Punjab Politics: जब दफ्तरों से हटे अंग्रेजी टाइपराइटर! कैसे CM लछमन सिंह के एक फैसले से बदली पंजाब की पहचान?

Kissa Kursi Da: Ep-2: पंजाब की राजनीति में कई बड़े और करिश्माई नेताओं के नाम दर्ज हैं, लेकिन कुछ नेता ऐसे भी हुए जिन्होंने बहुत कम समय में ऐसा काम कर दिखाया, जिसकी गूंज दशकों तक सुनाई देती रही। ऐसे ही नेताओं में एक नाम है- सरदार लछमन सिंह गिल।

सिर्फ नौ महीने 25 नंबर 1967 से 23 अगस्त 1968 तक पंजाब के 7वें मुख्यमंत्री बनने वाले गिल ने ऐसा राजनीतिक और सांस्कृतिक बदलाव किया, जिसने राज्य की पहचान ही बदल दी।

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उनके राजनीतिक सफर में बगावत भी थी, सत्ता संघर्ष भी, भाषा की लड़ाई भी और पंजाबियत को बचाने का जुनून भी। यही वजह है कि आज भी उनका नाम पंजाब के इतिहास में सम्मान से लिया जाता है। किस्सा कुर्सी दा में पढ़िए कैसे लछमन सिंह गिल के एक फैसले ने पंजाब की पहचान बदल दी...

Lachhman Singh Gill Punjab CM: क्रांतिकारी गांव से निकला 'पंजाबियत' का नेता

लछमन सिंह गिल का जन्म 1914 में फिरोजपुर जिले (अब फरीदकोट) के चूहड़चक गांव में एक जाट सिख परिवार में हुआ था। यह गांव सिर्फ एक सामान्य गांव नहीं था, बल्कि क्रांतिकारियों का गढ़ माना जाता था। बचपन से ही गिल ने अंग्रेजों के खिलाफ गुस्सा और देशभक्ति का माहौल देखा। यही माहौल आगे चलकर उनके राजनीतिक व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान बना।

आजादी से पहले अंग्रेज सरकार के खिलाफ गतिविधियों में शामिल होने के कारण उन्हें दो बार जेल भी जाना पड़ा। लेकिन जेल और दमन ने उन्हें डराने के बजाय और मजबूत बना दिया।

मजदूर राजनीति से अकाली राजनीति तक: ऐसा रहा लछमन सिंह गिल का सियासी सफर...

राजनीति में गिल की शुरुआत सीधे सत्ता से नहीं हुई। कुछ समय तक वे दिल्ली पोस्ट एंड टेलीग्राफ यूनियन के अध्यक्ष रहे। इस दौरान उनका संपर्क समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण से हुआ। गिल समाजवादी विचारधारा से प्रभावित थे, लेकिन धीरे-धीरे पंजाब की धार्मिक और क्षेत्रीय राजनीति की नब्ज समझते हुए उन्होंने अकाली दल का दामन थाम लिया। यहीं से उनका असली राजनीतिक सफर शुरू हुआ।

गौरतलब है, 1947 का विभाजन पंजाब के इतिहास का सबसे दर्दनाक दौर था। सांप्रदायिक हिंसा की आग में हजारों लोग मारे जा रहे थे। ऐसे समय में लछमन सिंह गिल ने इंसानियत का चेहरा दिखाया। कहा जाता है कि उन्होंने दंगों के दौरान सैकड़ों मुस्लिम परिवारों की जान बचाई। यही वजह थी कि राजनीतिक विरोधी भी उनके मानवीय स्वभाव का सम्मान करते थे।

जब पंजाबी भाषा ही विवाद बन गई थी, कैसे एक फैसले से बदली सियासत

आज के समय में यह कल्पना करना कितना मुश्किल है कि एक दौर ऐसा भी था जब पंजाब में पंजाबी भाषा को लेकर गहरा विवाद हुआ करता था। आजादी के बाद पंजाब में हिंदी और पंजाबी को लेकर सियासी और सामाजिक टकराव लगातार बढ़ता गया। राज्य के कई हिंदू संगठन पंजाबी को आधिकारिक भाषा बनाए जाने के खिलाफ थे, जबकि सिख समुदाय पंजाबी को उसका अधिकार दिलाने की मांग कर रहा था।

भाषा का यह विवाद इतना गहरा हो गया कि केंद्र सरकार तक परेशान रहने लगी। उस दौर में पंजाब के ताकतवर मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों ने भी इस विवाद को सुलझाने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। यहां तक कि पंजाबी सूबा बनने के बाद भी हिंदी-पंजाबी विवाद खत्म नहीं हुआ। इसी माहौल में लछमन सिंह गिल की एंट्री हुई।

25 नवंबर 1967 को मुख्यमंत्री बनने के बाद लछमन सिंह गिल ने इस मुद्दे पर बड़ा दांव खेला। उन्होंने सत्ता संभालने के सिर्फ एक महीने के भीतर आधिकारिक भाषा अधिनियम 1968 (Punjabi Official Language Act 1968) पास करवा दिया, जिसके तहत पंजाबी को पंजाब की आधिकारिक भाषा घोषित कर दिया गया। हालांकि हिंदी को केंद्र और राज्य के बीच संपर्क भाषा बनाए रखा गया।

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बैसाखी का वो दिन जिसने पंजाब बदल दिया

बैसाखी से ठीक पहले गिल ने अपने दोस्तों से मजाकिया अंदाज में कहा था कि "इस बैसाखी पर पंजाब के अनपढ़ लोग भी पढ़े-लिखे हो जाएंगे।" और फिर वही हुआ बैसाखी के दिन सरकारी दफ्तरों में अंग्रेजी टाइपराइटर हटाकर पंजाबी टाइपराइटर लगा दिए गए। सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए पंजाबी सीखना लगभग अनिवार्य कर दिया गया।

इस कदम ने पंजाब में सालों से चल रहे भाषा विवाद को काफी हद तक शांत कर दिया। पंजाबी भाषा को पहली बार सत्ता और प्रशासन की असली भाषा का दर्जा मिला। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि पंजाब में पंजाबी भाषा को उसका वास्तविक सम्मान दिलाने का सबसे बड़ा श्रेय लछमन सिंह गिल को ही जाता है।

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संत फतेह सिंह को आगे लाने वाले नेता

पंजाब की राजनीति में लछमन सिंह गिल को एक बड़े रणनीतिकार के रूप में भी देखा जाता है। माना जाता है कि संत फतेह सिंह को सक्रिय राजनीति में स्थापित करने में गिल की अहम भूमिका थी। उस दौर में मास्टर तारा सिंह अकाली राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा थे, लेकिन संत फतेह सिंह के उभार के बाद उनका प्रभाव कम होने लगा। हालांकि बाद में यही राजनीतिक समीकरण गिल और संत फतेह सिंह के बीच टकराव की वजह भी बन गए।

जब अकाली दल में हुई बगावत

दरअसल, हुआ यह कि पंजाबी सूबा बनने के बाद अकाली राजनीति में नेतृत्व को लेकर बड़ा संघर्ष शुरू हुआ। संत फतेह सिंह ने जस्टिस गुरनाम सिंह को अकाली विधायक दल का नेता बना दिया। गिल को यह फैसला पसंद नहीं आया। उन्हें लगा कि पार्टी में पुराने और जमीनी नेताओं की अनदेखी की जा रही है। इसके बाद उन्होंने खुलकर बगावत कर दी। यह बगावत इतनी बड़ी साबित हुई कि जस्टिस गुरनाम सिंह की सरकार गिर गई और आखिरकार लछमन सिंह गिल पंजाब के मुख्यमंत्री बन गए। यहीं से शुरू हुआ पंजाब की राजनीति का सबसे चर्चित "9 महीने वाला दौर"।

गांव, किसान और सड़क विकास पर भी फोकस

हालांकि लछमन सिंह गिल ने अपने कार्यकाल के दौरान ही ग्रामीण विकास और लिंक रोड निर्माण पर भी तेज काम कराया। उनके शानकाल में गांवों को सड़कों से जोड़ने और प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में कई कदम उठाए गए। लेकिन इन सभी उपलब्धियों पर उनकी "पंजाबी भाषा नीति" सबसे भारी पड़ गई।

सत्ता में रहे, लेकिन सत्ता सिर पर नहीं चढ़ी

लछमन सिंह गिल की सबसे बड़ी खासियत यह मानी जाती थी कि सत्ता मिलने के बाद भी उनमें अहंकार नहीं आया। उन्हें 'दोस्तों का दोस्त' कहा जाता था। वे जमीन से जुड़े नेता थे और आम लोगों से सीधे संवाद में विश्वास रखते थे। राजनीतिक जानकार कहते हैं कि आज के दौर में ऐसा स्वभाव बहुत कम नेताओं में देखने को मिलता है। लछमन सिंह गिल का सिर्फ नौ महीने का कार्यकाल आज भी चर्चा में रहता है।

26 अप्रैल 1969 को उनकी असमय मौत ने पंजाब की राजनीति से एक ऐसे नेता को छीन लिया, जिसने अपनी पूरी जिंदगी 'पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत' के नाम कर दी। आज भी पंजाब के राजनीतिक इतिहास में लछमन सिंह गिल उस मुख्यमंत्री के तौर पर याद किए जाते हैं, जिसने सत्ता को सिर्फ कुर्सी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान बचाने का माध्यम बनाया।

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