Govardhan Puja (Annakoot) : भगवान कृष्ण और गिरिराज गोवर्धन पूजा का दिन, जानिए कथा-आरती
Govardhan Puja के मौके पर श्रद्धालु गिरिराज गोवर्धन और भगवान कृष्ण की पूजा कर रहे हैं। गोवर्धन पूजा को Annakoot Puja के नाम से भी जाना जाता है। जानिए Govardhan Puja Katha
Govardhan Puja के मौके पर श्रद्धालु गिरिराज गोवर्धन और भगवान कृष्ण की पूजा कर रहे हैं। गोवर्धन पूजा को Annakoot Puja के नाम से भी जाना जाता है। Govardhan Puja की कथा देवराज इंद्र और भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी है। इंद्र को बारिश का भी देवता कहा जाता है। देवराज एक बार अहंकार के वशीभूत होकर कन्हैया यानी परमब्रह्म परमात्मा की शक्ति पहचानने में नाकाम रहे। इंद्र कन्हैया की लीला से नाराज हुए और ब्रजभूमि पर भयंकर बारिश हुई। इस पर गोकुलवासियों ने कृष्ण को जमकर कोसा। जब बारिश का दोष बाल कन्हैया को दिया जाने लगा तो नारायण के अंश कृष्ण ने अपनी सबसे छोटी उंगली (कानी उंगली) से गोवर्धन पर्वत उठा लिया।
गोवर्धन पूजा के साथ-साथ श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना और नारायण के कन्हैया स्वरूप को प्रसन्न करने के मंत्र-
- हे कृष्ण द्वारकावासिन् क्वासि यादवनन्दन। आपद्भिः परिभूतां मां त्रायस्वाशु जनार्दन।।
- ॐ नमो भगवते तस्मै कृष्णाया कुण्ठमेधसे। सर्वव्याधि विनाशाय प्रभो माममृतं कृधि।।
- 'ॐ नमो भगवते श्री गोविन्दाय'
- कृं कृष्णाय नमः

भगवान श्री कृष्ण की पूजा
पांच दिनों का दिवाली महोत्सव धनतेरस के साथ शुरू होता है। नरक चतुर्दशी, बड़ी दीपावाली के बाद 'गोवर्धन पूजा' होगी। Govardhan Puja के मौके पर लोग गौ माता, ब्रज भूमि के गोवर्धन पर्वत और परमावतार भगवान श्री कृष्ण की पूजा अर्चना करते हैं। गोवर्धन पूजा 'अन्नकूट' नाम से भी जाना जाता है।

बाल कन्हैया ने गोवर्धन पर्वत को उठाया
भारत की विविधता से भरी संस्कृति में ये भी दिलचस्प है कि गोवर्धन पूजा उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में भगवान कृष्ण के पराक्रम को याद करने का दिन होता है। मान्यता है कि बाल कन्हैया ने गोवर्धन पर्वत को अपनी एक उंगली पर उठा लिया था। भगवान कृष्ण को लीला पुरुषोत्तम के साथ-साथ करुणा के सागर और दयानिधान जैसे नामों से भी जाना जाता है।

गोवर्धन पूजा के दिन से नव वर्ष की शुरुआत
जिस दिन चन्द्रदर्शन हो, उस दिन गोवर्धन पूजा निषेध है। दीपावली की तरह इसमें भी दीपोत्सव का विधान है। गुजरात और महाराष्ट्र के कई इलाकों में इसी दिन से नव वर्ष की शुरुआत भी होती है। वैष्णवों का मुख्य पर्व माने जाने वाले गोवर्धन पूजा आयोजन भगवान कृष्ण और विष्णु मन्दिर के अलावा गृहस्थों के घरों में भी धूमधाम से किया जाता है। गोवर्धन पूजा के लिए घर के आंगन में गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की प्रतिकृति बनाई जाती है। गोबर से ही पशुधन बनाए जाते हैं। विधि-विधान से पूजा के बाद कथा सुनी जाती है।

ब्रजभूमि पर भयंकर बारिश हुई
देवराज इंद्र और भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी गोर्धन कथा के संबंध में पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक देवराज एक बार अहंकार के वशीभूत होकर कन्हैया यानी परमब्रह्म परमात्मा की शक्ति पहचानने में नाकाम रहे। इंद्र कन्हैया की लीला से नाराज हुए और ब्रजभूमि पर भयंकर बारिश हुई। इस पर गोकुलवासियों ने कृष्ण को जमकर कोसा। जब बारिश का दोष बाल कन्हैया को दिया जाने लगा तो नारायण के अंश कृष्ण ने अपनी सबसे छोटी उंगली (कानी उंगली) से गोवर्धन पर्वत उठा लिया।

इंद्र को गलती का एहसास हुआ
अंतर्यामी कन्हैया ने देवराज का अहंकार हरने के लिए सारे ग्रामवासियों और गायों को गोवर्धन पर्वत के नीचे बुला लिया। मूसलाधार बारिश के बाद भी गोकुलवासियों का बाल बांका नहीं हुआ। इसके बाद देवराज एहसास हुआ कि कन्हैया कोई साधारण बालक नहीं। ब्रह्माजी के पास जाने पर इंद्र को कृष्ण के नारायण अवतार होने का पता लगा। इंद्र को गलती का एहसास हुआ और बारिश बंद करने के बाद श्रीकृष्ण से माफी मांगी।

कृष्ण इंद्र का टकराव ! गोवर्धन पूजा की शुरुआत
गोवर्धन पूजा की कथा द्वापर युग से जुड़ी हुई है। पौराणिक मान्यता है कि परमब्रह्म श्री कृष्ण ने ब्रजवासियों को पकवान बनाते देखा। गोकुलवासियों को पूजा की तैयारियों में व्यस्त देख श्री कृष्ण ने योशदा मईया से पूछा कि ब्रजवासी किसकी पूजा करने की तैयारी कर रहे हैं। जवाब मिला कि ब्रजवासी इंद्र देव की पूजा करेंगे। कान्हा की लीला में दूसरा सवाल आया। इंद्रदेव की पूजा क्यों ? इस पर माता यशोदा बताया, इंद्रदेव वर्षा करते हैं। अच्छी वर्षा अन्न की अच्छी पैदावार के लिए जरूरी है। इसी से गायों को चारा मिलता है। कन्हैया ने कहा कि वर्षा तो इंद्रदेव का कर्तव्य है। यदि पूजा ही करनी है तो हमें गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि हमारी गायें गिरिराज गोवर्धन पर चरती हैं। वहीं से फल-फूल, सब्जियां भी मिलती हैं। कान्हा का तर्क सुनकर ब्रजवासी इंद्रदेव को छोड़कर गिरिराज गोवर्धन की पूजा करने लगे। देवराज इंद्र ने कृष्ण लीला को अपमान समझा। बाद में भयंकर बारिश और जलप्रलय जैसे मंजर के बीच कान्हा ने गिरिराज गोवर्धन को उंगली पर धारण किया। लोगों ने परमावतार कृष्ण के दर्शन किए और इसी दिन से गोवर्धन पूजा की परंपरा शुरू हो गई। 56 भोग लगाने की परंपरा के कारण इसे अन्नकूट भी कहा जाने लगा।

Govardhan Puja पर 56 भोग
श्रीकृष्ण के पराक्रम और करुणा से अभिभूत भक्त कन्हैया को 56 भोग अर्पित करते हैं। Govardhan Puja के मौके पर पालतू मवेशियों- गाय-बैल को स्नान कराने की भी परंपरा है। स्नान के बाद गौ माता और पशुधन को रंग लगाया जाता है। इनके गले में नई रस्सी भी डाली जाती है।
गोवर्धन भगवान की आरती---
श्री गोवर्धन महाराज, ओ महाराज,
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।
तोपे पान चढ़े तोपे फूल चढ़े,
तोपे चढ़े दूध की धार।
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।
तेरी सात कोस की परिकम्मा,
और चकलेश्वर विश्राम
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।
तेरे गले में कण्ठा साज रहेओ,
ठोड़ी पे हीरा लाल।
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।
तेरे कानन कुण्डल चमक रहेओ,
तेरी झाँकी बनी विशाल।
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।
गिरिराज धरण प्रभु तेरी शरण।
करो भक्त का बेड़ा पार
तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ।
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