मार्टिन लूथर किंग पर विशेष लेख

मोहिनी माथुर

मोहिनी माथुर

नई दिल्ली, 8 मार्च (आईएएनएस)। अमेरिका में अश्वेतों की आजादी के लिए दशकों तक संघर्ष करने वाले मार्टिन लूथर किंग 'जुनियर' की शहादत को 40 वर्ष पूरे हो चुके हैं। उनका लक्ष्य उन्हें अपने जीवनकाल में तो हासिल नहीं हो सका, क्योंकि 9 अप्रैल, 1968 को उन्हें गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई थी।

लेकिन क्या अब 40 साल बाद उनका सपना पूरा होने जा रहा है। जब रिपब्लिकन पार्टी के बराक ओबामा जो कि अश्वेत हैं और अमेरिकी राष्ट्रपति की कुर्सी के करीब पहुंचते दिखाई दे रहे हैं। गौरतलब है कि इन दिनों अमेरिका में मार्टिन की शहादत की याद में सप्ताह मनाया जा रहा है।

अपनी हत्या के कोई पांच वर्ष पूर्व मार्टिन लूथर किंग ने वाशिंगटन में एक बड़ी रैली को संबोधित करते हुए कहा था - 'मेरा एक सपना है।'

इस रैली में अमेरिका के हर कोने से लाखों अश्वेत आए थे। गोरों ने भी बड़ी संख्या में उस रैली में शिरकत की थी। उस रैली के बाद जब मार्टिन लूथर किंग राष्ट्रपति जान एफ केनेडी से मिलने गए थे तो केनेडी ने उनका स्वागत करते हुए रैली में कहा गया उन्हीं का वाक्य दोहराया था कि 'मेरा एक सपना है।'

उस दिन मैदान पर जब शाम के साए उतरने लगे थे और लोग वापस जाने की तैयारी कर रहे थे उसी समय घोषणा की गई कि अब मार्टिन लूथर किंग, जूनियर रैली को संबोधित करेंगे। इस नाम से पूरे जनसमूह में एक बिजली-सी दौड़ गई। चारों तरफ बैनर लहराने लगे, हमें प्रथम श्रेणी की नागरिकता चाहिए जार्जिया में हुए पुलिस अत्याचार की निष्पक्ष जांच हो आदि। चारों तरफ इतना शोर और गहमागहमी शुरू हो गई जैसे रैली अभी शुरू हुई हो। शोर इतना था कि मार्टिन को भाषण शुरू करने के पहले काफी देर प्रतीक्षा करनी पड़ी।

मार्टिन ने अपनी भारी आवाज में बोलना शुरू किया, मुझे खुशी है कि आज मैं एक ऐसे समय में आपके साथ हूं जो इस देश के इतिहास के एक सबसे महत्वपूर्ण क्षणों में गिना जाएगा।

सौ साल पहले उस महान अमेरिकी ने, जिसकी छाया में (लिंकन की मूर्ति) हम खड़े हैं, 'आजादी की घोषणा पत्र' पर हस्ताक्षर किए थे। यह घोषणापत्र उन लाखों अश्वेत गुलामों के जीवन में आशा की किरण लेकर आया था जो सदियों से अन्याय की आग में झुलस रहे थे। उन लोगों को लगा था कि दुख की काली रात अब समाप्त होने वाली थी।

आज मुझे इस बात की चिंता नहीं है कि आपमें से बहुत से लोग कष्ट करके यहां आए हैं। कुछ लोग जेल से सीधे आए हैं। कुछ उन क्षेत्रों से आए हैं जहां आए दिन नीग्रो को पुलिस के हाथों उत्पीड़न सहना पड़ता है। आपने मौन रह कर अन्याय व हिंसा का सामना किया है याद रखिए कि यह मौन पीड़ा ही मुक्ति व आजादी का रास्ता दिखाएगी।

हम अपने क्षेत्रों में वापस चले जाएं, मिसीसिपी, अलाबामा, दक्षिण कोरौलिना, जार्जिया, लुसियाना व अन्य उत्तरी शहरों की बस्तियों में इस विश्वास के साथ लौट जाएं कि दुर्दिन व दुरावस्था बहुत दिन तक नहीं चलेगी। मित्रों, हालांकि आज हमारे सामने भारी दिक्कतें हैं, फिर भी मेरा एक सपना है और इस सपने की जड़ें अमेरिकी सपने में ही हैं।

मेरा सपना है कि एक दिन जार्जिया के पुराने गुलामों व पुराने जमींदारों के बेटे भाईचारे के साथ एक ही जगह रहें।

मेरा सपना है कि मिसीसिपी जैसी जगह, जो आज अन्याय व उत्पीड़न का केंद्र बनी हुई है एक दिन न्याय व आजादी का केंद्र बने।

मेरा सपना है कि एक दिन मेरे चार बच्चे ऐसे अमेरिका में सांस लें जहां उन्हें उनकी चमड़ी के रंग के आधार पर नहीं बल्कि उनके चरित्र व कार्यो के आधार पर परखा जाए।

मेरा सपना है कि सुदूर अलाबामा में, जहां रंगभेद का बोलबाला है, जहां का गर्वनर नीग्रो के अधिकारों को नकारने का कोई अवसर नहीं चूकता, वहां एक दिन नीग्रो लड़कियां व लड़के, गोरे लड़के-लड़कियों का दोस्ताना अंदाज में हाथ पकड़ सकेंगे।

'मेरा सपना है कि एक दिन अलगाववाद की सारी खाइयां पाट दी जाएंगी, मुश्किलों के पहाड़ मिट जाएंगे, ऊबड़-खाबड़ रास्ते समतल हो जाएंगे और इस दिव्य दृश्य को अमेरिका का हर नागरिक (बिना रंगभेद के) साथ-साथ देखेगा। यही मेरा सपना है।

यही मेरी आशा है। इसी विश्वास के साथ मैं दक्षिण लौटूंगा। इसी विश्वास के सहारे निराशा व अन्याय के इस पहाड़ को हम तोड़ेगें। इसी विश्वास के साथ हम साथ-साथ काम कर सकेंगे, साथ-साथ प्रार्थना कर सकेंगे, साथ-साथ संघर्ष कर सकेंगे व साथ-साथ जेल जाएंगे और अपनी आजादी के लिए इस आशा के साथ एक साथ खड़े होंगे कि आजादी हमें जल्दी ही मिलेगी।

यह वह दिन होगा जब ईश्वर का हर बंदा गा सकेगा, 'ए मेरे वतन, मैं तेरा गुणगान करता हूं। तेरी भूमि पर मेरे पुरखों ने अंतिम सांस ली। यहां आकर हर व्यक्ति गौरवान्वित महसूस करता है। तेरे हर कोने से, तेरे हर पहाड़ की वादी से आजादी का स्वर गुंजित हो।

यदि अमेरिका को एक महादेश बनना है तो यह सच होकर रहेगा। न्यू हैम्पशायर की पहाड़ियों से, न्यूयार्क के ऊंचे शिखरों से, पेन्सिलवेनिया की वादियों से आजादी के स्वरों की ही गूंज सुनाई देगी।

कॉलेरेडो के हिम आच्छादित शिखरों से, कैलिफोर्निया की वादियों से, जार्जिया के पथरीले पहाड़ों से, टेनिसी के लुकआउट पर्वतों से, मिसीसिपी की घाटियों से, देश के हर कोने से आजादी का स्वर गुंजित होने दो। और जब ऐसा होगा, जब हर गांव से, हर झोपड़ी से, हर राज्य से, हर शहर से आजादी का स्वर गूंजेगा तभी ईश्वर का हर बंदा, नीग्रो व गोरा, यहूदी व ईसाई, प्रोटेस्टेंट व कैथलिक हाथ में हाथ डालकर एक साथ गा सकेगा आजादी! अंत में आजादी मिल ही गई। ईश्वर तुझे लाख-लाख शुक्रिया कि हम आजाद हैं। (एक नीग्रो प्रार्थना)

अमेरिका के हर कोने से आजादी का स्वर गूंजा या नहीं यह तो पता नहीं। लेकिन राजधानी वाशिंगटन उस दिन मार्टिन के भाषण से हिल गई। अमेरिकियों ने अपने जीवनकाल में न तो ऐसा भाषण सुना था और न ही लिंकन के बुत के साए में ऐसी सभा कभी हुई थी। और हिल तो राष्ट्रपति कैनेडी भी गए थे।

भाषण समाप्त होने पर जो तालियां बजीं उनकी गूंज निश्चित ही व्हाइट हाउस तक पहुंची होगी, क्योंकि रैली के बाद जब मार्टिन कुछ अन्य नेताओं के साथ राष्ट्रपति केनेडी से मिलने गए तो उन्होंने गर्मजोशी से मार्टिन से हाथ मिलाते हुए कहा, मेरा एक सपना है। इसके बाद उन्होंने सबको संबोधित करते हुए कहा, प्रशासन का अब लगातार प्रयत्न रहेगा कि अश्वेतों को अधिक से अधिक काम मिले और नौकरियों में उनके साथ भेदभाव न किया जाए।

(लेखिका ने हाल ही में मार्टिन लूथर किंग जूनियर की जीवनी लिखी है जो पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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