कौन हैं जज राजशेखर मंथा? जिन्होंने बंगाल में BJP के आते ही R.G. Kar रेप केस की सुनवाई से किया इनकार
पश्चिम बंगाल की राजनीति और न्यायपालिका से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। आरजी कर मेडिकल कॉलेज की उस 'अभया' (ट्रेनी डॉक्टर) के लिए न्याय की लड़ाई ने एक बिल्कुल नया मोड़ ले लिया है, जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दी थी। राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद अब कानूनी गलियारों में भी हलचल तेज है। जस्टिस राजशेखर मंथा की डिवीजन बेंच ने खुद को इस हाई-प्रोफाइल केस की सुनवाई से अलग कर लिया है।
मंगलवार (12 मई) को कोर्ट में जो हुआ और चुनावी नतीजों में जो संदेश छिपा है, उसने इस पूरे मामले को एक नई दिशा दे दी है। ऐसे में आइए जानते हैं कि कौन हैं जज राजशेखर मंथा और क्यों उन्होंने सुनवाई करने से मना किया है।

🔷Justice Rajasekhar Mantha: जस्टिस राजशेखर मंथा कौन हैं? जानिए प्रोफाइल
- न्यायमूर्ति राजशेखर मंथा का जन्म 29 अक्टूबर 1967 को हुआ था। वे वर्तमान में कलकत्ता उच्च न्यायालय में स्थायी न्यायाधीश के रूप में कार्यरत हैं।
- उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई कोलकाता के प्रतिष्ठित सेंट जेवियर्स कॉलेजिएट स्कूल और सेंट पॉल्स बोर्डिंग एंड डे स्कूल से की।
- वर्ष 1990 में उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय के विधि महाविद्यालय से कानून की डिग्री हासिल की। इसके बाद वर्ष 1991 में लंदन विश्वविद्यालय के किंग्स कॉलेज से वाणिज्यिक और कॉरपोरेट कानून में उच्च विधि शिक्षा प्राप्त की।
- अप्रैल 1990 में उन्होंने न्यूजीलैंड के ऑकलैंड में आयोजित राष्ट्रमंडल विधि सम्मेलन में दक्षिण एशियाई मूट कोर्ट टीम का प्रतिनिधित्व किया।
- दिसंबर 1991 में वे पश्चिम बंगाल बार काउंसिल में अधिवक्ता के रूप में पंजीकृत हुए। इसके बाद उन्होंने वाणिज्यिक, वित्तीय, प्रतिभूति, संवैधानिक, उपभोक्ता संरक्षण और पर्यावरण कानून से जुड़े मामलों में वकालत की।
- जुलाई 2015 में उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा मिला।
- 21 सितंबर 2017 को उन्हें कलकत्ता उच्च न्यायालय में अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया।
- 16 सितंबर 2019 को वे स्थायी न्यायाधीश बने।
- वर्ष 2022 के बाद वे उस समय चर्चा में आए जब उन्होंने पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी के खिलाफ चल रहे कई आपराधिक मामलों पर अंतरिम रोक लगाई।
- जनवरी 2023 में उनके न्यायालय कक्ष के बाहर कुछ वकीलों द्वारा विरोध प्रदर्शन किया गया था। बाद में अदालत ने अवमानना की कार्यवाही शुरू की।
- इसी दौरान कोलकाता के जोधपुर पार्क स्थित उनके घर और आसपास की दीवारों पर पोस्टर लगाए जाने का मामला भी सामने आया था, जिसके बाद पुलिस ने कई लोगों को गिरफ्तार किया।
- न्यायमूर्ति राजशेखर मंथा को संवैधानिक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों की सुनवाई करने वाले सख्त और चर्चित न्यायाधीशों में गिना जाता है।

🔷जस्टिस मंथा की बेंच क्यों हटी?
मंगलवार को सुनवाई के दौरान जस्टिस राजशेखर मंथा ने एक बेहद अहम टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि ऐसी खबरें और रिपोर्ट्स सामने आ रही हैं कि राज्य में इस मामले की जांच और समाधान के लिए एक 'स्टेट ज्यूडिशियल कमीशन' (राज्य न्यायिक आयोग) का गठन किया जा रहा है।
जस्टिस मंथा का मानना है कि जब एक समर्पित न्यायिक आयोग इस मामले को देखने के लिए बन रहा है, तो इस मोड़ पर अदालत में सुनवाई की तत्काल आवश्यकता नहीं रह जाती। तय प्रक्रिया के अनुसार, अब इस मामले को मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) के पास भेज दिया गया है। जानकारों का मानना है कि सत्ता बदलने के बाद न्यायिक प्रक्रिया में यह बदलाव केस की निष्पक्षता सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है।
🔷पानीहाटी में 'इंसाफ' की जीत: पीड़िता की मां ने रचा इतिहास
इधर अदालत में तारीखें बदल रही थीं, उधर बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने सबको चौंका दिया। आरजी कर की पीड़ित बेटी की मां और भाजपा उम्मीदवार रत्ना देबनाथ ने पानीहाटी सीट से ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के प्रत्याशी तीर्थंकर घोष को 28,836 वोटों के भारी अंतर से हरा दिया।
चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, रत्ना देबनाथ को कुल 87,977 वोट मिले, जबकि टीएमसी के खाते में सिर्फ 59,141 वोट ही आए। तीसरे नंबर पर माकपा (CPI-M) के कलतान दासगुप्ता रहे। यह जीत इसलिए भी बड़ी है क्योंकि पानीहाटी को टीएमसी का अभेद्य किला माना जाता था, जहां से तीर्थंकर घोष के पिता निर्मल घोष लगातार पांच बार विधायक रहे थे।
🔷एक मां का सियासी संघर्ष
रत्ना देबनाथ ने जब राजनीति में कदम रखा, तो कई सवाल उठे। नागरिक समाज के एक धड़े ने इसे एक मां का संवैधानिक अधिकार बताया, तो कुछ ने इसे आंदोलन का राजनीतिकरण कहा।
लेकिन रत्ना ने अपने प्रचार के दौरान 'मेरुदंड बिक्री नेई' (मेरी रीढ़ बिकाऊ नहीं है) लिखी हुई साड़ियां पहनकर एक कड़ा संदेश दिया। चुनाव से ठीक पहले उन पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ अमर्यादित भाषा के इस्तेमाल के आरोप भी लगे और टीएमसी ने चुनाव आयोग से शिकायत भी की। हालांकि, भाजपा ने उन्हें 'बंगाल की हर महिला का चेहरा' बनाकर पेश किया, जिसका असर नतीजों में साफ दिख रहा है।
🔷बंगाल में भाजपा की बढ़त और बदलता समीकरण
राज्यभर से आ रहे रुझान और नतीजे बता रहे हैं कि बंगाल में भाजपा एक मजबूत बढ़त की ओर है। बालूरघाट से लेकर नदिया तक भगवा खेमे में जश्न का माहौल है। सुवेंदु अधिकारी और सुकांत मजुमदार जैसे दिग्गज नेता जीत का भरोसा जता रहे हैं।
दूसरी ओर, कालीघाट (ममता बनर्जी का आवास) और टीएमसी दफ्तरों में सन्नाटा पसरा है। समर्थकों की आंखों में मायूसी साफ देखी जा सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि आरजी कर केस के बाद महिलाओं की सुरक्षा और सिस्टम के प्रति जो नाराजगी थी, वह वोटिंग मशीन में साफ नजर आई है।












Click it and Unblock the Notifications