इंदिरा की इमरजेंसी में हुई नसबंदी याद, कमीशन बंदी नहीं!
[नवीन निगम] 25 जून 1975 की वो रात उस समय के हर राजनेता को याद होगी। उस रात ठीक 12 बजे यानी 26 जून को 00:00 बजे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी की घोषणा की थी। देश संकट में नहीं था सरकार और उससे भी ज्यादा संकट में थी इंदिरा गांधी। उस दिन सुबह ये ख़बर आई थी कि अदालत ने फैसला सुनाया है कि इंदिरा गाँधी ने 1971 में रायबरेली चुनाव जीतने के लिए सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया था, और इस कारण इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उनका चुनाव रद्द कर दिया और उन्हें छह साल के लिए चुनाव लडऩे के लिए अयोग्य घोषित कर दिया हैं।
इंदिरा गांधी उस समय ताकत से लबरेज थी। 1971 में बांग्लादेश का निर्माण और 1974 में परमाणु परीक्षण करने के बाद इंदिरा गांधी को लगता था कि वह अब भारत में तानाशाह की तरह हकूमत कर सकती हैं। उनकी यह गलतफहमी 1977 के चुनाव में दूर हो गई और जनता ने तीन साल की सजा के बाद 1980 में उन्हें फिर सत्ता सौंप दी।

युवकों को पकड़कर की गई नसबंदी
इमरजेंसी खराब थी और उसमें अत्याचार हुए, नवयुवकों की पकड़-पकड़ कर नसबंदी की गई। दरअसल संजय गांधी और इंदिरा गांधी को लगा कि जिस प्रकार चीन में सख्ती के साथ विकास को धार दी गई है उसी प्रकार वह भारत में यह चमत्कार करके दिखा दे। गांवों में डाक्टरों ने नसबंदी के आंकड़े पूरे करने के लिए जिस प्रकार फर्जी तरीके से नसबंदी की और झूठे आंकड़े पेश किए। उसी से लोगों में गुस्सा और कांग्रेस के खिलाफ नफरत फैली। ऐसा नहीं है कि इमरजेंसी का पूरे देश में एक जैसा विरोध हुआ क्योंकि 1977 के चुनाव में कांग्रेस का जहां उत्तर भारत में सफाया हो गया वहीं दक्षिण के प्रदेशो में कायम रही। इंदिरा गांधी रायबरेली में राजनारायण के हाथों पराजित होने के बाद भी दक्षिण भारत से चुनाव जीत गई।
इमरजेंसी का यह पहलु आज भी हमें याद है और इस पर हम हर साल चर्चा करते हैं और कहते हैं कि वह खराब थी, लोकतंत्र की हत्या थी। लेकिन उस पहलु को कोई याद नहीं रखना चाहता, जिसने देश की कानून व्यवस्था, प्रशासन और सरकारी कामकाज को दुरुस्त करने के लिये सख्ती अपनायी। आज के माहौल में यदि हम उसी पहलु की विवेचना करें तो गलत नहीं होगा।
बसों से लेकर कर्मचारी तक सब रहते थे राइट टाइम
इस बारे में मैंने कई बुजुर्गों से बात की जिन्होंने इमरजेंसी के समय सरकारी दफ्तरों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया था। लखनऊ में ही रहने वाले एक बुजुर्ग आरपी सिंह का कहना है कि वह उस समय पीडब्लूडी में काम करते थे। इमरजेंसी का ऐसा डर था कि वह अपने दफ्तर 10 बजे से पहले ही पहुंच जाते थे। घूस का बोलबाला उस समय भी ऐसे दफ्तरों में आम था, लेकिन इमरजेंसी ने सारी स्थितियां ही बदल कर रख दी थी कोई बाबू हो या अधिकारी उसकी घूस लेने की हिम्मत नहीं पड़ती थी, लोग अपने पास जमा घूस की रकमों को अपने रिश्तेदारों के पास रख आए थे।
हालात यह हो गए थे कि शहरों में चलने वाली बसें एकदम समय पर छूटने लगी थीं। 70 के ऊपर हो चुके श्री सिंह कहते है कि उस समय तो इमरजेंसी पर गुस्सा आया था, लेकिन जब आज अन्ना को आंदोलन करते देखता हूं और देश में रोज होते घोटाले, तो सोचता हूं कि हमने इंदिरा गांधी की इमरजेंसी को थोड़ा वक्त दिया होता तो आज देश की दशा ऐसी न होती। श्री सिंह की बात की तस्दीक करने के लिए मैंने एक के बाद एक कई ऐसे अधिकारियों से बात की जिन्होंने सरकारी सेवा में रहते हुए इमरजेंसी को देखा।
घूस लेने की हिम्मत नहीं पड़ती थी
ऐसे ही एक व्यक्ति हैं आलोक सिंह। आलोक जी उस समय सिंचाई विभाग में थे। उन्होंने इमरजेंसी का एक किस्सा सुनाया। उस किस्से को मैं यहां हूबहू आपके सामने पेश कर रहा हूं। आलोक जी बताते है कि 1975 की गर्मियों में जैसे ही इमरजेंसी की घोषणा हुई और खुफिया विभाग के अधिकारियों ने भष्ट्र अधिकारियों के घरों पर छापा मारकर अवैध संपत्ति पकडऩा शुरू किया।
मेरे एक मित्र थे काफी चर्चित थे (घूस लेने के मामले में)। अचानक एक दिन पता चला कि वह लम्बी छुट्टी पर चले गए हैं, जब वापस लौटे तो मैं उनके घर उनसे मिलने चला गया। घर पहुंचा और छुट्टी का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि जिस समय अफसरों के घरों पर छापे पड़ रहे थे तब उनके पास घर पर 90 हजार कैश था। उस समय 90 हजार बड़ी रकम होती थी। जाहिर है कि यह उन्होंने कमीशन खोरी और घूस लेकर कमाई थी।
उन्होंने आगे बताया कि वह इस पैसे को लेकर परेशान थे क्योंकि पकड़े जाने का भय था और नौकरी जाने का भी। उन्होंने एक टैक्सी किराए पर ली और अपने पास उपलब्ध सारा कैश रखा और बच्चों के साथ गोवा चले गए। वहां खूब मौज मस्ती की और जब पांच हजार के आसपास रकम बची तो वापस चल दिए। 74 वर्षीय राम बहादुर सक्सेना बताते हैं कि इमरजेंसी के दौरान कोई भी सरकारी काम लेट नहीं होता था। फिर चाहे बर्थ सर्टिफिकेट हो या फिर राशन कार्ड और या कोई अन्य काम। किसी भी सरकारी काम में देरी नहीं होती थी।
आलोक और श्री सक्सेना के किस्से को मैंने यहां इसलिए पेश किया कि लोग इमरजेंसी के सिर्फ एक पहलू को देखते हैं। आज जो देश के हालात हैं उसके परिपेक्ष्य में यदि इमरजेंसी को देखे तो वह बुरी नहीं अच्छी ही लगेगी। शायद मेरी बातों से लोगों को लगेगा कि मैं कांग्रेस का आदमी हूं, लेकिन मैं युवाओं से सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि वह अपने बुजुर्गों से पूछे कि क्या इमरजेंसी में नागरिक सुविधाएं जैसे ट्रांसपोर्ट, बिजली और परिवहन और कानून व्यवस्था ठीक हुई थी कि नहीं। आपको जवाब मिल जाएगा।
सवाल आपसे अगर इमरजेंसी के ऐसे परिणाम हों, तो क्या आप चाहेंगे कि देश में एक बार फिर आपातकाल लगे? अपने जवाब नीचे कमेंट बॉक्स में लिखें।
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