एमसीडी चुनाव में BJP को घेरने के लिए बुलडोजर राजनीति का विरोध करेगी आम आदमी पार्टी

नई दिल्ली, 25 मई: जहांगीरपुरी में बुलडोजर द्वारा तोड़फोड़ के करीब एक महीने बाद, सोमवार को दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने बीजेपी शासित नगर निकायों के तोड़फोड़ अभियान का विरोध किया। आप पार्टी इन नगर निगमों में भ्रष्टाचार का आरोप लगाती रही है। आप पिछले तीन सालों से बीजेपी के खिलाफ भ्रष्टाचार का मुद्दा उठा रही है। इन आरोपों का सामना करने के लिए बीजेपी ने कुछ महीने पहले इन नगर निकायों के एकीकरण का फैसला किया था। इन हालातों में केजरीवाल को एक ऐसी नई रणनीति की जरूरत थी, जिसके जरिए उनकी पार्टी दिल्ली के निकाय चुनावों में बीजेपी का मुकाबला कर सके। अब दिल्ली के मुख्यमंत्री ने साफ कर दिया है कि आम आदमी पार्टी आने वाले एमसीडी चुनावों में बीजेपी को उसकी बुलडोजर राजनीति पर घेरेगी।

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पिछले महीने, जहांगीरपुरी तोड़फोड़ के बाद आप ने मुसलमानों के मुद्दे पर रणनीतिक चुप्पी साध रखी थी। इसके बजाए, केजरीवाल की पार्टी ने दावा किया था कि बीजेपी ने पूरी दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा फैलाने के लिए अवैध रूप से बांग्लादेशियों और रोहिंग्याओं को बसाया था। हालांकि, आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्ला खान ने इस तोड़फोड़ का विरोध किया था, जिसकी वजह से उन्हें सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में गिरफ्तार भी किया गया था। आप पार्टी ने भी अपने ही विधायक की गिरफ्तारी पर पूरी तरह चुप्पी साध रखी थी। लेकिन, इसके करीब 24 घंटे के बाद आप के वरिष्ठ नेता और डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और खान का नाम लिए बिना पुलिस कार्रवाई का विरोध किया। ऐसे में केजरीवाल का बुलडोजर राजनीति के खिलाफ चौतरफा हमला पार्टी की नई रणनीति को दर्शाता है।

AAP और बुलडोजर पॉलिटिक्स

पहले तो केजरीवाल ने बुलडोजर राजनीति के मुद्दे पर नापा-तुला कदम उठाया। असल में लोगों को यह नहीं मालूम था कि दिल्ली में अतिक्रमण विरोधी अभियान को लेकर बीजेपी की क्या रणनीति है। हालांकि, जब आम आदमी पार्टी ने देखा कि यह अभियान जहांगीरपुरी में ही नहीं रुका तो यह स्पष्ट हो गया कि यह अतिक्रमण विरोधी अभियान बीजेपी के एक बड़े गेम प्लान का हिस्सा है।

मनीष सिसोदिया ने सबसे पहले बीजेपी पर हमला बोला। उन्होंने 15 मई को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर इस अभियान का विरोध किया। अगले दिन, केजरीवाल ने अपनी पार्टी के विधायकों से मिलकर एक्शन प्लान पर निर्णय लिया। केजरीवाल ने अपने विधायकों से इस बुलडोजर अभियान का सक्रियता से विरोध करने को कहा। जहांगीरपुरी तोड़फोड़ के दिन, आप पार्टी के कोई नेता या स्थानीय विधायक मौके पर नहीं गए थे। घटना के 24 घंटे बाद स्थानीय विधायक मौके पर पहुंचे।

बीजेपी शासित एमसीडी का कार्यकाल 18 मई को पूरा हो गया। अब केजरीवाल ने एमसीडी चुनाव के लिए प्रचार का बिगुल फूंक दिया है. उन्होंने कहा कि बीजेपी को तुरंत स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव का सामना करना चाहिए। उनके बयान के 24 घंटे के भीतर आप सरकार ने एमसीडी से इन तोड़फोड़ पर रिपोर्ट मांगी।

मुसलमानों से दूरी?

पिछले कुछ वर्षों के दौरान आम आदमी पार्टी की राजनीतिक रणनीति बदली है. पार्टी अब हिंदुत्व के अपने विचार को सामने रखने से नहीं कतराती। 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद से अरविंद केजरीवाल ने मुसलमानों के खिलाफ अत्याचार की खबरों पर चुप्पी बनाए रखना शुरू कर दिया। इस चुनाव के दौरान, बीजेपी ने दिल्ली में बड़े पैमाने पर ध्रुवीकरण अभियान चलाया था।

यह वह समय था जब दिल्ली के साथ-साथ पूरे देश में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) का विरोध हो रहा था. महिलाओं के नेतृत्व में हजारों लोग सीएए के विरोध में शाहीन बाग की सड़कों पर उतर आए थे. केजरीवाल ने पूरी तरह चुप्पी साध ली थी. इसके उलट उन्होंने कहा था कि अगर उनके पास सत्ता होती तो सरकार, इन प्रदर्शनकारियों को तुरंत हटा देती. इसी तरह, AAP ने दावा किया कि शाहीन बाग का विरोध बीजेपी द्वारा आयोजित था।

आप ने बीजेपी शासित एमसीडी के तोड़फोड़ अभियान के मामले में भी यही रुख अपनाया. दिल्ली में मतदाताओं की अच्छी-खासी आबादी अनधिकृत कॉलोनियों में रहती है. इसलिए, अगर इस तरह का तोड़फोड़ अभियान जारी रहता है तो ये लोग प्रभावित होंगे और उनकी शिकायत बढ़ती जाएंगी, जिसका असर चुनावों में दिखाई देगा. इसलिए आप पार्टी ने बुलडोजर की राजनीति का मुद्दा चुना है, लेकिन दिल्ली के मुसलमान बहुल कॉलोनियों को निशाना बनाने के असली मुद्दे पर वह चुप रही. केजरीवाल मॉडल ऑफ गवर्नेंस के प्रमुख लाभार्थी, निचले और मध्यम तबके के लोग हैं. वे दिल्ली में आप पार्टी के कोर वोटर भी हैं. केजरीवाल ने महसूस किया कि तोड़फोड़ के इस मुद्दे पर चुप रहने से चुनावों में आप पार्टी पर बुरा असर पड़ सकता है।

AAP और अनधिकृत कॉलोनी

दिल्ली नगर निगमों द्वारा अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के असली सवाल से दूर रहने के लिए आप ने अनधिकृत कॉलोनियों के मुद्दे को वापस उठाया है. लगभग 1,800 कॉलोनियों का नियमितीकरण, जहां 50 लाख से अधिक दिल्लीवासी रहते हैं, एक ऐसा मामला है जो दिल्ली में हर चुनावी लड़ाई से पहले सामने आता है. जब शीला दीक्षित मुख्यमंत्री थीं, तब से चुनाव से पहले अनधिकृत कॉलोनियों के नियमितीकरण मुद्दा लगातार उठता रहा है. इससे पहले आप, कांग्रेस और बीजेपी ने मतदाताओं को लुभाने के लिए इन कॉलोनियों को नियमित करने का वादा किया था. हालांकि, जमीनी स्तर पर कुछ खास नहीं हुआ।

2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले, बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने, अनधिकृत कॉलोनियों के निवासियों को मालिकाना अधिकार देने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी. इस मुद्दे पर बीजेपी ने अपना अभियान केंद्रित किया था. हालांकि, तब आप ने कहा था कि बीजेपी लोगों को बेवकूफ बना रही है. पिछले वर्षों की तरह, विधानसभा चुनाव के बाद अनधिकृत कॉलोनियों का मुद्दा ठंडा पड़ा गया. इसमें कोई शक नहीं कि आप सरकार ने इन कॉलोनियों में बहुत से विकास कार्य किए हैं. सरकार ने इन कॉलोनियों में नई सड़कें, सीवर और पानी के कनेक्शन दिए हैं. बीजेपी शासित एमसीडी का अतिक्रमण विरोधी अभियान इन अनधिकृत कॉलोनियों में जारी है, क्योंकि यहां बहुत से अवैध अतिक्रमण हैं.

यही कारण है कि केजरीवाल ने एमसीडी चुनाव से पहले अनधिकृत कॉलोनियों का मुद्दा फिर से उठाया है. 2017 के एमसीडी चुनावों से पहले, बीजेपी का प्रमुख वादा 'जहां झुग्गी, वहां मकान' था. इसका मतलब था कि बीजेपी झुग्गी-झोपड़ियों और अनधिकृत कॉलोनियों में रहने वाले लोगों के मालिकाना हक को सुनिश्चित करेगी. हालांकि, इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ।

AAP का नया मुद्दा

चुनावी राजनीति में दिल्ली का एक अजीब चलन है. राज्य के मतदाताओं ने विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल को चुना, लेकिन एमसीडी और संसदीय चुनावों में बीजेपी को वोट दिया. इस साल के एमसीडी चुनाव केजरीवाल के लिए अहम हैं. तीसरी बार सीएम बनने के बावजूद केजरीवाल के पास सीमित शक्तियां हैं. जिसकी वजह दिल्ली की त्रिस्तरीय प्रशासनिक व्यवस्था है. पंजाब की जीत के बाद, दिल्ली में अधिक प्रभाव जमाने के लिए केजरीवाल एमसीडी चुनाव जीतना चाहते हैं।

जब कांग्रेस सरकार में थी तब उसने एकीकृत दिल्ली नगर निगम को तीन भागों में बांट दिया था. इस अनियोजित विभाजन ने एमसीडी को भारी आर्थिक दबाव में डाल दिया. फिर AAP के सत्ता में आने के बाद बीजेपी के साथ पार्टी की तनातनी के कारण उसकी आर्थिक तंगी और बढ़ गई. बीजेपी ने केजरीवाल सरकार पर निगमों को फंड जारी नहीं करने का आरोप लगाया, तो दूसरी ओर आप ने फंड के दुरुपयोग का आरोप लगाया, जिससे एमसीडी दिवालिया हो गई. कोरोना महामारी के दौरान यह संकट अपने चरम पर पहुंच गया. नगर निगम अपने कर्मचारियों को वेतन नहीं दे पा रहा था. मजबूर होकर ये कर्मचारी सड़कों पर उतर आए थे. आप ने इस मौके का फायदा उठाते हुए बीजेपी को घेरा।

हालांकि, इस साल केंद्र सरकार ने तीनों नगर निगमों को फिर से मिलाने का फैसला किया. आप द्वारा लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों का मुकाबला करने के लिए यह बीजेपी की रणनीति थी. इससे बीजेपी का मुकाबला करने के लिए आप के पास मुद्दा नहीं रह गया. इसी बीच तोड़फोड़ शुरू हुई. आप पार्टी ने अपनी रणनीति बदल दी और इसे बीजेपी शासित एमसीडी के कुशासन के दावों के साथ जोड़ दिया।

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