डॉक्टर नहीं अब 'कुत्ता' लगाएगा इस बीमारी का पता, वैज्ञानिकों की चौंकाने वाली खोज
Parkinson's Disease Detection by Dogs: एक नई वैज्ञानिक खोज ने यह साबित कर दिया है कि कुत्ते सिर्फ वफादार साथी ही नहीं, बल्कि चलती-फिरती 'डायग्नोस्टिक मशीन' भी बन सकते हैं। ब्रिटेन में किए गए एक ताजा अध्ययन में यह हैरान करने वाला खुलासा हुआ है कि विशेष रूप से प्रशिक्षित कुत्ते केवल त्वचा की गंध से यह पहचान सकते हैं कि कोई व्यक्ति पार्किंसन जैसी गंभीर और जटिल तंत्रिका संबंधी बीमारी से पीड़ित है या नहीं।
इस खोज से यह संकेत मिलता है कि इंसानी त्वचा से निकलने वाले रासायनिक यौगिक यानी बायोमार्कर पार्किंसन रोग के शुरुआती पहचान का जरिया बन सकते हैं। ऐसे समय में जब इस बीमारी का कोई निश्चित और आसान टेस्ट उपलब्ध नहीं है, यह तकनीक निदान की दुनिया में क्रांति ला सकती है।

कुत्तों को बनाया गया 'स्मेल डिटेक्टर'
इस अनोखी रिसर्च में दो कुत्तों को करीब 38 से 53 हफ्तों तक विशेष प्रशिक्षण दिया गया। उन्हें सेबम यानी त्वचा से निकलने वाले तेल से लिए गए 205 सैंपलों को सूंघकर यह पहचानने की ट्रेनिंग दी गई कि कौन-से सैंपल पार्किंसन रोग से पीड़ित व्यक्तियों के हैं और कौन से नहीं। प्रत्येक बार जब कुत्ते ने किसी पॉजिटिव केस (रोगी) की सही पहचान की, या निगेटिव केस (स्वस्थ व्यक्ति) को सही तरह से नजरअंदाज़ किया, तो उसे इनाम दिया गया। इस प्रक्रिया ने उनकी पहचान क्षमता को और भी सटीक बना दिया।
क्या निकला रिजल्ट? हैरान कर देने वाले आंकड़े
- कुत्तों ने 80% सटीकता के साथ पार्किंसन रोगियों (Parkinson's detection methods) की सही पहचान की।
- वहीं 90% से ज्यादा सटीकता के साथ उन्होंने स्वस्थ लोगों को सही पहचाना।
- शोधकर्ताओं का कहना है, यह अध्ययन पहले के निष्कर्षों को मजबूती देता है कि कुत्तों को पार्किंसन रोग की गंध को विश्वसनीय तरीके से पहचानने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है।
ये भी पढ़ें AI for Mental Health: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस रखेगा आपकी मेंटल हेल्थ का ध्यान, करेगा इमोशनल हेल्थ ट्रैकिंग
प्रमुख शोधकर्ता क्या बोले
निकोला रूनी, 'ब्रिस्टल विश्वविद्यालय की एसोसिएट प्रोफेसर और अध्ययन की प्रमुख लेखिका ने कहा, इस अध्ययन में कुत्तों ने उच्च सेंसिटिविटी और स्पेसिफिसिटी हासिल की, जो दर्शाता है कि पार्किंसन रोगियों में एक विशेष 'गंध' होती है।'
पेरडिटा बार्रान, मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी की मास स्पेक्ट्रोमेट्री की प्रोफेसर ने कहा, 'यह स्टडी इस बढ़ते सबूत को मजबूत करती है कि त्वचा के साधारण और गैर-आक्रामक स्वैब से भी पार्किंसन रोग का पता लगाया जा सकता है। इससे शुरुआती चरण में तेज और अधिक सुलभ पहचान संभव हो सकेगी। यह अध्ययन Journal of Parkinson's Disease में प्रकाशित हुआ है और यह भविष्य में एक तेज, सस्ता और सटीक डायग्नोस्टिक विकल्प विकसित करने की दिशा में अहम साबित हो सकता है।
ये भी पढ़ें Kitchen towels & Disease: कहीं आपकी बीमारी की वजह 'किचन टॉवल' तो नहीं? नई स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा












Click it and Unblock the Notifications