ममता बनर्जी की पार्टी पर किसका कब्जा? क्यों बागी गुट खुद को बता रहा है असली TMC? बगावत के बाद उठे सवाल का जवाब

Mamata Banerjee (TMC Rebellion): पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों एक ही सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में है। आखिर तृणमूल कांग्रेस (TMC) की असली कमान किसके हाथ में है? क्या पार्टी पर अब भी ममता बनर्जी का नियंत्रण (कंट्रोल) है या फिर बागी गुट संख्या बल के दम पर खुद को असली टीएमसी साबित करने की तैयारी में है?चुनाव में झटके के बाद शुरू हुआ असंतोष अब खुले शक्ति प्रदर्शन में बदलता दिखाई दे रहा है।

लोकसभा के 19 सांसदों द्वारा अलग गुट बनाने की आधिकारिक मांग के बाद ममता बनर्जी के सामने अपने पूरे राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा वजूद का संकट खड़ा हो गया है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि विधानसभा में लगभग 60 विधायकों के बागी होने के बाद वहां स्पीकर ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष (LoP) तक घोषित कर दिया है। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या ममता बनर्जी से उनकी खुद की बनाई पार्टी छिनने वाली है? आइए इस पूरी महा-बगावत की इनसाइड स्टोरी को समझते हैं।

Mamata Banerjee TMC Mps MLA

▶️क्या है TMC में बगावत की पूरी कहानी? (TMC Rebellion Explained)

किसी भी राजनीतिक दल में चुनावी हार सिर्फ सीटों का नुकसान नहीं होती, बल्कि नेतृत्व पर सवाल और भविष्य की रणनीति को लेकर असहमति भी पैदा करती है। टीएमसी के अंदर भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। सूत्रों के मुताबिक, विधानसभा चुनाव परिणाम आने के कुछ ही दिनों बाद पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा था। कई सांसदों और नेताओं को लगने लगा कि संगठन के भीतर उनकी बात नहीं सुनी जा रही है। यही नाराजगी धीरे-धीरे एक संगठित बगावत में बदल गई।

तृणमूल कांग्रेस के भीतर यह तख्तापलट कोई अचानक रातों-रात नहीं हुआ है, बल्कि इसके पीछे लंबे समय से सुलग रही राजनीतिक महत्वाकांक्षा और सत्ता की मलाई का खेल है। इस पूरे मामले का खुलासा एक सीक्रेट लेटर से हुआ है, जो पिछले महीने का है।

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4 मई 2026 को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे आए थे, जिसमें टीएमसी को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी थी। इस हार के ठीक 14 दिन बाद यानी 18 मई 2026 को ही टीएमसी के बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक सीक्रेट लेटर भेज दिया था। इस लेटर पर कुल 19 सांसदों के हस्ताक्षर हैं (नीचे टेबल में आप नाम देख सकते हैं)

लोकसभा सीट सांसद लोकसभा सीट सांसद
बारासात काकोली घोष दस्तिदार घाटाल दीपक अधिकारी (देव)
कूचबिहार जगदीश चंद्र बसुनिया झाड़ग्राम कालिपद सोरेन
जंगीपुर खलीलुर रहमान मेदिनीपुर जून मालिया
बहारामपुर यूसुफ पठान बांकुड़ा अरूप चक्रवर्ती
मुर्शिदाबाद अबु ताहेर खान बर्धमान पूर्व डॉ. शर्मिला सरकार
बैरकपुर पार्थ भौमिक हावड़ा प्रसून बंद्योपाध्याय
मथुरापुर बापी हलदार बोलपुर असित कुमार माल
जादवपुर सायोनी घोष बीरभूम शताब्दी रॉय
कोलकाता दक्षिण माला रॉय हुगली रचना बनर्जी
आरामबाग मिताली बाग

▶️ममता बनर्जी को पहले ही लग गई थी बगावत की भनक

इस बगावत की भनक ममता बनर्जी को लग गई थी, इसलिए उन्होंने डैमेज कंट्रोल करने के लिए 20 मई को लोकसभा स्पीकर को सूचना देकर कल्याण बनर्जी को नया चीफ व्हिप नियुक्त कर दिया था। लेकिन पासा पूरी तरह तब पलट गया जब खुद कल्याण बनर्जी और युवा नेता सायोनी घोष ने भी ममता और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के खिलाफ खुला मोर्चा खोल दिया।

बागी खेमे में कई चर्चित सांसदों के नाम सामने आए हैं। इनमें काकोली घोष, शताब्दी रॉय, यूसुफ पठान, माला रॉय, मिताली बाग, जगदीश चंद्र बर्मा और अन्य सांसदों का नाम शामिल बताया जा रहा है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिन नेताओं को कभी ममता बनर्जी के करीबी चेहरों के रूप में देखा जाता था, उनमें से कुछ अब खुलकर नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं।

बाद के चरण में सायोनी घोष और कल्याण बनर्जी के नाम भी राजनीतिक चर्चाओं में प्रमुखता से सामने आए। यही वजह है कि यह बगावत सिर्फ संख्या की लड़ाई नहीं रह गई है, बल्कि पार्टी के बड़े चेहरों के बीच प्रभाव की जंग भी बन गई है।

Mamata Banerjee TMC Trinamool Congress
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▶️क्यों खुद को असली TMC बता रहा है बागी गुट? (Why Rebels Claim To Be The Real TMC)

भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची यानी दल-बदल विरोधी कानून के तहत किसी भी पार्टी के बागी सांसदों या विधायकों को अपनी सदस्यता बचाए रखने और अलग गुट की मान्यता पाने के लिए कुल संख्या के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्यों का समर्थन होना अनिवार्य है। यदि टीएमसी के वर्तमान गणित को समझें, तो बागी गुट कानूनी रूप से पूरी तरह मजबूत नजर आ रहा है।

🔷लोकसभा का पूरा गणित: निचले सदन में टीएमसी के कुल 28 निर्वाचित सांसद हैं। कानून के मुताबिक दलबदल से बचने के लिए 19 सांसदों का साथ होना जरूरी है। शुरुआत में 18 मई के पत्र में 19 सांसद थे, लेकिन अब कल्याण बनर्जी और सायोनी घोष के शामिल होने से बागियों का आंकड़ा 21 पर पहुंच गया है, जो दो-तिहाई के जादुई आंकड़े से कहीं ज्यादा है।

🔷विधानसभा का ताजा हाल: बंगाल विधानसभा में टीएमसी ने 80 सीटें जीती थीं, जिनमें से 58 विधायक पहले ही 3 जून को अलग गुट बना चुके हैं और वहां के विधानसभा अध्यक्ष ने उनके स्वतंत्र गुट को कानूनी मान्यता भी दे दी है।

बागी सांसद जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया का दावा है कि उनके साथ अभी कुछ और सांसद भी आने वाले हैं। विद्रोह की वजह बताते हुए उन्होंने साफ कहा कि ममता बनर्जी और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं और नेताओं की बात सुनना पूरी तरह बंद कर चुके हैं।

वहीं दूसरी तरफ, ममता खेमे के वफादार सांसद कीर्ति आजाद ने आरोप लगाया है कि बीजेपी केंद्रीय एजेंसियों का डर दिखाकर और 10 लाख से लेकर 5 करोड़ रुपये तक के भारी कैश ऑफर देकर उनके सांसदों को खरीद रही है।

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▶️दिल्ली में सुवेंदु अधिकारी के साथ सीक्रेट मीटिंग, 15 जून को स्पीकर से मुलाकात

यह राजनीतिक संकट अब दिल्ली के गलियारों में अंतिम फैसले की तरफ बढ़ रहा है। सूत्रों और समाचार एजेंसियों से मिली जानकारी के मुताबिक, टीएमसी के बागी गुट के तमाम बड़े नेता रविवार यानी 14 जून को देश की राजधानी दिल्ली में पश्चिम बंगाल के सीएम सुवेंदु अधिकारी की मौजूदगी में एक बेहद हाई-प्रोफाइल मीटिंग करने जा रहे हैं। इस बैठक में भविष्य की रणनीति और कानूनी पहलुओं पर चर्चा होगी।

इसके ठीक बाद, सोमवार यानी 15 जून को यह बागी गुट औपचारिक रूप से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात करेगा। इस बैठक में वे स्पीकर के सामने संसद में अपने अलग स्वतंत्र विधायी गुट को मान्यता देने की मांग पुरजोर तरीके से रखेंगे। चूंकि बागी गुट के पास दो-तिहाई से ज्यादा का स्पष्ट बहुमत मौजूद है, इसलिए इस बात की पूरी संभावना है कि लोकसभा अध्यक्ष उनके गुट को असली तृणमूल कांग्रेस के रूप में मान्यता दे दें।

▶️क्या बंगाल में दोहराया जा सकता है शिवसेना वाला मॉडल? (Can Bengal Witness A Shiv Sena-Type Split)

बंगाल का यह पूरा सियासी घटनाक्रम ठीक उसी ढर्रे पर चल रहा है जैसा ठीक 4 साल पहले यानी 20 जून 2022 को महाराष्ट्र में देखने को मिला था। तब शिवसेना के कद्दावर नेता एकनाथ शिंदे ने तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत कर दी थी और 55 में से 40 विधायकों को लेकर अलग हो गए थे। उस समय उद्धव ठाकरे ने फ्लोर टेस्ट से ठीक पहले इस्तीफा दे दिया था और बाद में 30 जून 2022 को शिंदे ने भाजपा के समर्थन से सरकार बना ली थी।

उस समय भी यह कानूनी लड़ाई विधानसभा अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट तक गई थी। आखिरकर 10 जनवरी 2023 को महाराष्ट्र के स्पीकर ने फैसला सुनाया था कि बगावत के वक्त बहुमत शिंदे के साथ था, इसलिए वही असली शिवसेना है। बाद में भारत निर्वाचन आयोग ने भी शिवसेना का नाम और उनका पारंपरिक 'धनुष-बाण' चुनाव चिह्न शिंदे गुट को सौंप दिया था। टीएमसी के बागी भी इसी तर्ज पर चुनाव आयोग के सामने ममता बनर्जी की पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न 'जोड़ा फूल' पर दावा ठोकने की पूरी तैयारी कर चुके हैं।

▶️ममता बनर्जी के पास अब क्या बचा? सांसदों-विधायकों का तेजी से सफाया

इस महा-बगावत ने ममता बनर्जी के साम्राज्य को पूरी तरह से सिकोड़ कर रख दिया है। पिछले महज चार दिनों के भीतर जिस रफ्तार से पार्टी टूटी है, वह राजनीतिक विश्लेषकों को भी हैरान कर रही है। यदि वर्तमान स्थिति पर नजर डालें, तो ममता बनर्जी के पास अब सिर्फ नाममात्र की ताकत बची है।

🔷संसद में स्थिति: लोकसभा के 28 में से 20 सांसदों के अलग हो जाने के बाद ममता बनर्जी के पास अब सिर्फ 8 सांसद बचे हैं। वहीं राज्यसभा में भी भारी भगदड़ मची है। पिछले 4 दिनों में 4 बड़े राज्यसभा सांसदों-सुखेंदु शेखर (8 जून), सुष्मिता देव (10 जून), प्रकाश चिक और कोयल मलिक (11 जून) ने संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है, जिससे ऊपरी सदन में दीदी के पास अब केवल 9 सांसद रह गए हैं।

🔷बंगाल विधानसभा का हाल: 80 विधायकों में से 58 के बागी गुट में चले जाने के बाद ममता बनर्जी के खेमे में अब सिर्फ 22 विधायक ही बचे हैं।

Mamata Banerjee TMC Trinamool Congress

हालांकि ममता बनर्जी का वफादार गुट इस पूरी प्रक्रिया को असंवैधानिक बता रहा है और इस मामले को देश की सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कह रहा है। लेकिन फिलहाल के जमीनी समीकरण यह साफ बता रहे हैं कि पश्चिम बंगाल की सत्ता और तृणमूल कांग्रेस संगठन पर से ममता दीदी का कंट्रोल पूरी तरह खो चुका है और बागी गुट खुद को असली टीएमसी साबित करने के बेहद करीब है।

▶️आगे क्या हो सकता है?

आने वाले दिनों में सभी निगाहें लोकसभा अध्यक्ष और अन्य संवैधानिक प्रक्रियाओं पर टिकी रहेंगी। यदि बागी गुट अपनी संख्या साबित कर देता है तो राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। वहीं ममता बनर्जी का गुट इस पूरी प्रक्रिया को कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर चुनौती दे सकता है।

फिलहाल इतना साफ है कि यह सिर्फ कुछ नेताओं की नाराजगी नहीं रह गई है। यह लड़ाई अब इस सवाल तक पहुंच चुकी है कि आखिर बंगाल की सबसे बड़ी क्षेत्रीय पार्टी पर असली अधिकार किसका है। और जब तक इस सवाल का संवैधानिक जवाब नहीं मिल जाता, तब तक टीएमसी की सियासत में उठी यह बगावत थमने वाली नहीं दिखती।

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