भारत के गिलगित-बाल्टिस्तान पर जबरन कब्जा किया था पाक ने

कहना न होगा कि इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान में सुन्नी संप्रदाय के लोगों की तूती बोलती है और कट्टरपंथी सुन्नी समुदाय के लोग शिया मुसलमानों को मुसलमान मानने के लिए भी तैयार नहीं है। लिहाजा, इस्लाम के नाम पर भारत का विभाजन होने के बावजूद गिलगित-बाल्टिस्तान के लोग पाकिस्तान की संप्रभुता कबूल करने के बजाय स्वतंत्र रहने के पक्षधर रहे। लम्बे अरसे इस इलाके को नार्दर्न एरियाज के नाम से जाना जाता था।
इस जटिलता का हल निकालने के लिए पाकिस्तान ने बीते कई दशक के दौरान बहुत संयत ढंग से काम किया। जुल्फिकार अली भुट्टो के शासनकाल में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने सबसे पहले यहां स्टेट सब्जेक्ट कानून का समाप्त किया। यह वही कानूनी प्रावधान है जिसके चलते आज भी भारत के दूसरे हिस्सों के लोग जम्मू कश्मीर में जमीन खरीद कर वहां बस नहीं सकते।
सत्तर के दशक में पाकिस्तान ने अपने गैर-कानूनी कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान से यह प्रावधान हटाकर वहां की आबादी की संरचना बदल डालने का रास्ता खोल दिया। फिर शुरू हुआ इस अपेक्षाकृत शांत इलाके में पंजाब व पख्तूनख्वा से सुन्नी संप्रदाय के लोगों को बसाए जाने का सुनियोजित सिलसिला। देखते देखते यहां का बहुसंख्यक शिया समुदाय संख्या में कमजोर पड़ता गया। आज हालत यह है कि अपने ही क्षेत्र में शिया समुदाय को आए दिन कट्टरपंथियों के अमानवीय हमलों का सामना करना पड़ता है।
आबादी का यह संतुलन बिगड़ा तो इस इलाके में पाक-परस्त जमात का दबदबा बनता चला गया। बरसों तक इस काम को गुपचुप अंजाम देने के बाद 2009 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति के एक आदेश के तहत गिलगित बाल्टिस्तान की असेंबली अस्तित्व में लाई गई। इस आदेश और असेम्बली की वैधानिकता आज भी पाकिस्तानी अदालतों में विचाराधीन है।
इतना ही नहीं पाकिस्तान की संसद से भी आज तक इस विवादास्पद आदेश को मंजूरी नहीं मिली है। मगर पाकिस्तान के शासकों ने जिस मकसद से यह आदेश जारी कर असेम्बली बनवाई थी, आखिर उससे वह काम लिया जा रहा है। इसी कठपुतली असेम्बली ने आखिरकार गिलगित- बाल्टिस्तान को पाकिस्तान का संवैधानिक अंग बनाने की मंजूरी देकर इस्लामाबाद के हाथ मजबूत कर दिए हैं।












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