सहकारिता मंत्री की विधानसभा में परेशान ग्रामीणों ने खुद ही बना ली अपने गांव की सड़क
भिंड के कारे का पुरा गांव के ग्रामीणों ने चंदा इकट्ठा कर बना ली गांव की सड़क
भिंड, 16 जुलाई। भिंड की अटेर विधानसभा में आने वाले कारे का पुरा गांव के ग्रामीण सरकार और प्रशासन की बेरुखी से निराश होकर अपने गांव की सड़क खुद ही बनाने को मजबूर हो गए। ग्रामीणों नें चंदा इकट्ठा किया और अपने गांव की सड़क तैयार कर ली। ग्रामीणों ने मिलकर सड़क बनाने में खुद श्रमदान किया।

अटेर विधानसभा में स्थित है कारे का पुरा गांव
कारे का पुरा गांव अटेर विधानसभा में स्थित है। जब से यह गांव बसा है तब से इस गांव के लिए पहुंच मार्ग पर पक्की सड़क का निर्माण नहीं हुआ हैष गांव के लोग कच्चे रास्ते से ही आवागमन करते है। जब भी कोई जनप्रतिनिधि कारे का पुरा गांव पहुंचता है तो ग्रामीण उनसे सड़क निर्माण की मांग करते है लेकिन किसी ने आज तक इस गांव की सड़क नहीं बनवाई।
नेता प्रतिपक्ष रह चुके सत्यदेव कटारे का विधानसभा क्षेत्र रह चुका है अटेर
मध्यप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रह चुके सत्यदेव कटारे का विधानसभा क्षेत्र अटेर ही था। सत्यदेव कटारे यहां से चार बार विधायक और एक बार मंत्री रह चुके है। इसके अलावा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी रह चुके हैं लेकिन उन्होने भी कभी इस गांव की कच्ची सड़क पर गौर नहीं किया। ग्रामीण सड़क की मांग करते रहे लेकिन उन्हें पक्की सड़क नहीं मिली।
वर्तमान में सहकारिता मंत्री का विधानसभा क्षेत्र है अटेर
शिवराज सरकार में सहकारिता मंत्री अरविंद भदोरिया का विधानसभा क्षेत्र अटेर ही है। अरविंद भदोरिया अटेर से दूसरी बार चुनकर विधानसभा में पहुंचे है। मौजूदा सरकार में मंत्री होने के बावजूद में इन ग्रामीणों की सुध नहीं ले सके। बीजेपी सरकार विकास का दावा करती है लेकिन उनके ही मंत्री के विधानसभा क्षेत्र के लोग एक पक्की सड़क के लिए कई साल से तरस रहे थे।
प्रशासन से भी लगाई पक्की सड़क के लिए गुहार
ग्रामीणो नें बताया कि गांव की सड़क बनवाने के लिए ग्रामीणो ने कई बार प्रशासन से भी गुहार लगाई लेकिन किसी भी योजना को इस गांव में शामिल नहीं किया गया। इस वजह से इस गांव में सड़क निर्माण नहीं हो सका।
बरसात में गांव में ही कैद होकर रह जाते थे ग्रामीण
कारे का पुरा गांव का पक्का मार्ग नहीं होने की वजह से बारिश के समय कच्चे रास्ते में पानी भर जाता है और सड़क किसी दलदल में तब्दील हो जाती है। ऐसे में पैदल चलना तो दूर की बात रही बल्कि वाहन भी इस कच्ची सड़क नहीं चल पाते थे। बारिश के मौसम में ग्रामीण गांव में ही कैद होकर रह जाते थे।
वोट मांगने के लिए आने वाले नेता दे जाते थे आश्वासन
जब भी कभी कोई नेता चुनाव के समय गांव में वोट मांगने के लिए जाता था तो वह ग्रामीणों को सड़क बनवाने का आश्वासन दे जाता था। जीत या हार होने के बावजूद नेता वापस कारे का पुरा गांव पर ध्यान नहीं देता था। ग्रामीण हर बार मायूस होकर रह जाते थे।
ग्रामीणों नें चंदा करके बनाई सड़क
जब गांव के लोग सरकार और प्रशासन से निराश हो गए तो ग्रामीणों ने खुद ही अपने गांव की सड़क बनाने का निर्णय लिया। गांव के लोगो नें चंदा इकट्ठा किया और अपने गांव की सड़क का निर्माण कर लिया। गांव के लोगो ने सड़क बनवाने में श्रमदान भी किया।












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