बाबरी विध्वंस की बरसी- 'अयोध्या' एक गरीब और लाचार शहर...
कितनी हैरत की बात है ना कि अयोध्या के नाम पर हमेशा हमारे देश के नेतागण चुनाव लड़ते हैं और चुनाव जीत भी जाते है लेकिन किसी ने भी इस शहर के बारे में कभी नहीं सोचा। ना ही किसी ने यहां की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने की कोशिश की। मंदिर-मसजिद की बांटने वाले राजनेताओं ने यहां चुनाव जीतने के लिए मत्था जरूर टेका लेकिन किसी ने भी वहां रहने वालों की सुध नहीं ली। हमारे नेता यहां मंदिर जरूर बनवाना चाहते हैं लेकिन कभी भी शहर के विकास की बात नहीं करते हैं।
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चूंकि अयोध्या फ़ैज़ाबाद ज़िले में आता है। इसलिए यहां के बच्चों को अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए फैजाबाद जाना पड़ता है। यही कारण है कि अयोध्या की लड़कियां अपनी पढ़ाई आगे नहीं कर पाती हैं। या तो उन्हें प्राईवेट फार्म भरना पड़ता है या अपनी पढ़ाई से हाथ धोना पड़ता है। क्योंकि उनके घरवाले उन्हें फैजाबाद नहीं भेज सकते हैं, क्योंकि अयोध्या से फैजाबाद जो बसें चलती है वो लड़कियों के लिए सुरक्षित नहीं है।
हम देश की तरक्की की बात करते है, कहते हैं युवाओं को आगे आना चाहिए लेकिन युवा कैसे आगे आयेंगे? क्या अयोध्या में रहने वाले युवा 'युवा वर्ग' की श्रेणी में नहीं आते हैं। देश भर में युवाब्रिगेड तैयार करने वाले कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी आखिर आज तक एक बार भी अयोध्या क्यों नहीं गए? क्या उन्हें ये लगता है कि अयोध्या के युवा देश की तरक्की में साथ नहीं दे सकते हैं? हमेशा रामलला को अपना बताने वाली भाजपा पार्टी ने भी आखिर आज तक अयोध्यावासियों के क्यों कुछ नहीं किया? हमेशा वो कहती है अयोध्या और राम पर उसका एकाधिकार है तो फिर क्यों आज तक वहां के लोग अपनी बेबसी और लाचारी पर आंसू बहा रहे हैं?
हिंदु-मुस्लिम भाईयो का रहनुमा बनने वाले मुलायम सिंह यादव ने आज तक कभी अयोध्या के विकास के लिए जंग क्यों नहीं छेड़ी क्या इसके पीछे कारण उन्हें अपने मुस्लिम वोटों के खो जाने का डर था? और सबसे बड़ा सवाल राज्य की मुख्यमंत्री मायावती जी से, आज तक उनकी सरकार ने अयोध्या के लिए क्यों कुछ नहीं किया। दो बार से लगातार राज्य के सीएम की कुर्सी संभाल रही माया की माया अयोध्या पर क्यों मेहरबान नहीं होती? अयोध्या से चंद कदम की दूरी पर माया का अपना शहर अंबेडकरनगर है, वहां बिजली है, पानी है, सड़के हैं, अस्पताल है, स्कूल है, कॉलेज है, लेकिन अयोध्या में ऐसा कुछ भी नहीं है आखिर क्यों?
मौजुदा हालात से हमें अयोध्या के नाम पर या तो भगवान राम का जन्म स्थान याद आता है या बाबरी विध्वंस का काला अध्याय इसके अलावा कुछ नहीं। 6 दिसंबर जब आता है तो अयोध्या सुर्खियों आ जाता है, सरकार वहां सुरक्षा-चौकसी बढ़ा देती है। उसके बाद अयोध्या का नाम भी नहीं लिया जाता आखिर कब तक हम केवल धर्म और विवाद के नाम पर इस शहर को याद करते रहेंगे? सच्चाई ये ही है कि भगवान की धरती 'अयोध्या' बेहद गरीब और लाचार है।
अब आप ही बताइये कि क्या हम गलत है? अपनी प्रतिक्रिया नीचें कमेंट बॉक्स में जरूर दें।













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