वोट बैंक की नहीं जनता की सोचिए अखिलेश
लखनऊ । 15 मार्च को अखिलेश ने अपना एक साल पूरा किया। संयोग देखिए जिस दिन अखिलेश ने सत्ता संभाली उसी दिन बसपा के संस्थापक कांशीराम का जन्मदिवस भी है। शुक्रवार की दोपहर मैं अमौसी एयरपोर्ट के लिए निकला था। जेल रोड पर कांशीराम के बड़े-बड़े होर्डिंस लगे थे और रमाबाई मैदान पर बसपा के कई कार्यक्रम भी थे। आगे जाकर जब रास्ता नहर के लिए मुड़ा तो वहां कुंभ में आने को लेकर अखिलेश का राज्य सरकार की तरफ से एक बड़ा होर्डिंग लगा था।
मैं थोड़ी देर के लिए मोड़ पर रूक गया और आते जाते लोगों के भावों को पढऩे की कोशिश करता रहा। लखनऊ शहर की लोकसभा सीट क्योंकि ज्यादातर भाजपा के पक्ष में गई है और सपा दूसरे स्थान पर रही है। उसके बाद भी मैंने लोगों को बसपा के पोस्टर को ध्यान से देखते देखा वहीं कुंभ पर आमत्रंण के पोस्टर को देखकर मेरे साथ बैठे एक बुजुर्ग बोले ...बचवा अच्छा है लेकिन बढुवा लोग चलने नहीं देगा। मैं अमौसी एयरपोर्ट पहुंचा अपने साथ आए बुजुर्ग को उतारा और वापस चल पड़ा। लेकिन उनकी वह बात मेरे कानों में गूंज रही थी। मैं नहर के पास आकर ठहर गया।
गाड़ी से उतर कर भेलपूरी का ठेला लगाए एक नौजवान की तरफ बढ़ा। नाम पूछा तो बोला रामसिंह यादव। मैंने उसके नाम के आगे यादव सुन कर पूछने लगा ...अब तो तुमहारी सरकार हैं। वह बोला काहे की सरकार पहले सिपाही 20 रूपए रोज लेता था अब 50 लेने लगा है। मैंने कहा कि इससे सरकार का क्या वास्ता। तो उसने कहा कि जब सिपाही 50 रुपए मांगने लगा तो तो उसने २० रूपए लेने की गुजारिश की लेकिन सिपाही ने कहा पहले 20 लेते थे तो हम अपने पास रख लेते थे लेकिन अब सिपाहियों को अपने अपने इलाके से थाने में पैसा पहुंचाने का हुक्म है 50 दोगे तो हमारे पास 15 से भी कम बचेंगे। क्योंकि बाकी तो ऊपर देने है नहीं देगे तो ऑफिस में बैठा दिए जाएंगे।फिर मैं आगे बढ़ा तो एक सज्जन शाम की सैर के लिए निकले थे सोचा चलो इनसे भी कुछ पता करें। दुआ सलाम की तो सज्जन खुश हो गए बोले किस अखबार से हो मैंने बताया मैं तो शौकिया लिखता हूं। उस पर वह बोले आजकल तो अखबार वालों से भी डर लगता है, कही कुछ उल्टा सीधा छाप दिया तो देते रहो ऊपर तक जवाब। मैंने पूछा सरकारी नौकरी में है क्या। बोले ...सिंचाई विभाग हूं।
मैंने अपने विषय पर वापस आते हुए कहा ...कैसी चल रही है अखिलेश सरकार। वह गंभीर हो गए। बोले मैंने भी सपा को ही वोट दिया था। सोचा था जवान खून हैं अच्छा चलाएगा। मैंने पूछा ...तब तो नेताजी के मुखयमंत्री बनने के आसार थे, इसपर वह बोले अगर नेताजी भी बनते तो पता था कि सरकार अखिलेश ही चलाएगा। बड़े सपने थे लेकिन अखिलेश तो अभी से वोट बैंक की राजनीति में जुट गया।
थोड़ा इधर-उधर की बात करने के बाद वह बोले ...पहले यहां मायावती के पोस्टर थे और सामने पत्थर की इमारतें। घोटालों को याद करके बसपा पर बहुत गुस्सा आता था, मन में सोचता था आने दो चुनाव सब घोटालो का जनता बदला लेंगी। लेकिन आज एक साल बाद लगता है कि घोटालो का हमसे सीधा नाता न था लेकिन बिगड़ती कानून व्यवस्था को देखकर तो बहनजी की वही बात याद आती कि एक साल में हमें याद करोंगे।













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