Chhath Puja 2019 : खरना आज, सूर्यदेव को भोग लगाने के बाद शुरू होगा 36 घंटे का निर्जला उपवास
पटना। इस समय बिहार समेत पूरा उत्तर भारत लोक आस्था के महापर्व छठ के रंग में पूरा रंगा हुआ है। नहाय खाय के दूसरे दिन खरना होता है, जो कार्तिक शुक्ल की पंचमी तिथि होती है। खरना इसलिए खास है क्योंकि इस दिन व्रतधारी दिनभर उपवास रखने के बाद शाम को भगवान को भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। आज के दिन भोजन में गुड़ की खीर खाने की परंपरा है। खीर के साथ साथ आग पर बनी आंटे की मोटी रोटी का भी प्रसाद बांटा जाता है।

स्वच्छता और शुद्धता का विशेष ख्याल
'खरना' के पूजा के लिए घर का सबसे शांत कोना चुना जाता है, खरना का खाना मिट्टी के चू्ल्हे पर बनता है... खीर पकाने के लिए साठी के चावल का प्रयोग किया जाता है और स्वच्छता और शुद्धता का काफी ध्यान रखा जाता है। खीर के अलावा मूली, केला के साथ छठी मइया की पूजा की जाती है। खरना का खाना मिट्टी के चू्ल्हे पर बनता है जिसके लिए सूखी लकड़ी का प्रयोग किया जाता है। खरना के बाद 36 घंटे का व्रत शुरू हो जाएगा जो कि सूर्य के अर्ध्य देने के बाद ही समाप्त होगा।

क्यों कहा जाता है इसे छठ?
वैसे तो सिर्फ उगते सूरज को ही अर्धय दिया जाता है किन्तु इस पर्व में डूबते हुये सूर्यदेव की भी आराधना की जाती है। सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा जाता है।
ये है व्रत की विधि
नहाय-खाय के दूसरे दिन यानी कार्तिक शुक्ल पक्ष पंचमी के दिनभर व्रती उपवास कर शाम में रोटी और गुड़ से बनी खीर का प्रसाद ग्रहण करते हैं। इस पूजा को 'खरना' कहा जाता है।इसके अगले दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि को उपवास रखकर शाम को व्रतियां टोकरी (बांस से बना दउरा) में ठेकुआ, फल, ईख समेत अन्य प्रसाद लेकर नदी, तालाब, या अन्य जलाशयों में जाकर अस्ताचलगामी सूर्य को अघ्र्य दिया जाता है, इसके अगले दिन यानी सप्तमी तिथि को सुबह उदीयमान सूर्य को अघ्र्य अर्पित करके व्रत तोड़ा जाता है।

धार्मिक मान्यता
मनोवांछित फल देने वाले इस पर्व को पुरुष और महिला समान रूप से मनाते हैं, परंतु आम तौर पर व्रत करने वालों में महिलाओं की संख्या अधिक होती है। प्राचीन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अनुपम महापर्व को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं।
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