First Lavender Festival : किसानों की कामयाबी का सेलिब्रेशन, 5,000 किसानों और युवा उद्यमियों को रोजगार
भद्रवाह में भारत का पहला लैवेंडर फेस्टिवल आयोजित हुआ। जम्मू कश्मीर में लैवेंडर फार्मिंग के क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं। यही कारण है कि 200 एकड़ से ज्यादा जमीन पर 1,000 से ज्यादा किसान परिवार इसकी खेती कर रहे हैं।
श्रीनगर, 30 मई : लैवेंडर (Lavender) की खेती किसानों के लिए मुनाफा कमाने का शानदार विकल्प है। भारत सरकार लैवैंडर उत्पादन को बढ़ावा देने की दिशा में लगातार काम कर रही है। इसी कड़ी में जम्मू कश्मीर में भारत का पहला लैवेंडर फेस्टिवल भद्रवाह में आयोजित किया गया। इसकी शुरुआत के मौके पर पहुंचे केंद्रीय मंत्री ने दावा किया कि लैवेंडर उत्पादन के कारण किसानों की आय चार गुना तक बढ़ी है। वर्तमान में जम्मू-कश्मीर में 1,000 से अधिक किसान परिवार 200 एकड़ से अधिक जमीन पर लैवेंडर फार्मिंग कर रहे हैं। 5000 लोगों को रोजगार मिले हैं। लैवैंडर फार्मिंग और भद्रवाह लैवेंडर महोत्सव के संबंध में पढ़िए वनइंडिया हिंदी की ये रिपोर्ट

5,000 किसानों और युवा उद्यमियों को रोजगार
भद्रवाह लैवेंडर फेस्टिवल के संबंध में न्यूजऑनएआईआर डॉट कॉम की एक रिपोर्ट में कहा गया, डोडा के किसानों की कामयाबी और पर्पल रिवॉल्यूशन को सेलिब्रेट करने के लिए लैवेंडर फेस्टिवल का आयोजन किया गया। लैवेंडर की खेती से जम्मू-कश्मीर के दूरदराज के इलाकों में लगभग 5,000 किसानों और युवा उद्यमियों को रोजगार मिला है। 200 एकड़ से ज्यादा जमीन पर 1,000 से ज्यादा किसान परिवार इसकी खेती कर रहे हैं।
एग्री-टेक स्टार्टअप में नए रास्ते खुलेंगे
बता दें कि जम्मू-कश्मीर में बड़े पैमाने पर हो रही लैवेंडर की खेती और लैवेंडर के रंग के आधार पर इस खेती को बैंगनी क्रांति यानी पर्पल रिवॉल्यूशन भी कहा जाता है। जम्मू कश्मीर के भद्रवाह को भारत की बैंगनी क्रांति का जन्मस्थान कहा जाता है। भद्रवाह लैवेंडर फेस्टिवल की वीडियो ट्वीट कर केंद्रीय मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने गत 26 मई को लिखा, जम्मू कश्मीर में डोडा जिले के भद्रवाह में पहली बार लैवेंडर (Lavender Festival) का आयोजन हुआ। उन्होंने कहा कि फेस्टिवल के आयोजन से एग्री-टेक स्टार्टअप में नए रास्ते खुलेंगे।

CSIR-IIIM का अरोमा मिशन
बता दें कि सीएसआईआर, इंडस्ट्रियल रिसर्च-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटिव मेडिसिन (CSIR-IIIM) संयुक्त रूप से लैवेंडर की खेती को बढ़ावा देने के मिशन में जुटे हैं। भद्रवाह में लैवेंडर फेस्टिवल 2022 का आयोजन इसी मुहिम का हिस्सा है। CSIR-IIIM के अरोमा मिशन के तहत, पहली बार खेती के लिए किसानों को लैवेंडर के पौधे मुफ्त दिए गए। जिन किसानों ने पहले लैवेंडर की खेती की थी, उनसे 5-6 रुपये प्रति पौधे की कीमत ली गई थी।

अब भारत में भी लैवेंडर फेस्टिवल
अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस जैसे देशों में लैवेंडर फेस्टिवल का आयोजन होता रहा है। अब भारत में भी लैवेंडर फेस्टिलवल का आयोजन शुरू हो गया है। CSIR IIIM की वैज्ञानिक डॉ सुमीत गैरोला के मुताबिक लैवेंडर महोत्सव उद्योग, शिक्षाविदों और किसानों के एक प्लेटफॉर्म पर लाने का मौका है। डॉ सुमीत अरोमा मिशन के नोडल वैज्ञानिक हैं। उन्होंने कहा कि जम्मू कश्मीर में 'लैवेंडर फेस्टिवल' भारत की औषधीय और सुगंधित पौधों की समृद्ध जैव विविधता का प्रदर्शन है।

किसानों ने छोड़ी पारंपरिक खेती
डोडा जिले में, किसानों ने सुगंधित लैवेंडर की खेती शुरू करने के लिए सदियों पुरानी पारंपरिक खेती छोड़ दी। लैवेंडर फार्मिंग को लोकप्रिय बनाने के लिए सरकार की ओर से अरोमा मिशन जैसी पहल की गई है। लैवेंडर की अच्छई मार्केट प्राइस मिलती है ऐसे में इसकी खेती अधिक लाभदायक मानी जाती है। 'अरोमा मिशन' की शुरुआत सीएसआईआर (वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद) ने छोटे और सीमांत किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से की है।

जम्मू कश्मीर के 20 जिलों में लैवेंडर फार्मिंग
बैंगनी क्रांति के तहत खेती का चेहरा बदल रहा है। बता दें कि वैश्विक इत्र उद्योग में लैवेंडर का दबदबा है और फूलों से निकाले गए सुगंधित तेल को 10,000 रुपये प्रति किलोग्राम से अधिक की दर पर बेचा जा सकता है। जम्मू कश्मीर के लगभग सभी 20 जिलों में लैवेंडर की खेती होती है। कठुआ, उधमपुर, डोडा, रामबन, किश्तवाड़, राजौरी, श्रीनगर, पुलवामा, कुपवाड़ा, बांदीपोरा, बडगाम, गांदरबल, अनंतनाग, कुलगाम और बारामूला जिलों के किसान बढ़-चढ़ कर लैवेंडर फार्मिंग कर रहे हैं। किसानों को भरपूर मुनाफा भी हो रहा है।

लैवेंडर 200 एकड़ जमीन पर, सरकार से प्रोत्साहन
जम्मू-कश्मीर का भूगोल कई मायनों में चुनौतीपूर्ण भी है। ऐसे में दूर-दराज के क्षेत्रों में लैवेंडर की खेती से युवा उद्यमियों को काफी रोजगार मिले। वर्तमान में जम्मू-कश्मीर में 1,000 से अधिक किसान परिवार 200 एकड़ से अधिक जमीन पर लैवेंडर फार्मिंग कर रहे हैं। लैवेंडर की खेती से जुड़ा एक और पॉजिटिव पहलू ये है कि इससे महिलाओं को भी रोजगार के अवसर मिले हैं। महिला किसानों की कृषि आय बढ़ी है। यह भी दिलचस्प है कि अरोमा मिशन के तहत, पहली बार खेती के लिए किसानों को लैवेंडर के पौधे मुफ्त दिए गए। जिन किसानों ने पहले लैवेंडर की खेती की थी, उनसे 5-6 रुपये प्रति पौधे की कीमत ली गई थी।

अरोमा मिशन की सफलता, 60 करोड़ का उत्पादन
किसानों की आय दोगुनी करने के मकसद से अरोमा मिशन के तहत लैवेंडर की खेती को प्रोमोट किया जाता है। उच्च मूल्य वाली आवश्यक तेल निकालने के लिए लैवेंडर के फूलों का उपयोग होता है। कृषि स्टार्टअप का सपना देखने वाले युवाओं के बीच अरोमा मिशन काफी लोकप्रिय रहा है। किसानों को ग्रामीण रोजगार मिले हैं। सुगंधित तेलों और अन्य सुगंधित उत्पाद निर्माण में भारत में होने शुरू होने से आवश्यक और सुगंधित तेलों का आयात घटा है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसार, सीएसआईआर के अरोमा मिशन के तहत 6,000 हेक्टेयर जमीन पर महत्वपूर्ण औषधीय और सुगंधित पौधों की खेती हो रही है। इससे 500 टन से अधिक आवश्यक तेल का उत्पादन हुआ है। पिछले दो वर्षों के दौरान लैवेंडर के फूल से 60 करोड़ रुपये मूल्य के तेल का उत्पादन हुआ है।












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