Diwali 2021: जानिए नरक चतुर्दशी और रूप चतुर्दशी का महत्व और कथा

नई दिल्ली, 03 नवंबर। कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को नरक चतुर्दशी या रूप चतुर्दशी के रूप में मनाया जाता है। आज वो शुभ दिन है। आज नरक की पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए तेल लगाकर अपामार्ग के पौधे सहित जल से स्नान किया जाता है। सायंकाल में यमराज की प्रसन्नता के लिए दीपदान किया जाता है। इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक दैत्य का वध किया था। इस कारण भी इसे नरक चतुर्दशी कहा जाता है।

जानिए नरक चतुर्दशी और रूप चतुर्दशी का महत्व और कथा

नरक चतुर्दशी की कथा

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    प्राचीन काल में रंतिदेव नामक राजा राज करते थे। वे पूर्व जन्म में एक धर्मात्मा तथा दानी थे। इस जन्म में भी वे दान आदि किया करते थे। उनके अंतिम समय में यमदूत उन्हें नरक में ले जाने के लिए आए। राजा ने कहा मैं तो दान-दक्षिणा तथा सतकर्म करता रहा हूं फिर मुझे नरक में क्यों ले जाना चाहते हो। यमदूतों ने बताया किएक बार तुम्हारे द्वार से भूख से व्याकुल ब्राह्मण खाली लौट गया था इसलिए तुम्हें नरक में जाना पड़ेगा।

    यह सुनकर राज ने यमदूतों से विनती की किमेरी आयु एक वर्ष और बढ़ा दी जाए। यमदूतों ने बिना विचार किए राजा की प्रार्थना स्वीकार कर ली और चले गए। राजा ने ऋषियों के पास जाकर इस पाप से मुक्ति का उपाय पूछा। ऋषियों ने बताया- हे राजन! तुम कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को व्रत रखकर भगवान कृष्ण का पूजन करना। ब्राह्मणों को भोजन करवाकर दक्षिणा देना तथा अपना अपराध ब्राह्मणों को बताकर उनसे क्षमा याचना करना तब तुम पाप से मुक्त हो जाओगे। कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को राजा ने नियम पूर्वक व्रत रखा और विष्णु लोक को चला गया।

    रूप चतुर्दशी की कथा

    कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन रूप सौंदर्य की प्राप्ति के लिए श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है। इसके संबंध में एक कथा प्रचलित है। एक समय भारतवर्ष में हिरण्यगर्भ नामक नगर में एक योगीराज रहते थे। उन्होंने अपने मन को एकाग्र करके भगवान में लीन होना चाहा। उन्होंने समाधि लगा ली। समाधि को कुछ ही दिन बीते थे किउनके शरीर में कीड़े पड़ गए। आंखों के रौओं, भौहों पर और सिर के बालों में जुएं हो गई। इससे योगीराज दुखी रहने लगे।

    उसी समय नारदमुनि वहां आए। योगीराज ने नारदमुनि से पूछा मैं समाधि में था, किंतु मेरी यह दशा क्यों हो गई। तब नारदजी ने कहा- हे योगीराज! तुम भगवान का चिंतन तो करते हो किंतु देह आचार का पालन नहीं करते। इसलिए तुम्हारी यह दशा हुई है। योगीराज ने देह आचार के विषय में नारदजी से पूछा।

    पहले तुम्हें जो मैं बताता हूं वह करो

    नारद बोले- देह आचार के विषय में जानने से अब कोई लाभ नहीं। पहले तुम्हें जो मैं बताता हूं वह करो। देह आचार के बारे में फिर कभी बताऊंगा। इस बार कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को व्रत रखकर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा ध्यान से करना। ऐसा करने से तुम्हारा शरीर पहले जैसा हो जाएगा। योगीराज ने ऐसा ही किया और उनका शरीर पहले जैसा स्वस्थ और सुंदर हो गया। उसी दिन से इस चतुर्दशी को रूप चतुर्दशी कहते हैं।

    कैसे करें चतुर्दशी पूजन

    सूर्योदय से पहले आटा, तेल, हल्दी, बेसन का उबटन शरीर पर मलकर स्नान करें। फिर एक थाली में चौमुखी दीपक तथा 16 छोटे दीपक लेकर उनमें तेल बाती डालकर जलावें। फिर रोली, खील, गुड़, धूप, अबीर, गुलाल, फूल आदि से घर के पुरुष-स्त्री पूजा करें। पूजन के बाद सभी दीपकों को घर के अंदर प्रत्येक स्थान पर रख दें। चारमुख वाले दीपक को मुख्य द्वार पर रख दें। लक्ष्मी माता के आगे चौक पूरकर धूप दीप कर दें।

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