Dinesh Trivedi ने "दमघोंटू" बताकर ममता बनर्जी से अपने अपमान का बदला लिया?
नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल चुनाव से ठीक पहले ममता बनर्जी को शुक्रवार को बहुत ही तगड़ा सियासी झटका लगा है। दिल्ली में उनकी पार्टी के प्रमुख चेहरे और पूर्व रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी ने संसद में खड़े होकर राज्यसभा से इस्तीफे का ऐलान कर दिया। लेकिन, उन्होंने अपने इस्तीफे की जो वजहें बताई हैं, वह चुनावी साल में तृणमूल सुप्रीमो के चेहरे पर जोरदार सियासी तमाचे से कम नहीं है। दरअसल, 9 साल पहले रेल मंत्री के तौर पर उनके बजट भाषण के बाद, ममता की पार्टी ने उनपर जो राजनीतिक निर्ममता दिखाई थी, शायद उसे अच्छी हिंदी बोल लेने वाले पश्चिम बंगाल के ये नेता कभी अपने दिल से निकाल ही नहीं पाए।

दिनेश त्रिवेदी ने इस्तीफे की वजह क्या बताई?
पूर्व रेल मंत्री और तृणमूल कांग्रेस के मौजूदा प्रवक्ता दिनेश त्रिवेदी के 9 साल पुराने जख्मों की याद दिलाएं उससे पहले उन्होंने अपने इस्तीफे के जो कारण बताए हैं, उसपर गौर कर लेते हैं। दिनेश त्रिवेदी ने कहा है, 'आज मैं राज्यसभा से इस्तीफा दे रहा हूं। हमारे राज्य में हिंसा हो रही है। हम यहां पर कुछ भी नहीं कह सकते।' इसके बाद उनकी जुबान से निकला एक-एक लफ्ज तृणमूल नेत्री को सियासी तौर पर तार-तार कर सकता है। उनके मुताबिक, 'मेरे राज्य में हिंसा को रोकने के लिए कुछ भी नहीं कर पाने के चलते मेरा दम घुंट रहा है। मेरी आत्मा मुझसे कहती है कि अगर मैं यहां बैठकर कुछ भी नहीं कर पा रहा हूं तो मैं जरूर इस्तीफा दे दूं। मैं पश्चिम बंगाल के लोगों के लिए काम करता रहूंगा।' उन्होंने स्वामी विवेकानंद के शब्दों को दोहराते हुए कहा,'मेरी अंतरात्मा वही कह रही है, जो स्वामी विवेकानंद कहा करते थे- 'उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त ना कर लो'।
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9 साल पहले ममता बनर्जी ने त्रिवेदी के साथ क्या किया?
एक समय दिनेश त्रिवेदी ममता बनर्जी के करीबियों में शामिल थे। इसीलिए, यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में उन्हें ममता की जगह टीएमसी कोटे से रेलमंत्री बनाया गया था। वह कुछ ही महीने रेलमंत्री रहे थे, लेकिन 2012 में तब के हिसाब से बहुत ही बोल्ड रेल बजट पेश करके उन्होंने पूरे देश को चौंका दिया। लेकिन, वह रेल बजट टीएमसी की लोक-लुभावन नीतियों पर खरे नहीं उतरा और यही दिनेश त्रिवेदी की सबसे ऐतिहासिक राजनीतिक गलती साबित हुई। उनकी गलती ये थी कि अपने पहले ही बजट में उन्होंने रेल किराया बढ़ाने की घोषणा की। हालांकि, रेल किराए में मामूली इजाफा हुआ था, लेकिन ममता को यह कतई मंजूर नहीं था। त्रिवेदी को पार्टी ने इस्तीफा देने को कहा, लेकिन वह लिखित आदेश पर अड़ गए। जानकारी के मुताबिक तब ममता ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कहा कि अगर त्रिवेदी पद नहीं छोड़ते हैं तो उन्हें उनको हर हाल में कैबिनेट से बर्खास्त करना होगा। आखिरकार त्रिवेदी और यूपीए सरकार को बनर्जी के दबाव के आगे सरेंडर करना पड़ गया। त्रिवेदी के दिल में आज भी वह जख्म हरे हैं कि जो बजट उन्होंने पेश किया, उसपर संसद में चर्चा से पहले ही उन्हें सरकार से बेआबरू करके निकाल दिया गया।

तृणमूल के संस्थापको में शामिल हैं
दिनेश त्रिवेदी तब से तृणमूल कांग्रेस में हैं, जबसे 1998 में इस पार्टी का जन्म हुआ है। अब तक वो दिल्ली में पार्टी के प्रमुख चेहरा रहे हैं। 2019 में वो पश्चिम बंगाल के बैरकपुर लोकसभा सीट से चुनाव हार गए थे। उन्हें टीएमसी के ही पूर्व विधायक अर्जुन सिंह ने बीजेपी के टिकट पर चुनाव हराया था। इसके बाद कुछ महीने पहले ही त्रिवेदी को पार्टी ने राज्यसभा में भेजा। लेकिन, पिछले कुछ वक्त से हालात पूरी तरह से बदल चुके हैं। जानकारी के मुताबिक वह पार्टी की गतिविधियों में शामिल नहीं किए जाने को लेकर नाराज चल रहे हैं। पार्टी ने उन्हें प्रवक्ता बना रखा है, लेकिन काफी वक्त से उन्हें प्रेस से कुछ कहने का मौका नहीं मिला है। बंगाल में हिंदी-भाषी वोटरों के बीच अपनी पहुंच बनाने के लिए टीएमसी अबतक उनका बखूबी इस्तेमाल करती रही है।

मुखर और सज्जन राजनेता माने जाते हैं
जीवन के 70 बसंत देख चुके त्रिवेदी एक प्रशिक्षित पायलट हैं और मुखर एवं सज्जन राजनेता माने जाते हैं। त्रिवेदी बिजनेसमैन परिवार से आते हैं। दरअसल, दिनेश त्रिवेदी को मनमोहन सरकार में तब रेलमंत्री बनने का मौका मिला था, जब ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनने के लिए यह पद छोड़ना पड़ा। तब भी त्रिवेदी इस पद के लिए तृणमूल सुप्रीमो की पहली पसंद नहीं थे। वह तब भी चाहती थीं कि मुकुल रॉय (अब बीजेपी में) को यह जिम्मेदारी मिले। लेकिन, कहते हैं कि तब मनमोहन सिंह ने ममता की पसंद को नापंसद कर दिया था। त्रिवेदी 2009 के लोकसभा चुनाव में उत्तरी 24 परगना जिले की बैरकपुर सीट जीतने के बाद यूपीए सरकार में स्वास्थ्य राज्य मंत्री बनाए गए थे।

अन्ना हजारे के समर्थन में इस्तीफे की पेशकश की थी?
त्रिवेदी जनता से जुड़े मुद्दों के लिए जनहित याचिका दायर करने के लिए भी जाने जाते रहे हैं। कहते हैं कि 2011 में जब मनमोहन सरकार के दौरान उजागर हुए एक से एक महाघोटाले के खिलाफ और जन लोकपाल की मांग को लेकर अन्ना हजारे ने दिल्ली में आंदोलन किया तो उन्होंने इस समाजसेवी के समर्थन के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री के पद से इस्तीफे तक की पेशकश कर दी थी। वह अमेरिका के ऑस्टिन स्थित टेक्सास यूनिवर्सिटी से एमबीए हैं और ममता के संघर्ष भरे दिनों में उन्होंने पार्टी को बनाने के लिए बहुत कड़ी मेहनत की है। एमबीए करने से पहले उन्होंने कोलकाता के मशहूर सेंट जेवियर्स कॉलेज से कॉमर्स में ग्रैजुएशन किया था। वैसे उन्होंने राजनीति की शुरुआत कांग्रेस से की थी, लेकिन एक समय में वीपी सिंह की अगुवाई वाले जनता दल में भी शामिल हो गए थे। वह पहली बार 1990 में राज्यसभा के सांसद बने और 2008 तक इस सदन के सदस्य थे।
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