समय बचाइए और कीजिए सदुपयोग

जोगिन्दर सिंह

नई दिल्ली, 29 जनवरी (आईएएनएस)। मैंने अपने एक दोस्त जसबीर से पूछा कि मुझे उससे एक खास बात करनी है, उसे कौन-सा समय सूट करेगा? उसने बताया कि मैं उससे कभी भी मिल सकता हूं। मैंने उससे उसका खाली और अतिरिक्त समय जानने का आग्रह किया। उसने जवाब दिया कि उसके पास समय की कोई कमी नहीं है। मैंने उससे कहा कि मुझे उससे जलन हो रही है, क्योंकि मेरे पास इतना समय कभी नहीं होता और इसीलिए मैं ऐसी बात कभी नहीं कह पाऊंगा।

समय बहुत सीमित होता है, हमारे जीवन की सफलता और असफलता काफी हद तक इसी पर निर्भर करती है। यह हम पर ही निर्भर करता है कि हम अपने से जुड़ी बातों पर कितना समय निकाल पाते हैं? हमें ऐसी बातों के लिए समय अवश्य बचाना चाहिए।

अगर आप किसी न्योते को स्वीकार नहीं करना चाहते तो आपको 'हां' कहना जरूरी नहीं है। जब लोग मुझे फोन पर मिलने या भोजन का न्योता देते हैं तो मैं इसी तकनीक का इस्तेमाल करता हूं। मैं उन्हें बता देता हूं कि डायरी देखे बिना जवाब नहीं दे सकता। इस तरह मुझे उस बारे में सोचने का थोड़ा समय भी मिल जाता है।

हम अपने घर में इतना बिखराव कर लेते हैं और भूल जाते हैं कि हर नई आने वाली चीज को पुरानी चीजों के साथ ज्यादा देखभाल की जरूरत पड़ती है। हमारे कागजात और फाइलें भी बिखराव की वजह हैं। हम सब लोगों को पुराने जन्मदिन के कार्ड, अच्छे पत्र और पुरानी बैंक स्टेटमेंट तक रखने का शौक होता है। मैंने आज तक 1961 में मिला आई.पी.एस. का नियुक्ति पत्र और सेवा के दौरान सरकार से मिला प्रशंसा-पत्र संभालकर रखा हुआ है। मैंने उन्हें स्कैन करके नष्ट कर दिया, क्योंकि उनके साथ मेरा केवल भावनात्मक लगाव है। बिखराव संभालने का यह भी एक अच्छा तरीका है।

वैसे बड़े पैमाने पर सब कुछ व्यवस्थित करना अपने आप में बड़ा उबाऊ होता है। अपने घर या कार्यक्षेत्र में सप्ताह में एक बार किसी अलमारी या कोने को संभालने की योजना बनाएं। इस तरह हालात काफी हद तक आपके काबू में रहेंगे। इस तरह काम करने से मानसिक शांति भी मिलती है और काम करने में भी आसानी रहती है।

कई लोग समय की कमी की वजह से व्यायाम तक नहीं करते। यह हम सब पर ही निर्भर करता है कि हम गाड़ी पार्क कर दें और अपने गंतव्य तक पैदल चलकर जाएं। एक बार मैंने महसूस किया कि मैं काम के दबाव की वजह से चहलकदमी के लिए समय नहीं निकाल पा रहा था। तब मैंने अपने घर में नॉर्थ ब्लॉक तक चार किमी पैदल चलने का निश्चय कर लिया।

एक बार 'वीक' मैगजीन में छपा था- "हम एक ऐसी सभ्याता में जी रहे हैं जो दूसरी मंजिल तक स्वचालित सीढ़ियों से जाती है और शरीर की फिटनेस के लिए इलेक्ट्रॉनिक स्टेयर स्टेपर्स खरीदी जाती है। हम अरामदेह स्टोर्स से सारा सामान खरीदने के बाद अपनी ट्रेडमिल पर वापस आ जाते हैं। जी हां, ये मशीनें हमारे काम की मेहनत बचाती हैं। फिर हम और मशीनें खरीदते हैं, ताकि शरीर की बढ़ती चर्बी घटा सकें।"

मेरा एक व्यवसायी मित्र सुरेश, पंचतारा होटल के जिम में कसरत करने जाता है, जबकि उसके अपने घर में एक बहुत बड़ा बरामदा और तरणताल है। जिम जाने में कोई बुराई नहीं, लेकिन हम लोग अपनी दैनिक चर्या के बीच भी व्यायाम कर सकते हैं।

मेरा एक अमीर मित्र वीरेंद्र, फास्ट फूड और ढाबों के तले-भुने लजीज व्यंजनों का बेहद शौकीन है और इसके बाद वह बीमार रहने की शिकायत करता है। जब उसने मुझसे इस बारे में बात की तो मैंने उसे बताया कि एक समय ऐसा था, जब मैं भी तले-भुने मसालेदार भोजन का शौकीन था लेकिन जल्दी ही मुझे समझ आ गया कि यह स्वाद तो देते हैं लेकिन आपकी सेहत को खराब कर देते हैं।

(लेखक सीबीआई के पूर्व निदेशक हैं। डायमंड पॉकेट बुक्स प्रा. लि., नई दिल्ली से प्रकाशित पुस्तक 'सफलता का जादू' से साभार)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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