कुपोषण की ओर ले जाती महंगाई

Pulses
आप अपने क्रेडिट कार्ड से इलेक्‍ट्रॉनिक आइटम खरीदिए। अगर वो आइटम 5000 रुपए से अधिक का होगा, तो आपके मोबाइल फोन पर तुरंत एसएमएस आएगा- "क्‍या आप किश्‍तों में कीमत अदा करना चाहते हैं..." यानी अप्रत्‍यक्ष रूप से बैंक ने आपको ऋण दे दिया। इसी तरह टीवी, वॉशिंग मशीन, फ्रिज, स्‍कूटर, कार, आदि कुछ भी खरीदने दुकान पर जाएंगे तो बैंक के एजेंट से आपका जरूर पाला पड़ेगा।

इन सभी के लिए ऋण आसानी से उपलब्‍ध हैं। लेकिन क्‍या इन सब चीजों से किसी इंसान का पेट भर सकता है? नहीं! पेट भरने के लिए चाहिए खाना और खाने के लिए चाहिए राशन, लेकिन आज राशन की कीमत टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन से कहीं अधिक हो गई है, तो राशन के लिए लोन क्‍यों नहीं। आज अगर मध्‍यमवर्गीय परिवारों की सुनें तो एक ही बात सुनाई देती है, "हमें खाने के लिए लोन चाहिए।"

ढाई-ढाई सौ ग्राम में चल रहा गुजारा

सच पूछिए तो मध्‍यमवर्गीय परिवारों की यह दरकार गलत नहीं है। आखिर क्‍यों न हो। पांच साल पहले मां 100 रुपए का नोट देती थी, और कहती थी सप्‍ताह भर का राशन ले आओ, लेकिन आज 100 का पत्‍ता किलो भर दाल लाने में भी कम पड़ता है। यही नहीं सेब खाने की बात हो तो 100 रुपए में किलो भर सेब भी नहीं मिलते। क्‍या एक या दो साल पहले किसी ने सोचा था कि ऐसा भी दिन देखने को मिलेगा। शायद नहीं। लेकिन अब आगे की सोचना होगा, क्‍योंकि अगर आज 100 का पत्‍ता एक किलो दाल से हलका हो गया है, तो पांच सौ के पत्‍ते का भी भरोसा नहीं। वैसे भी आज चार लोगों के परिवार के लिए अगर सप्‍ताह भर की सब्‍जी खरीदने जाएंगे, तो 500 रुपए भी कम पड़ेंगे।

कानपुर की एक टेनरी में कार्यरत रमेश कुमार सक्‍सेना, जिनका वेतन मात्र 4500 रुपए है। उनके परिवार में वो, पत्‍नी और एक 5 वर्षीय बेटा है। तीन लोगों के परिवार का पेट पालना उनके लिए मुश्किल हो गया है। रमेश बताते हैं, "मार्केट में अरहर की दाल की कीमत 120 रुपए प्रति किलो पहुंच गई है। बाकी की दालों की कीमतें ऐसे ही आसमान छू रही हैं। इस महीने मैने तो मात्र ढाई-ढाई सौ ग्राम दालें खरीदी हैं।"

सेब, अनार तो अब सपने में भी नहीं

हमने जब उनसे पूछा कि क्‍या अब ऐसे ही चलेगा, तो वो चुप हो गए। फलों के बारे में पूछा तो बोले सिर्फ केले और अमरूद आ जाते हैं। हमने जब रमेश से पूछा कि आप कैसे मैनेज करते हैं, तो बोले कानपुर की टेनरियों यानी चमड़े की फैक्ट्रियों में दो लाख से ज्‍यादा लोग 2000 से 5000 रुपए प्रति माह की नौकरी कर रहे हैं। जैसा उनका परिवार चल रहा है, वैसे हम चला रहे हैं।

वहीं लखनऊ के अलीगंज सेक्‍टर ई के जनता क्‍वार्टर में रहने वाली गृहणी ममता सिंह से बात की तो उन्‍होंने भी अपनी बेबसी बयान की। बोलीं, "इस समय हालत काफी नाजुक है। दो बच्‍चे हैं। समझ नहीं आता कि उन्‍हें पढ़ाएं-लिखाएं या खाना खिलाएं। आज कल तो आलम यह है कि सिर्फ एक मुठ्ठी दाल बनाती हूं। बच्‍चे खालें और क्‍या चाहिए। हमारा क्‍या है हम तो नमक रोटी से भी काम चला लेंगे।" फर्नीचर शोरूम में मुलाजिम ममता के पति उमेश पाल सिंह ने भी अपनी बेबसी जाहिर करते हुए कहा, "हमें नहीं लगता कि ऐसी महंगाई में हम आगे बच्‍चों को पढ़ा सकेंगे। पत्‍नी की तबियत भी आए दिन खराब रहती है। दवाओं पर भी अच्‍छा खासा खर्च हो जाता है।"

15 करोड़ बच्‍चों को पूर्ण खुराक नहीं

जरा सोचिए हम अगर सिर्फ कानपुर की बात करें तो यहां की टेनरियों में 2 लाख से अधिक लोग औसतन 2500 रुपए प्रतिमाह की नौकरी कर रहे हैं। एक दिन में इनका परिवार सिर्फ 83 रुपए खर्च कर सकता है। आलम यह है कि इन परिवारों के बच्‍चों को सेब, अमरूद, आम, जैसे फल नसीब ही नहीं होते। आखिर हों भी तो कैसे। ऐसी स्थिति से सिर्फ कानपुर की टेनरियों में काम करने वाले लोगों के परिवारों के बच्‍चे नहीं गुजर रहे हैं, बल्कि देश भर में 15 करोड़ बच्‍चे ऐसे हैं, जिन्‍हें पूर्ण खुराक नहीं मिलती। वहीं पूरे देश में उमेश पाल सिंह जैसे लाखों लोग हैं, जिन्‍हें अब अपने बच्‍चों को पढ़ाने में भी मुश्किल हो रही है।

यूनाइटेड नेशंस चिल्‍ड्रेंस फंड यूनीसेफ ने पिछले साल भारत सरकार को चेताया था कि बढ़ती महंगाई के कारण देश में 15 करोड़ से ज्‍यादा बच्‍चे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं। अगर महंगाई के बढ़ने की दर ऐसे ही रही तो 2020 तक यह संख्‍या दोगुनी से ज्‍यादा हो सकती है। यूनीसेफ की इस चेतावनी से यह साफ है कि अगर बच्‍चों को सही पोषण नहीं मिला तो देश की आने वाली नस्‍ल बरबाद हो सकती है।

मजबूर हैं माता-पिता

अब अगर माता पिता अपने बच्‍चों को मजबूरन दालों और फलों से वंचित रखते हैं, तो क्‍या होगा। अरहर की दाल में ट्रिप्‍टोफान, मथिओनाइन, लाइसीन और विटामिन की भारी मात्रा होती है। साथ में एमीनो एसिड जो पाचन क्रिया को दुरुस्‍त रखता है। चने की दाल में प्रोटीन और जस्‍ता होता है। मसूर की दाल में विटामिन बी1 और प्रोटीन और तमाम खनिज होते हैं, जो शरीर के विकास में महत्‍वपूर्ण योगदान देते हैं। यही नहीं इस दाल में आयरन होता है जो खास तौर से गर्भवती महिलाओं के पेट में पल रहे बच्‍चे के विकास में महत्‍वपूर्ण योगदान देता है।

यूनीसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में तीस प्रतिशत नवजात औसत वजन से कम के होते हैं। यानी पैदा होने से पहले ही कुपोषण के शिकार हो चुके होते हैं। इसका एक मात्र कारण यह है कि गर्भवती महिलाओं को पूरी खुराक न मिल पाना। इसके पीछे बढ़ती महंगाई एक बड़ा कारण है। इसी प्रकार फलों में सेब, केला, संतरा, अंगूर, पपीता, अमरूद, अनानास, आदि सभी प्रमुख फल विटामिन ए, बी1, बी2, बी6, सी, ई, के, फोलेट, आदि से युक्‍त होते हैं। अगर बच्‍चों को विटामिन की सही मात्रा नहीं मिलेगी तो उनके मानसिक विकास पर प्रभाव जरूर पड़ेगा।

क्‍या कहती हैं डायटीशियान

दिल्‍ली की डायटीशियन डा अनुराधा मेहता के मुताबिक देश में 30 करोड़ से ज्‍यादा महिलाएं खून में आयरन की कमी के कारण एनीमिया का शिकार हैं। आयरन की कमी के कारण महिलाओं के नर्वस सिस्‍टम को कमजोर करता है। महिलाएं कमजोर होने के साथ-साथ लो ब्‍लड प्रेशर की शिकार हो जाती हैं। ऐसा ही बच्‍चों के साथ भी होता है। वहीं विटामिन की कमी से न केवल मानसिक विकास में बाधा आती है, हड्डियां कमजोर होती हैं, बल्कि त्‍वचा संबंधी बीमारियां लगने का खतरा अधिक रहता है। खास बात यह है कि विटामिन ए की कमी से व्‍यक्ति नपुंसक बन सकता है, क्‍योंकि वीर्य के निर्माण में विटामिन ए की अहम भूमिका होती है। वहीं महिलाओं में विटामिन ए की कमी से प्रजनन चक्र बिगड़ जाता है, जिससे उनके मां बनने की प्रवृत्ति कम हो जाती है। लिहाजा दाल, हरी सब्जियां और फल अत्‍याधिक जरूरी तत्‍व हैं, जो जिनके बिना शरीर बीमारियां का गढ़ बन सकता है।

डा अनुराधा की इस बात से आज जरूर चौंक गए होंगे। यानी दालों और फलों के आसमान छूते दाम आने वाली पीढ़ी में नपुंसकता का भी कारण बन सकती हैं। जाहिर है जब गरीब और मध्‍यमवर्गीय परिवार में दाल बनेगी ही नहीं और फल आएंगे ही नहीं तो ऐसा होने से कोई नहीं रोक सकता।

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