उत्तराखंड सरकार बदलने जा रही बिल्डिंग बायलॉज, जोशीमठ भूधंसाव के बाद लिया फैसला
इस साल जनवरी में आदिगुरु शंकराचार्य की तपस्थली के नाम से प्रसिद्ध चमोली का जोशीमठ शहर अचानक धंसने लगा था। सैकड़ों घर, होटल, दुकानें इस धंसाव की जद में आ गए थे। जोशीमठ भू-धंसाव की करीब आठ शीर्ष वैज्ञानिक संस्थाओं ने जांच की।जांच को जो मोटा मोटा निष्कर्ष निकला उसमें कई कॉमन बिंदु थे जो उत्तराखंड के सभी हिल स्टेशन पर लागू होते हैं। अब इस रिपोर्ट्स के आधार पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने राज्य सरकार को पत्र भेज कर हिल स्टेशन के लिए अलग से बिल्डिंग बायलॉज बनाने के निर्देश दिए हैं।
बता दें कि रिपोर्ट्स में कहा गया था कि मॉरेन (ग्लेशियर के साथ आई मिट्टी और गाद का ढेर) पर बसे जोशीमठ शहर पर निर्माण कार्यों का अत्यधिक दबाव था। प्राकृतिक झरनों, नालों के मुहानों को दबाकर निर्माण कार्य कर दिए गए। पानी की निकासी की कोई योजना नहीं थी। घरों से निकलने वाला सारा पानी जमीन के अंदर सिंक हो रहा था। मेन सेंट्रल थ्रस्ट वाले इस संवेदनशील एरिया में सात सात मंजिला होटल बना दिए गए। पहाड़ के लगभग हर स्टेशन की कमोबेश यही कहानी है। इससे राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण से लेकर राज्य सरकार तक अलर्ट मोड पर है।

यही वजह है कि अब राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने राज्य सरकार को पत्र भेज कर हिल स्टेशन के लिए अलग से बिल्डिंग बायलॉज बनाने के निर्देश दिए हैं। इसी दो नवंबर को अपर मुख्य सचिव आनंद वर्धन की अध्यक्षता में आयोजित मीटिंग में पहाड़ के लिए पहाड़ की भौगोलिक के अनुरूप बिल्डिंग बायलॉज बनाने पर चर्चा हुई। वर्तमान बायलॉज के अनुसार पहाड़ों में भवनों की अधिकतम ऊंचाई 12 मीटर निर्धारित है। मीटिंग में इसे कम करने पर चर्चा हुई।
नए बायलॉज में पानी के स्रोत, नदी नालों के किनारे भवन निर्माण प्रतिबंधित किया जा सकता है। यही नहीं भू धंसाव और भूकंपीय जोन वाले एरिया में भी भवन निर्माण पर रोक लग सकती है। दूसरी ओर, राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण पूरे प्रदेश में हिल स्टेशन की कैरिंग कैपेसिटी का अध्ययन करा रहा है। फर्स्ट फेज में 15 हिल स्टेशन जिसमें मसूरी, नैनीताल जैसे हिल स्टेशन शामिल हैं। ये शहर सामान्य तौर पर अपनी कैरिंग कैपेसिटी पूरी कर चुके हैं। अंधाधुंध निर्माण कार्य के चलते इन शहरों पर भी जोशीमठ की तरह खतरा मंडरा रहा है।












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