सरबजीत की तरह 28 बरसों तक पाकिस्तानी जेल में रहे कुलदीप, जानिए अब कैसे हुई वतन वापसी
अहमदाबाद। जासूसी के आरोप में पाकिस्तानी जेल में 28 साल जुल्म सहने वाले कुलदीप यादव सजा पूरी होने पर अब वतन लौट पाए हैं। कुलदीप को पाकिस्तानी एजेंसियों द्वारा 1994 में बॉर्डर से गिरफ्तार किया गया था। वहां 1996 में उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुना दी गई। तब से वह तरह-तरह की यातनाएं सहते रहे। 59 वर्षीय कुलदीप यादव की रिहाई तब हुई, जब सजा पूरी होने के कुछ महीने बाद पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने पिछले हफ्ते ही उन्हें रिहा करने का आदेश दिया।

28 सालों तक पाकिस्तानियों की कैद में रहा हिंदुस्तानी
कुलदीप यादव पाकिस्तान से पहले वाघा बॉर्डर लाए गए, उसके बाद 25 अगस्त 2022 को ट्रेन के जरिए वह अहमदाबाद पहुंचे। अहमदाबाद में उनका घर है, जहां पर लगभग 30 सालों बाद वह अपने परिवार से मिले। कुलदीप के लौटने पर उनके घर मीडियाकर्मियों का तांता लग गया। तब कुलदीप ने अपना परिचय देते हुए कहा, 'मेरा नाम कुलदीप कुमार यादव है। मेरे पिता नानकचंद यादव और मां मायादेवी थीं। मेरा जन्म उत्तराखंड के देहरादून में हुआ था, लेकिन पिता ONGC में थे, इसलिए 1972 में हमारा परिवार अहमदाबाद शिफ्ट हो गया था।'

30 सालों बाद अपने परिवार से मिल पाए कुलदीप
कुलदीप ने अपनी पढ़ाई के दिनों को याद करते हुए बताया, ''मैंने पहली से 7वीं कक्षा तक देहरादून में पढ़ाई की थी। फिर गुजरात में बसने के बाद ज्ञानदीप हिंदी हाई स्कूल, अहमदाबाद से 12वीं तक और फिर साबरमती आर्ट्स एंड कॉमर्स कॉलेज में पढ़ाई की। इसके बाद LLB की पढ़ाई शुरू की, लेकिन पूरी नहीं कर पाया। मैं कोई नौकरी के बारे में सोचने लगा। हालांकि, नौकरी नहीं मिल पा रही थी।'
उन्होंने कहा कि, जवानी के दिनों में ही मेरी मुलाकात उन लोगों से हुई, जो देश पर मर-मिटने का हौसला रखते थे। मैं उनके साथ हो लिया। 1992 में हम पाकिस्तान गए। जहां 2 साल तक मैंने अपना टास्क पूरा किया। एक रोज जब 22 जून 1994 की रात थी, तब मैं भारतीय सीमा में एंट्री करने की कोशिश में ही था कि तभी वहां रहने वाले कुछ लोगों को मुझ पर शक हो गया। पाकिस्तानियों ने मुझे पकड़ लिया। उनकी आर्मी मुझे न जाने कहां ले गई। उन्होंने मुझे बहुत टॉर्चर किया।''

खुद बताया- कैसे बीती सजा, फिर कैसे हुआ रिहा
कुलदीप कहते हैं, ''1996 में मुझे पाकिस्तान में उम्रकैद की सजा मिली। जब जेल में शिफ्ट किया गया तो 1997 में पहली बार मेरी सरबजीत से मुलाकात हुई। सरबजीत और मेरी बहुत अच्छी दोस्ती हो गई थी। कई सालों बाद मुझे पता चला कि, सरबजीत को जेल में ही मार दिया गया है। मैं और मेरे साथ के अन्य हिंदुस्तानी कैदी डर गए।' बकौल कुलदीप, ''26 अक्टूबर 2021 को मेरी उम्रकैद की सजा खत्म हुई। तब 2-3 बाद मुझे खबर मिली कि मैं रिहा होने जा रहा हूं, लेकिन तब मुझे नहीं छोड़ा गया। उसके बाद जब 24 जून, 2022 को मुझे सुप्रीम कोर्ट में पेश किया गया तो वहां 15 दिनों के भीतर मेरी रिहाई का आदेश दिया गया। कई महीने हो गए। अब आखिरकार, वतन की, मेरे घर की मिट्टी नसीब हुई है।'












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