मुटठी भर फिल्मों के शानदार अभिनेता निर्मल पांडे

Nirmal Pandey
अक्सर ऐसा होता है कि कुछ लोग जीते जी याद किए जाने के बजाए गुजर जाने के बाद ज्यादा याद किए जाते हैं। कुछ ऐसा ही हुआ है अभिनेता निर्मल पांडे के चले जाने के बाद। दिल का दौरा पड़ने से कल मुंबई के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया। वो 48 वर्ष के थे।

निर्मल का पहला प्‍यार रंगमंच

नैनीताल के रहने वाले निर्मल पांडे ने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से स्नातक करने के बाद फिल्मों में किस्मत आजमाने के लिए सपनों के शहर मुंबई का रुख किया था। लेकिन उनका पहला प्यार रंगमंच ही रहा औऱ उन्होंने अपना कैरियर थियेटर से शुऱु किया। एनएसडी से निकलने के बाद वो लंदन के एक थियेटर ग्रुप 'तारा' से जुड़ गए। इस ग्रुप के साथ मिलकर निर्मल ने 'हीर-रांझा' औऱ 'एंटीगोन' जैसे सफल नाटक किए।

अपने पूरे करियर में निर्मल ने लगभग 125 नाटकों मे काम किया। ये उनके करियर का सबसे शानदार दौर था। साल 1996 में उन्हें शेखर कपूर निर्देशित 'बैंडिट क्वीन' में काम करने का मौका मिला। इस फिल्म में उन्होंने फूलन देवी के पति विक्रम मल्लाह की भूमिका निभाई जिसके लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा।

इसी साल निर्मल पांडे की दो और फिल्में आईं। इसमें एक थी अमोल पालेकर द्वारा निर्देशित 'दायरा' औऱ दूसरी सुधीर मिश्रा की 'इस रात की सुबह नहीं'। 'दायरा' में हिजड़े की भूमिका निभाने के लिए उन्हें फ्रांस फिल्म महोत्सव में पुरस्कार भी मिला। इसके बाद साल 1998 में आई फिल्म 'ट्रेन टू पाकिस्तान' औऱ उसके अगले साल 'आई हम तुम पे मरते हैं।'

कमर्शियल फिल्‍मों में भी बेहतरीन अभिनय

करियर की शुरुआत ऑफबीट सिनेमा से करने वाले निर्मल ने बाद में कमर्शियल फिल्मों में भी काम किया लेकिन उन्हें अपनी पसंद का काम करने को नहीं मिला। इसे किसी कलाकार की मजबूरी ही कहेंगे की निर्मल पांडे को कुछ बी ग्रेड फिल्मों में भी काम करना पड़ा। उन्हें हाल ही में रिलीज कन्नड़ फिल्म 'केड़ी' में देखा गया था।

उनकी आने वाली फिल्म लाहौर इस शुक्रवार को रिलीज हुई है। इसमें उन्होंने एक पाकिस्तानी युवक का किरदार निभाया है। कई बॉलीवुड हस्तियों ने सोशल नेटवर्किंग साइट टि्वटर पर निर्मल को याद किया है। सिर्फ मुट्ठी भऱ फिल्मों के दम पर हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान कायम करने वाले निर्मल पांडे के करियर को देखकर साफ है कि बॉलीवुड उन्हें वो नाम और वो मुकाम नहीं दे पाया, जो उन्हें मिलना चाहिए था।

अपनी राह खुद बनाने वाले निर्मल को उस नाम और मुकाम की कभी कमी महसूस नहीं हुई। वो अपने काम के दम पर जाने जाते रहे और भविष्‍य में भी हमेशा याद किए जाएंगे।

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