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Jaya Ekadashi 2018: भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए जया एकादशी पर करें ये उपाय

By पं. गजेंद्र शर्मा
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    नई दिल्ली। भौतिक और सांसारिक जीवन में समस्त सुख पाने के लिए संसार के पालनकर्ता भगवान विष्णु का आशीर्वाद होना अत्यंत आवश्यक है। और भगवान श्रीहरि विष्णु को प्रसन्न् करने के लिए शास्त्रों में सबसे बड़ा व्रत एकादशी बताया गया है। हर माह दो एकादशियों के लिहाज से एक वर्ष में 24 एकादशी आती हैं। जब अधिकमास होता है तो ये 26 हो जाती हैं। इनमें भी माघ माह को सबसे पुण्यकारी माना गया है। इसीलिए माघ माह की एकादशी को 'जया एकादशी" नाम दिया गया है। जया यानी समस्त बुराइयों, संकटों, परेशानियों पर जीत हासिल करना। भागवत पुराण में जया एकादशी के महत्व के बारे में कहा गया है कि जो व्यक्ति समस्त भौतिक, सांसारिक सुख प्राप्त करना चाहता है, उसे माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत जरूर करना चाहिए। यह एकादशी भगवान विष्णु को परम प्रिय है। इस माह यह जया एकादशी का व्रत 27 जनवरी शनिवार को आ रहा है। यदि आप भी जीवन के संकटों से मुक्ति पाना चाहते हैं तो यह व्रत अवश्य करें।

    क्या है जया एकादशी की कथा

    क्या है जया एकादशी की कथा

    जया एकादशी के विषय में जो कथा प्रचलित है, उसके अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर भगवान श्री कृष्ण से निवेदन करते हुए पूछते हैं कि माघ शुक्ल एकादशी को किनकी पूजा करनी चाहिए, तथा इस एकादशी का क्या महत्त्व है?

    नीच योनि जैसे भूत, प्रेत, पिशाच

    नीच योनि जैसे भूत, प्रेत, पिशाच

    श्री कृष्ण कहते हैं माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी को 'जया एकादशी" कहते हैं। यह एकादशी बहुत ही पुण्यदायी है। इसका व्रत करने से व्यक्ति नीच योनि जैसे भूत, प्रेत, पिशाच की योनि से मुक्त हो जाता है। जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक जया एकादशी का व्रत रखता है वह ब्रह्म हत्या जैसे महापाप से भी छूट जाता है तथा भगवान विष्णु की कृपा से उसे जीवन के समस्त सुखों की प्राप्ति सहज ही हो जाती है। कथा के अनुसार एक समय नंदन वन में उत्सव चल रहा था। इस उत्सव में सभी देवता, योगी और दिव्य पुरूष उपस्थित थे। उस समय गंधर्व गायन कर रहे थे और गंधर्व कन्याएं नृत्य प्रस्तुत कर रही थीं। सभा में माल्यवान नामक एक गंधर्व गायन कर रहा था और पुष्यवती नामक गंधर्व कन्या नृत्य कर रही थी। इसी बीच पुष्यवती की नजर जैसे ही माल्यवान पर पड़ी वह उस पर मोहित हो गई। माल्यवान को आकर्षित करने के लिए पुष्यवती सभा की मर्यादा को भूलकर मदमस्त होकर नृत्य करने लगी। माल्यवान भी गंधर्व कन्या की भाव भंगिमा देखकर सुध बुध खो बैठा और गायन की मर्यादा से भटक गया। इससे उसके सुर ताल बिगड़ गए।

    इंद्र को क्रोध आया...

    इंद्र को क्रोध आया...

    सभा में मौजूद इंद्र को पुष्यवती और माल्यवान के अमर्यादित कृत्य पर क्रोध आया। उन्होंने दोनों को श्राप दे दिया कि आप स्वर्ग से वंचित हो जाएं और पृथ्वी पर निवास करें। मृत्यु लोक में अति नीच पिशाच योनि आप दोनों को प्राप्त हों। इस श्राप से तत्काल दोनों पिशाच बन गए और हिमालय पर्वत पर एक वृक्ष पर दोनों का निवास बन गया। यहां पिशाच योनि में इन्हें अत्यंत कष्ट भोगना पड़ रहा था। एक बार माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन दोनों अत्यंत दु:खी थे उस दिन वे केवल फलाहार पर रहे। रात्रि के समय दोनों को बहुत ठंड लग रही थी, इसालिए दोनों रात भर साथ बैठ कर जागते रहे, लेकिन अधिक ठंड के कारण दोनों की मृत्यु हो गई और अनजाने में जया एकादशी का व्रत हो जाने से दोनों को पिशाच योनि से मुक्ति भी मिल गई।

    भगवान विष्णु की जया एकादशी का प्रभाव

    भगवान विष्णु की जया एकादशी का प्रभाव

    अब माल्यवान और पुष्यवती पहले से भी सुंदर हो गए और स्वर्ग लोक में समस्त ऐश्वर्यों के साथ उन्हें स्थान मिल गया। देवराज ने जब दोनों को देखा तो चकित रह गए और पिशाच योनि से मुक्ति का कारण पूछा? माल्यवान ने कहा यह भगवान विष्णु की जया एकादशी का प्रभाव है। हम इस एकादशी के प्रभाव से पिशाच योनि से मुक्त हुए । इंद्र इससे अति प्रसन्न् हुए और कहा कि आप स्वयं पालनकर्ता के भक्त हैं इसलिए आप अब से मेरे लिए आदरणीय हैं। आप स्वर्ग में आनंद पूर्वक विहार करें।

    कैसे करें जया एकादशी व्रत

    कैसे करें जया एकादशी व्रत

    शास्त्रों में बताया गया है कि इस जया एकादशी व्रत के दिन पवित्र मन से भगवान विष्णु की पूजा करें। मन में द्वेष, छल-कपट, काम और वासना की भावना नहीं लानी चाहिए। नारायण स्तोत्र एवं विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। जो लोग इस एकादशी का व्रत रखते हैं उन्हें दशमी तिथि को एक समय आहार करना चाहिए। इस बात का ध्यान रखें कि आहार सात्विक हो। एकादशी के दिन श्री विष्णु का ध्यान करके संकल्प करें और फिर धूप, दीप, चंदन, फल, तिल, एवं पंचामृत से विष्णु की पूजा करे।

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    English summary
    Jaya Ekadashi is a fasting practice that is observed on the ‘ekadashi’ tithi during the Shukla Paksha (the bright fortnight of moon) in the month of ‘Magh’ in the Hindu calendar.

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