Khajuraho-Panna Railway Project: रेलवे का गजब कारनामा! MP में पहले काट डाले 54 हजार पेड़, अब बोले-रूट अनसेफ
Khajuraho-Panna Rail Project controversy: मध्य प्रदेश का बुंदेलखंड क्षेत्र इस समय भीषण गर्मी, रिकॉर्डतोड़ तापमान और गंभीर जल संकट से जूझ रहा है। ऐसे संवेदनशील समय में पर्यावरण को सुरक्षित रखने के बजाय, विकास की अंधी दौड़ में सरकारी तंत्र ने एक ऐसा आत्मघाती कदम उठाया है जिसे जानकर हर कोई हैरान है।
खजुराहो-पन्ना रेलवे लाइन के लिए छतरपुर और पन्ना जिलों के घने जंगलों को चीरते हुए ट्रैक बिछाने का पहला चरण पूरा हो चुका था। इसके लिए 315 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि को डाइवर्ट किया गया और लगभग 25 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि खर्च कर दी गई।

लेकिन जब ट्रेन दौड़ाने की बारी आई, तो इंजीनियरों और योजनाकारों को होश आया कि इस रूट में इतने खतरनाक और तीखे मोड़ (Sharp Curves) हैं कि इस पर परिचालन करना सुरक्षा के लिहाज से बेहद खतरनाक साबित होगा।
Khajuraho-Panna Rail Project का क्या है पूरा मामला? सैटेलाइट तस्वीरों ने खोली पोल
खजुराहो-पन्ना रेलवे लाइन, लालितपुर-सिंगरौली ब्रॉड गेज रेलवे परियोजना का हिस्सा है। इस परियोजना का उद्देश्य मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड और विंध्य क्षेत्रों में रेल कनेक्टिविटी को मजबूत करना बताया गया था। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में सैटेलाइट इमेजरी के जरिए यह साफ देखा जा सकता है कि जिस घने जंगल को काटकर रेलवे लाइन का रास्ता बनाया गया था, वह अब पूरी तरह से वीरान और तबाह हो चुका है।
शुरुआती योजना में की गई भारी चूक के कारण पुराने ट्रैक को अब पूरी तरह से नकारा या आंशिक रूप से छोड़ा जा सकता है। बता दें कि इन नए प्रोजेक्ट के तहत 6 स्टेशन बनाए जाएंगे।
तकनीकी सुरक्षा और ऑपरेशनल एफिशिएंसी का हवाला देते हुए अब अधिकारियों ने एक संशोधित रिवाइज्ड अलाइंमेंट को मंजूरी दी है। यह नया प्रस्तावित रूट और भी घने जंगलों से होकर गुजरेगा, जिसके कारण लगभग 50,000 अतिरिक्त पेड़ों को काटना पड़ेगा।
लेकिन सवाल यह कि क्या ये केवल एक योजना की भूल है? पर्यावरणविदों का कहना है कि यह कोई सामान्य 'प्लानिंग एरर' नहीं है, बल्कि यह बड़े पैमाने पर संस्थागत लापरवाही (Institutional Negligence) और पारिस्थितिकीय लागत के प्रति आपराधिक उपेक्षा है।
रेलवे के नए रुट से अब 50 हजार और पेड़ों पर संकट
सबसे बड़ा विवाद यही है कि नया प्रस्तावित रूट घने जंगलों से होकर गुजर सकता है। इससे लगभग 50 हजार अतिरिक्त पेड़ों की कटाई की आशंका जताई जा रही है। यानी पहले हजारों पेड़ काटे गए, फिर पता चला कि योजना में खामी थी और अब उसी गलती को सुधारने के लिए और जंगल काटने की तैयारी हो रही है।
वे 5 सवाल, जिनके जवाब जंगल खोज रहे हैं
पन्ना और पूरे देश के पर्यावरण प्रेमी अब इस तबाही को लेकर रेलवे और पर्यावरण मंत्रालय से सीधे जवाब मांग रहे हैं। रूट को मंजूरी किसने दी? जब शुरुआती सर्वे हुआ था, तो उन विशेषज्ञों और इंजीनियरों ने इन तीखे मोड़ों (Sharp Curves) को हरी झंडी कैसे दे दी, जो आज असुरक्षित लग रहे हैं?
किसने दी पर्यावरण मंजूरी (Environmental Clearances)? बिना गहन भौगोलिक और तकनीकी जांच के किस आधार पर 54,000 से अधिक जीवित पेड़ों को काटने की अनुमति पर हस्ताक्षर किए गए? करोड़ों की बर्बादी का जिम्मेदार कौन? जो ₹25 करोड़ जनता के टैक्स का पैसा जंगलों को उजाड़ने और ट्रैक बनाने में बर्बाद हुआ, उसकी वसूली किससे होगी? जवाबदेही किसकी तय होगी?
क्या इस भयानक प्रशासनिक चूक के लिए किसी वरिष्ठ अधिकारी या सलाहकार एजेंसी पर कार्रवाई होगी, या इसे 'रूटीन प्रक्रिया' कहकर रफा-दफा कर दिया जाएगा? क्या खोए हुए इकोसिस्टम की भरपाई संभव है? क्या सरकार कागजों पर होने वाले क्षतिपूरक वनीकरण' से पन्ना के सैकड़ों साल पुराने जीवित नेटवर्क को वापस ला सकती है?
क्या जंगल को Ctrl+Z' से वापस लाया जा सके?
इस विकास बनाम विनाश पर पर्यावरणविदों ने कहा है कि सरकारी अधिकारी जंगलों को केवल कंप्यूटर की 'एक्सेल स्प्रेडशीट' (Spreadsheet) पर दर्ज आंकड़े समझते हैं। पन्ना का यह जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं है, यह एक जीवित नेटवर्क है जो मिट्टी, बारिश, भूजल स्तर, जैव विविधता (Biodiversity) और स्थानीय तापमान को नियंत्रित रखता है। जब हजारों पेड़ एक साथ गायब होते हैं, तो पूरा इकोसिस्टम चुपचाप बिना किसी प्रेस रिलीज के ढह जाता है।
विकास बनाम विनाश पर एक बार फिर सवाल खड़ा हो गया है। भारत में विकास को 'रफ्तार' का पर्यायवाची मान लिया गया है, जहां जंगलों को बाधा, नदियों को रियल एस्टेट और पर्यावरण मंजूरी को महज एक कागजी औपचारिकता (Paperwork Ritual) समझा जाता है। सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं है कि 54 हजार पेड़ काट दिए गए। त्रासदी यह है कि उन्हें काटने की कोई जरूरत ही नहीं थी यदि शुरुआती प्लानिंग बुनियादी समझ और सक्षमता के साथ की गई होती।
पन्ना के जंगल भारत का असली 'इन्फ्रास्ट्रक्चर' हैं
यद्यपि रेलवे अधिकारियों ने इस बदलाव का बचाव करते हुए कहा है कि सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता और नए रूट के बदले नियमनुसार नए पौधे लगाए जाएंगे, लेकिन यह दलील किसी के गले नहीं उतर रही है। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में, जहां मध्य भारत भीषण हीटवेव के खतरे का सामना कर रहा है, ऐसी लापरवाह बुनियादी ढांचा परियोजनाएं प्रगति नहीं बल्कि देश के भविष्य के लिए एक बड़ा बोझ हैं।
पन्ना के ये जंगल कभी विकास विरोधी नहीं थे वे भारत के उस 'असली इन्फ्रास्ट्रक्चर' का हिस्सा हैं जो किसी रिबन काटने के समारोह में नहीं दिखता, बल्कि देश के पूरे पर्यावरण को एक साथ थामे रखता है।














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