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सन्नी लियोन का बर्थ डे याद मगर शहीद सुखदेव को भूले लोग

sukhdev
बिलाल एम जाफ़री
महज दो दिन पहले सन्‍नी लियोन का बर्थडे था। सुबह से ही ट्विटर पर बधाईयों का तांता लगा रहा। भारत समेत दुनिया भर के लोग सन्‍नी के दीवाने दिखे। टीवी चैनलों पर सन्‍नी के अब तक के सफर को जमकर परोसा गया। यूं कहिये कि हर दूसरे आदमी को सन्‍नी लियोन का बर्थडे याद रहा, लेकिन आज देश के महान क्रांतिकारी सुखदेव का जन्‍म दिन किसे याद रहा? युवाओं का देश कहे जाने वाले भारत में अगर ऐसा है, तो यह दुर्भाग्यवश एक क्रांतिकारी के बलिदान का तिरस्कार ही कहा जा सकता है।

देश के कुछ हिस्‍सों को छोड़ कर कहीं भी सुख देव का नाम नहीं। हमारा सवाल यह है कि ऐसा क्‍यों? मैंने कल भी इस विषय पर सोचा था। आज भी सोचा है। मैंने कल भी समाचार देखा था मैंने आज भी समाचार देखा है। कल जब टीवी खोला था तो मैं ये देख के आश्चर्य चकित रह गया की कैसे सारे चैनल सिर्फ कुछ अंको की टीआरपी के लिए दर्शकों को सन्नी लियोन के बारे में बता रहे हैं। कोई चैनल सन्नी के केक के बारे में बता रहा था तो कोई उनके कपड़ों के बारे में। कोई ये बताने में लगा था की सन्नी की पार्टी में कौन कौन लोग मौजूद थे।

चाहे टीवी हो अखबार हो या वेबसाईट सभी सन्नी पर मेहरबान दिखे। कई साइटों और अखबारों ने तो अपने मुख्यप्रष्ठ पर सन्नी लियोन के बड़े बड़े कटवेज तक लगवा दिए थे। चाहे ट्विटर हो फेसबुक हो बस हर जगह सन्नी ही सन्नी छाईं थी।

मुझे याद था की आज देश के लाल महान क्रांतिकारी सुखदेव का 105 वां जन्मदिन है दोस्तों ये वही सुखदेव थे जिन्होंने बेड़ियों में जकड़ी भारत माता को गुलामी की जंजीरों से आजाद कराने के लिए अपने प्राणों की आहूति दे दी। वो सुखदेव जो अपनी भरी जवानी में भगत सिंह के साथ फांसी के तख्ते पर लटका दिये गए थे। मैंने सोंचा था की आज का मीडिया उनको भी ऐसी ही कवरेज देगा जैसी उसने सन्नी लियोन को दी थी। लेकिन मीडिया का वर्तमान रूप और सौतेला व्यवहार देखकर मै बड़ा दुखी हुआ। आपको बताता चलूं की महान क्रांतिकारी सुखदेव का 15 मई 1907 को पंजाब के लायलपुर में हुआ था।

सुखदेव उन चुनिंदा स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में से एक हैं जिन्होंने बड़े ही कम समय में खुद को देश के नाम पर कुरबान कर दिया। इसके अलावा इन्होने भगत सिंह, कॉमरेड रामचंद्र, भगवती चरण बोहरा के साथ में मिलकर नौजवान भारत सभा का गठन किया था। साथ ही सुखदेव ने 1929 में जेल में बंद कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार के विरोध में राजनैतिक बंदियों द्वारा की गयी व्यापक हड़ताल में बढ चढ़कर हिस्सा लिया था। अपने देश प्रेम और भारत मां से प्रेम के चलते 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में अंग्रेज सरकार द्वारा इन्हें फांसी दे दी गयी। गौरतलब है की जिस समय इन्हें फांसी दी गयी उस समय इनकी आयु महज 24 साल थी।

अब भारत का एक आम नागरिक होने के नाते मेरा सवाल आपसे है, सरकार से है और इसी सरकार के चौथे स्तंभ यानी मीडिया से है। की क्या सुखदेव की कुर्बानी का कोई महत्त्व नहीं है? क्या उन्होंने व्यर्थ में जान दे दी? मै आप से ये नहीं कहता की इन क्रांतिकारियों के बारे में आप रोज अपने अखबार के किसी एक विशेष कॉलम में छापें। लेकिन आज के दिन एक कॉलम तो देश के इस वीर के नाम किया ही जा सकता था। भले ही आज आपके अखबार या वेबसाइट पर एक, दो कॉलम का विज्ञापन न छपता मगर आपके ऐसा करने मात्र से उस परिवार को कितनी खुशी होती जिस परिवार का ये लाल हंसते हंसते देश के नाम कुर्बान हो गया।

प्रायः ये देखने को मिलता है की लोग अपने बच्चों को किसी महान हस्ती से जोड़ते है ईश्वर न करे कहीं वो दिन आ जाये जब हमारे बच्चे हमसे कहें की मां / पिताजी मै सन्नी लियोन, बनना चाहती / चाहता हूं! तो जरा एक बार विचार करिये क्या बीतेगा आपके दिल पर। आज हमें असली स्टार को स्टार कहने में शर्म आ रही है। वहीं दूसरी तरफ हम ऐसे लोगों को याद रख रहे है जो सांस्कृतिक रूप में हमारे अंदर जहर भर रहे हैं हमें हमारे इतिहास से दूर कर रहे हैं। हमें मिल बैठ के इस तरह की किसी भी साजिश का अंत करना होगा । हम तभी विकसित हो सकते है जब हम अपने इतिहास को जाने और उसे याद रखे।

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