या और लाखों लोगों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने का मामला है। डाउ को अपनी सहायक कंपनी यूनियन कार्बाइड की जिम्मेदारी लेनी होगी।" पीड़ित संगठनों और कार्यकर्ताओं का कहना है कि डाउ ने दशकों तक जवाबदेही से बचने की कोशिश की है।
1987 से डाउ और UCC के खिलाफ आपराधिक मुकदमे में कई बार समन जारी किए गए, लेकिन डाउ ने इसे अनदेखा किया। 2023 में सातवें समन के बाद डाउ के वकीलों ने कोर्ट में उपस्थिति दर्ज की, लेकिन केवल यह दावा करने के लिए कि भोपाल की अदालत का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है। पीड़ितों का कहना है कि कारखाने के आसपास की मिट्टी और भूजल में जहरीले रसायनों का प्रदूषण आज भी स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर रहा है, और डाउ को इसकी सफाई की जिम्मेदारी लेनी चाहिए।
सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव
भोपाल गैस त्रासदी के प्रभाव आज भी भोपाल के निवासियों पर दिखाई देते हैं। 2025 में कारखाने की साइट से 337 मीट्रिक टन जहरीला कचरा पिथमपुर, मध्य प्रदेश में निस्तारण के लिए भेजा गया। हालांकि, कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि इस कचरे का जलाना पर्यावरण और स्थानीय पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचा सकता है। भोपाल गैस त्रासदी राहत और पुनर्वास विभाग के निदेशक स्वतंत्र कुमार सिंह ने दावा किया कि यह प्रक्रिया पर्यावरण के लिए सुरक्षित है, लेकिन कार्यकर्ता इसे अपर्याप्त मानते हैं।
यूएस पर्यावरण संरक्षण एजेंसी के अनुसार, कारखाने के पास भूजल में कैंसर और जन्मजात विकृतियों का कारण बनने वाले रसायनों का स्तर सुरक्षित सीमा से 50 गुना अधिक है। इससे भोपाल में सेरेब्रल पाल्सी, सुनने और बोलने की अक्षमता, और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रही हैं।
कानूनी और सामाजिक चुनौतियां
डाउ केमिकल की ओर से बार-बार अधिकार क्षेत्र को चुनौती देने से यह मामला जटिल होता जा रहा है। CBI ने 1993 से 1998 तक वॉरेन एंडरसन के प्रत्यर्पण के लिए कागजी कार्रवाई में देरी की, जिसे कार्यकर्ता सरकारी उदासीनता मानते हैं। 2010 में पूर्व CBI निदेशक बीआर लाल ने दावा किया कि उन्हें विदेश मंत्रालय से विदेशी आरोपियों के खिलाफ सक्रिय कार्रवाई न करने के निर्देश मिले थे।
2023 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की 7,400 करोड़ रुपये अतिरिक्त मुआवजे की याचिका को खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि 1989 का समझौता अंतिम था। इससे पीड़ितों में निराशा बढ़ी है, जो मानते हैं कि मुआवजा उनकी लंबी अवधि की स्वास्थ्य समस्याओं और आर्थिक नुकसान के लिए अपर्याप्त था।
भविष्य की दिशा और सुझाव
- भोपाल गैस त्रासदी का यह मामला दशकों से अनसुलझा है, और 23 अगस्त 2025 की सुनवाई से इसकी दिशा स्पष्ट हो सकती है। कुछ सुझाव जो इस मामले को आगे बढ़ा सकते हैं:
- अंतरराष्ट्रीय सहयोग: भारत और अमेरिका के बीच प्रत्यर्पण संधि का उपयोग कर डाउ और UCC के खिलाफ कार्रवाई को तेज किया जाए।
- प्रदूषण सफाई: कारखाने की साइट पर बचे जहरीले कचरे की पूरी सफाई के लिए डाउ पर दबाव डाला जाए।
- पीड़ितों के लिए मुआवजा: दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं के लिए विशेष मुआवजा और चिकित्सा सुविधाएं प्रदान की जाएं।
- कानूनी सुधार: औद्योगिक आपदाओं के लिए सख्त कानून बनाए जाएं, ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदियां रोकी जा सकें।
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