'टि्वटर होता तो इमरजेंसी न लगा पातीं इंदिरा गांधी'
नई दिल्ली (ब्यूरो)। इमरजेंसी यानी आपातकल, जो आज ही के दिन इंदिरा गांधी ने ठीक 38 साल पहले लगाया था। यह वो समय था, जब तानाशाही चरम पर थी और सत्ता का जहर लोकतंत्र को खाक करने को आतुर था। उस समय की कुछ यादों को गुजरात के परिप्रेक्ष्य में राज्य के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ब्लॉग पर जनता से शेयर किया। मोदी ने अपने ब्लॉग में लिखा कि अगर सोशल नेटवर्किंग होती, तो इमरजेंसी न लगती।
मोदी ने लिखा- आपातकाल से जुड़ी कई यादें मैं सजोये हुआ हूं। उस समय मैं 25 साल का नौजवान था, जो बस आरएसएस के साथ जुड़ा ही था। तब मैंने अंधेरे के वो दिन देखे, जो हमेशा के लिये मेरी यादों में कैद हो गये। वो दिन कौन भूल सकता है, जब निजी स्वतंत्रता को बुरी तरह दबाया गया। कौन भूल सकता है उन दिनों को जब एमआईएसए का दुरुपयोग कर राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाया गया। कौन भूल सकता है मीडिया संस्थानों पर लगे ताले, 19 महीनों तक लगातार देश की जनता के संघर्ष को कौन भूल सकता है, जिसमें तमाम लोगों ने लोकतंत्र के लिये खुद की बलि चढ़ा दी।
आपातकाल के दौरान एक लहर उठी, जिसमें तमाम तरह के विचार सामने आये। खास बात यह है कि हम सभी का एक मकसद था। हम जाति, धर्म, क्षेत्रवाद आदि से ऊपर उठकर काम कर रहे थे। दिसंबर 1975 में गांधीनगर में विपक्षी दलों के सभी सांसदों ने गांधीनगर में एक बैठक बुलायी। इस बैठक में स्वतंत्र सांसद पुरुषोत्तम मवालांकर, उमाशंकर जोशी और कृष्ण कांत भी शामिल हुए।
संगठन, राजनीतिक पार्टियां और अलग-अलग लोग, जिन्होंने एक दूसरे को पहले देखा तक नहीं होगा, वो भी अब देश के लिये करीब आ चुके थे। बीएमएस ने वाम दलों के संगठनों के साथ काम किया। हमने छात्र संगठनों के साथ मिलकर अपने काम को आगे बढ़ाया। छात्र संगठन विश्वविद्यालय के अंदर भले ही एक दूसरे के धुर विरोधी हों, लेकिन जब देश की बात आयी तो सब एक हो गये। 1974 में लोगों का जुनून ही था जिसने गुजरात में नवनिर्माण आंदोलन और बिहार में जेपी आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर सफल बनाया।
आपातकाल ने मुझे राजनीतिक संगठनों के अलावा कई सामाजिक संगठनों के साथ काम करने का मौका भी प्रदान किया। ये वो संगठन थे जो देश के लिये समर्पित थे। मैंने उस समय कई गांधीवादी लोगों के साथ काम किया। उसी दौरान मुझे जॉर्ज फरनांडीज से मिलने का मौका मिला। मैा वो दिन कभी नहीं भूलूंगा जब जॉर्ज साहब पीले रंग की फिएट गाड़ी में आये और बगैर स्त्री किया हुआ कुर्ता पहने हुए, अपने चेहरे को हरे रंग के कपड़े से ढके हुए थे। तम मुझे उनसे पहली बार मिलने का मौका मिला नानाजी देशमुख के साथ। ये वो दो लोग थे, जिन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री की नींदें हराम कर दी थीं।
जिस तरह का माहौल आपातकाल के दौरान था, उसे देखते हुए लोगों ने 1977 में ही सत्ता को उखाड़ फेंका। उस समय प्रिंट मीडिया और रेडियो पूरी तरह सेंसर्ड था वहीं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का जन्म ही हुआ था। सच पूछिए तो अगर उस समय टि्वटर-फेसबुक जैसा सोशल मीडिया होता, तो शायद आपातकाल नहीं लग पाया होता। अगर लग भी गया होता तो इतने लंबे समय तक तो कतई नहीं रहता।
मैंने आपातकाल पर एक किताब लिखी है- आपातकाल में गुजरात। मैं उन लोगों को सुझाव देना चाहूंगा, जिनका जन्म उसी दौरान हुआ। यदि वो इस किताब को विस्तार से पढ़ें, तो उन्हें पता चलेगा कि आखिर क्यों लोगों ने तत्कालीन कांग्रेस सरकार का पुरजोर विरोध किया।
















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