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खुद का पिंड दान कर नागा साधु बने 2000 संन्‍यासी

इलाहाबाद। 12 वर्षों पर लगने वाले इस महाकुंभ में नागा साधु सदैव से आकर्षण का केन्द्र रहे हैं। इनका रहस्यमयी जीवन सदैव से दुनिया के लिए कौतुहल का विषय रहा है। हर कुंभ के बाद इनकी संख्या बढ़ जाती है, लेकिन नागा साधु बनना इतना आसान नहीं है। कई वर्षों की कठोर तपस्या के बाद एक नागा साधु तैयार होता है। इस साल भी महाकुंभ में तकरीबन 2000 नए नागा साधुओं ने नागा जीवन के लिए शपथ ली है। माना जा रहा है कि नासिक, उज्जैन और हरिद्वार की तुलना में प्रयाग के महाकुंभ में बनने वाले नागा अधिक सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। प्रयाग में नागा जीवन की सपथ लेने वाले नए नागा साधुओं को राजराजेश्वर की उपाधि से भी नवाजा जाता है और ऐसा माना जाता है की नागा संन्यासी के तौर पर उनको राजयोग मिलता है, लिहाजा प्रयाग में नागा साधु बनने की होड़ रहती है। ये होड़ इस बार भी कुंभ में देखने को मिली।

नागा साधु का अर्थ है कठिन तपस्या, कई साल अखाडे में अपने गुरुओं की सेवा और ब्रह्मचर्य जीवन का पालन करना। ये सब सुनने में भले आसान लग रहा हो लेकिन इसे जीना इतना आसान नहीं है। 12 सालों के बाद अंत में उसे नागा दीक्षा दी जाती है और फिर गंगा तट पर उनका मुंडन और जनेऊ संस्कार करवाया जाता है। नागा साधु बनने की दिशा में सबसे कड़ी परीक्षा होती है अपने हाथों खुद का और अपने परिवार का जीते-जी पिंडदान करना।

गौरतलब है कि हिन्दु परंपरा के अनुसार किसी का पिंडदान मरने के बाद किया जाता है। लेकिन जीते-जी अपने ही हाथों ये नागा साधु अपना क्रिया-कर्म कर देते हैं। ये इस बात का प्रमाण होता है कि अब इनके अंदर किसी भी तरह का सांसारिक मोह-माया या बंधन नहीं है। वो इन बंधनों से मुक्त हो चुके है। इसी के बाद अखाड़े उन्हें नागा साधुओं के रूप में स्वीकार करते हैं। इस प्रक्रिया के बाद अखाड़ों को ये प्रमाण मिल जाता है कि अब ये साधु अपना पूरा जीवन धर्म की रक्षा और मानव कल्याण के लिए समर्पित कर देगें।

नए नागा साधुओं को पांच तरह की दीक्षा दी जाती है जिसमें महापुरुष, रुद्राक्ष, भस्म, केशायवस्त्र और लंगोटी शामिल है। दीक्षा समारोह के बाद इन साधुओं को गंगा में स्नान करना होता है। गंगा स्नान के बाद इन्हें एक सार्टिफि केट दिया जाता है जिसमें उनके नाम, इनकी उम्र के साथ-साथ ये शपथ भी लिखी होती है कि वो अपना पूरा जीवन धर्म प्रचार में समर्पित करेंगे और दान में मिले भोजन पर ही आश्रित रहेंगे। इन नागा साधुओं की योग्यता के आधार पर ही उन्हें क्लास में बांटा जाता है। इसके लिए भी ग्रेट निर्धारित किए गए है। जिसमें थानापति, जिलेदार और महंत शामिल है। बाद में प्रमोशन मिलने के बाद ये महामंडलेशवर और अखाड़ा प्रमुख बन सकते हैं। इस बार के महाकुंभ में सबसे ज्यादा 2000 नए नागा शामिल हैं। जबकि महानिर्वाणी अखाड़े में 250 नए नागा साधु शामिल हो रहा है।

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