मुस्कुराहट को वरदान में बदलिए
जोगिन्दर सिंह
नई दिल्ली, 13 दिसम्बर (आईएएनएस)। हम सभी गलतियां करते हैं और बाद में सोचते हैं काश हमने ऐसा नहीं किया होता। कोई भी गलतियों से सुरक्षित नहीं है। उन परिस्थितियों से जो महत्वपूर्ण पाठ पढ़ना होता है, उससे हमें कैसे फायदा हो सकता है। एक बार यदि हमारा हाथ आग में डालने से या जलते को छूने से या गर्म चीज को छूने से जल जाता है तो शायद ही हम फिर से ऐसा करते हैं। यहां तक कि बच्चे व जानवर का भी गिरना और मरना हो सकता है।
हमारी हार हमारे लिए चेतावनी है। सबसे बड़ी चुनौती उससे आशय निकालकर एवं उसे फायदे में तबदील करना है। यह वो अग्निपरीक्षा है जिसका हम प्रतिदिन जीवन में मुकाबला करते हैं।
हमें अपनी गलतियों को अपने सिद्धांत के रूप में एवं अपनी जानकारी के रूप में लेना चाहिए। गलतियां चेतावनी और इस बात की सूचक है कि किसी भी विपरीत परिस्थिति से निपटने के लिए हम अपने तरीके से कहां बदलाव व सुधार लाते हैं। अपनी गलतियों पर पश्चाताप करने की जगह बाधाओं को अनुभव के रूप में लेना चाहिए। यदि कोई घटना आपकी अपनी गलतियों के कारण घट जाती है तो आप इस बात की खोज कीजिए कि ऐसा क्यों हुआ। आप खुद को किसी गलती के लिए दोषी न ठहराएं।
आपको इसकी जगह इसका आकलन करें एवं कुछ कदम उठाएं, ताकि भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति न हो और आप आगे बढ़ें। अत: आप इसके लिए जिम्मेवार हैं कि उससे क्या निकलता है? एकमात्र सावधानी जो आपको बरतनी चाहिए वो है कि आप दुबारा वही गलती नहीं दुहराएंगे। जीवन में कुछ भी करते हैं या जो भी पसंद करते हैं उनमें मुश्किलें हमेशा होती हैं। आप अपने काम करने के विकल्पों व विचारों से सीखें। बहुत बार ऐसा होता है।
मेरे स्वर्गवासी पिता महंत करतार सिंह चाहते थे कि मुझे पढ़कर जीवन में कुछ करना चाहिए। वो मुश्किलों के बावजूद मेरे स्कूल व हॉस्टल के लिए मुझ पर 20 रूपये प्रति माह खर्च करते थे। उस समय मैं फिरोजपुर में 1953 से 55 तक था। वो खुद मैट्रिक पास थे जो कि 1937 में एक बड़ी सफलता थी। वह ये देखते थे कि मैं उस समय के पंजाब के सर्वश्रेष्ठ कॉलेज में जाता था। दूसरों को भारतीय सर्विस परीक्षा में सफल होते देख, मैं भी परीक्षा में शामिल हुआ एवं भारतीय पुलिस सर्विस के लिए चयनित हो गया।
मेरी स्वर्गवासी मां मेरी शिक्षा के खिलाफ थी। वह दुकान खोलकर मुझे किराना विक्रेता बनाना चाहती थीं। उसने कभी खुलकर नहीं कहा पर सच्चाई ये भी कि मेरे अभिभावक मेरे स्कूल और बाद में कॉलेज के खर्चे बमुश्किल जुटा पाते थे। परंतु जो चीज उस समय गलत थी वो न सिर्फ मेरे बल्कि मेरे अभिभावक के लिए भी दुआ बन गई एवं उससे गांव मुझ पर गर्व करने लगा। अनजाने में वरदान साबित हो गया।
अगली बार आप गलती करते हैं, मुस्कुराहट एवं उसको वरदान में बदलने की संभावनाओं पर विचार कीजिए। ये गलतियां ही होती हैं जो आकलन करती है कि जीवन में क्या सुधार चाहिए। बिना गलतियों के हम नहीं जान पाते, हमें किस पर काम करना चाहिए ताकि जीवन स्तर ऊंचा उठे। गलतियां हमें अगला मौका देती हैं कि हम सीखें एवं अच्छे हों। वस्तुत: गलतियां आविष्कार के दरवाजे हैं। गलतियों से नीचे आना कोई दोष या जुर्म नहीं है, पर वहां ठहरना है।
यदि आपने कोई गंभीर गलती भी किया है आपके पास हमेशा अगला मौका होता है। हम हार को क्या कहते हैं, नीचे जाने को नहीं, बल्कि नीचे रहने को। गलतियां आविष्कार के द्वार हैं। हमें अपना समय पश्चाताप या क्षम प्रार्थना में बर्बाद नहीं करना चाहिए, बल्कि हमें आगे उज्जवल भविष्य की तरफ देखना चाहिए। बीता हुआ समय ठीक नहीं हो सकता लेकिन आने वाले कल के लिए हम कुछ कर सकते हैं। हमें भविष्य में क्या करना चाहिए ये हमारी क्षमता पर निर्भर करता है।
हमें अपनी गलतियों पर हंसकर आगे बढ़ना चाहिए। जीवन की सबसे बड़ी गलती है कि हम लगातार गलती करने से डरते रहे। केवल एक ही इंसान है जो गलती नहीं करता वो है जो काम नहीं करता। गलती जीवन की एक सच्चाई एवं हकीकत है। एक बार भूतपूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति थेरोड रूजवेल्ट ने कहा, "आलोचक वे नहीं है जो गिनते है, न ही वे लोग हैं जो बताते हैं कि महान व्यक्ति कैसे गिरे या कहां करने वाले और इच्छा कर सकते थे।
इसका श्रेय उस व्यक्ति को जाता है जो वास्तव में इस परिस्थिति में होता है, जो साहसिक प्रयास करता है बार बार गिरकर उठाता है जो उत्साह समर्पण को जानता है और अपने आप को एक विशिष्ट कारण के न्योछावर करता है, जो सफलता को जानता है और असफल हो जाने के बुरे परिणाम को भी जानता है। ऐसे लोग उन लोगों की श्रेणी में कभी भी नहीं आते जो जीत या हार को जानते ही नहीं।"
(लेखक सीबीआई के पूर्व निदेशक हैं। डायमंड बुक्स प्रा.लि. से प्रकाशित उनकी पस्तक 'सफलता का जादू' से साभार)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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