टिकैत-माया विवाद का राजनीतिक सच

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री मायावती और भारतीय किसान यूनियन के नेता महेंद्र सिंह टिकैत के बीच उपजा विवाद किसान और दलित आंदोलन की असलियत को भी सामने लाता है। यह विवाद साफ कर देता है कि उत्तर भारत में किस तरह से राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों की पैरोकारी करने वाले अपने निजी छवि और हितों की लड़ाई तक सीमित हो गए हैं। इस पूरी लड़ाई को एक दिलचस्प प्रतीकात्मक कथा के रूप में देखा जा सकता है।

किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के मायावती के खिलाफ जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल इस बात का प्रतीक है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातिगत भावनाएं कितने भीतर तक पैठी हुई हैं, जो अब सामान्य लोकाचार या शिष्टाचार को तोड़कर सीधे आक्रामक रुख अपना रही हैं।

ठीक इसी तरह से माया और टिकैत के बीच टकराव को व्यापक संदर्भों में लेने की जरूरत है। उत्तर प्रदेश और बिहार में जातीय हिंसा का पुराना इतिहास रहा है। यूपी में दलित राजनीति के उभार और नक्सलवाद के पीछे यही जातीय भावना काम करती है। यह समझना मुश्किल है कि खुद के अपमान से आहत मायावती किस हद तक तब आहत होती होंगी जब यूपी के गांवों से जब-तब दलित स्त्रियों को निर्वस्त्र घुमाए जाने या उन्हें जिंदा जलाने की खबरें आती हैं।

महेंद्र सिंह टिकैत के इतिहास पर गौर करें तो उन्होंने व्यापक समर्थन और बहुमत की बड़ी ताकत हासिल करने के बावजूद खुद को जाति विशेष तक सीमित कर लिया है। देखा जाए तो जाति तक सीमित रहना ही टिकैत या माया की बड़ी ताकत बन जाता है। माया को हमेशा अपने वोट बैंक पर भरोसा रहा है। हालांकि पिछले चुनाव में मायावती ने ब्राह्मण नेताओं को टिकट देकर ब्राह्रणवाद के खिलाफ चल रही अपनी सारी लड़ाई को एक 'यू टर्न' दे डाला।

कुल मिलाकर हम अगर हम उत्तर प्रदेश में दलित और किसान आंदोलन के इन दो ध्रुवों का बीता इतिहास देखें तो यह साफ हो जाता है कि आंदोलनों को अपने नेताओं से कुछ नहीं मिला बल्कि इन्होंने हमेशा आंदोलनों को सही दिशा में जाने से रोका है। जमीनी हकीकत से उपजे मुद्दों को इन्होंने हमेशा सत्ता और खुद की राजनीतिक ताकत हासिल करने के लिए कैश किया।

तो टिकैत और माया के बीच कोई राजनीतिक या नितिगत मुद्दों की लड़ाई नहीं है। यह पूरी तरह से निजी स्वार्थों और कुछ की छवि के महिमामंडन से जुड़ी लड़ाई है। दुर्भाग्य से यह देश के ज्यादातर नेताओं का सच है।

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