हर तरह के मंगल करता है मंगलवार का व्रत, जानिए व्रतकथा

नई दिल्ली। हिंदू धर्म ग्रंथों में मंगलवार का दिन मंगलदेव की उपासना के लिए निर्दिष्ट किया गया है। अपने नाम के अनुरूप ही मंगल देव सभी भक्तों का मंगल करते हैं। मंगल देव स्वभाव से तनिक दुरुह माने जाते हैं अर्थात उन्हें प्रसन्न करना मामूली बात नहीं है।

अपने भक्तों से थोड़ी अधिक भक्ति पाकर प्रसन्न होने वाले मंगलदेश यदि एक बार किसी को शरण में ले लेते हैं, तो फिर कोई भी बाधा उसका बाल भी बांका नहीं कर सकती।

ऐसे सर्वमंगलकारी भगवान मंगलदेव की कथा का आज हम रसपान करते हैं-

व्रत कथा

व्रत कथा

बहुत समय पहले की बात है। किसी गांव में एक बुढि़या रहती थी। वह मंगलदेव को अपना ईष्ट मानती थी। मंगलवार के दिन वह ना तो घर लीपती थी और ना ही धरती खोदा करती थी। हर मंगलवार को वह मंगलदेव का व्रत रखती थी। उसका एक पुत्र था, जो मंगलवार के दिन ही पैदा हुआ था, इसीलिए वह उसे मांगलिया कह कर पुकारा करती थी।बुढि़या की श्रद्धा देखकर स्वयं मंगलदेव ने उसकी परीक्षा लेने की ठानी और साधु का वेश बनाकर उसके घर मंगलवार के दिन ही पहुंच गए। वह बुढि़या से बोले कि मुझे भोजन बनाना है। तू थोड़ी से धरती लीप दे तो मैं भोजन बना लूं।

तीन बार वचन दे दिया

तीन बार वचन दे दिया

बुढि़या ने कहा कि महाराज! मैं मंगलवार की व्रती हूं। मैं आज के दिन धरती नहीं लीपती। मैं जल का छिड़काव कर देती हूं। आप उस पर भोजन बना लें। उसकी बात सुन साधु ने हठ पकड़ ली कि मैं तो लिपी हुई धरती पर ही भोजन बनाता हूं। बुढि़या ने भी रट पकड़ ली कि आज तो धरती ना लीप सकूंगी। इसके अलावा आप जो भी करने को कहेंगे, मैं करूंगी। उसकी बात सुन साधु ने वचन लिया कि धरती लीपने के अलावा जो कहूं, करना पड़ेगा। बुढि़या ने तीन बार वचन दे दिया।

अपने बेटे को बुला दे

अपने बेटे को बुला दे

अब साधु ने कहा कि अपने बेटे को बुला दे। मैं उसकी पीठ पर अंगीठी जलाकर खाना बना लूंगा। साधु की बात सुनकर बुढि़या के होश उड़ गए, पर वह मंगलदेव को साक्षी मान वचन दे चुकी थी। उसने मंगलदेव का स्मरण कर अपने बेटे को बुलाकर साधु के पास भेज दिया। साधु ने कहा कि मां, तू ही अपने बेटे को लिटा और अंगीठी सुलगा दे। बुढि़या ने मंगलदेव का स्मरण करते हुए बेटे को औंधा लिटा कर अंगीठी जला दी और साधु महाराज को बोलकर अपना काम करने लगी। जब साधु महाराज का खाना बन गया, तब उन्होंने बुढ़िया को आवाज दी और कहा कि अपने बेटे को बुला दे। वह भी भोग ले लेगा।

तेरी अपने ईष्ट देव में अटल श्रद्धा है

तेरी अपने ईष्ट देव में अटल श्रद्धा है

बुढि़या ने हैरान होकर कहा कि महाराजा, अभी तो आपने उसकी पीठ पर खाना बनाया है। अब वह कहां से आएगा। आप कृपया भोजन ग्रहण करें और जहां जाना हो, जाएं। मुझे और दुखी ना करें। साधु ने हठ पकड़ ली कि अपने बेटे को आवाज दे। साधु की बात सुन बुढि़या ने जैसे ही कहा, मांगलिया, ओ मांगलिया! उसका बेटा दौड़ता हुआ आ गया। बेटे को देखकर बुढि़या चकित रह गई। तब साधु महाराज ने कहा कि मां! तेरा व्रत सफल हो गया। तेरी अपने ईष्ट देव में अटल श्रद्धा है, इसीलिए आज के बाद वे हर तरह से तेरी रक्षा करेंगे। तुझे कभी भी कोई कष्ट ना होगा।

मंगलवार का व्रत

मंगलवार का व्रत

मंगलवार का व्रत सभी प्रकार के सुख प्राप्त करने, रक्त विकार दूर करने, राज्य सम्मान पाने और पुत्र प्राप्ति के लिए किया जाता है। इस व्रत को रखने से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यह व्रत 21 सप्ताह तक किया जाना चाहिए। व्रत के दौरान गेहूं और गुड़ से बने आहार ही ग्रहण किए जाने चाहिए। भोजन दिन-रात में केवल एक बार ही किया जाना चाहिए। इस व्रत के अंत में हनुमान जी की पूजा करनी चाहिए। पूजा के समय लाल रंग के वस्त्र पहनें और हनुमान जी को लाल रंग के ही फूल चढ़ाएं। पूजा के बाद मंगलव्रत की कथा सुननी चाहिए और अंत में हनुमान जी की आरती करनी चाहिए। इस तरह विधिपूर्वक और पूरी श्रद्धा से व्रत किए जाने पर मंगलदेव प्रसन्न होते हैं और भक्त पर अपनी कृपा बरसाते हैं।

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