कोरोना वायरस से निपटने में योगी सरकार कैसे हुई कामयाब? जानिए पूरी कहानी
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में कोरोना वायरस से निपटने की कहानी हर चुनौती से जूझने की रही। अन्य राज्यों की तुलना में ज़्यादा कुशलता से उप्र ने कैसे इस काम को अंजाम दिया? दावों की मानें तो फरवरी 2020 से मार्च 2021 तक राज्य में 3।26 करोड़ टेस्ट हुए, 771 अस्पतालों के नेटवर्क में 1।75 लाख बिस्तर उपलब्ध रहे, 45 लैब्स में आरटी पीसीआर टेस्ट की सुविधा रही, देश के औसत से बेहतर उप्र में रिकवरी रेट 98।2% रही और अब तक करीब 35 लाख लोगों को वैक्सीन दी जा चुकी है।

खबरें ये भी रहीं कि कम संसाधनों के बावजूद बेहतर नतीजे लाने के लिए उप्र को सराहा जा चुका है। कामयाबी की इस कहानी के पीछे कुछ फैक्टर रहे हैं, जिन्हें समझा जाना चाहिए। सबसे पहला फैक्टर रहा टीम-11। इस टीम ने शुरूआत में ही पूरी योजना तैयार की और सरकार के तमाम विभागों के बीच एक सामंजस्य बनाया ताकि कोरोना महामारी से कुशलता से निपटा जा सके।
सर्विलांस : चूंकि 80% केस ऐसे थे, जिनमें लक्षण साफ तौर पर सामने नहीं आए इसलिए सर्विलांस के ज़रिये संक्रमितों को पहचानना और उन्हें आइसोलेट करना ही कारगर तरकीब थी। एक रिपोर्ट की मानें तो उप्र में 1 लाख से ज़्यादा सर्विलांस कर्मियों ने अब तक 3।12 करोड़ घरों में जाकर करीब 1।86 लाख इलाकों को कवर किया है यानी करीब 15 करोड़ की आबादी सर्विलांस में आ चुकी है।
टेस्टिंग और तरकीब : उप्र देश में सबसे ज़्यादा कोरोना टेस्ट करने वाला राज्य बना और 15 मार्च तक यहां 3।2 करोड़ से ज़्यादा टेस्ट किए जा चुके थे। इसके अलावा, उप्र ने संसाधनों को अपने स्तर पर जुटाने और बढ़ाने की तरकीबें अपनाईं। टीबी टेस्टिंग मशीनों का इस्तेमाल किया गया, एमएसएमई यूनिटों और शुगर मिलों में पीपीई किट्स, थर्मामीटरों और सैनिटाइज़रों की मैनुफैक्चरिंग की गई। प्लाज़मा थैरेपी के लिए भी उप्र ने निजी स्तर पर कुशलता से काम किया।
तकनीक का इस्तेमाल : जब केस बढ़ने के दौरान चुनौतियां पेश आईं तब उप्र प्रशासन ने तकनीक को टूल की तरह इस्तेमाल किया। जीपीएस के ज़रिये मरीज़ों को ट्रैक करना हो या कॉल रिकॉर्ड्स से संक्रमितों के कॉंटैक्ट्स को ट्रैस करना, उप्र ने तत्परता दिखाई। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से कॉर्डिनेशन किया गया, ई-संजीवनी सेवा से गैर कोरोना संक्रमित मरीज़ों को अटैंड किया गया तो SGPGI के एक्सपर्टों से टेलिफोन के ज़रिये तनावग्रस्त लोगों की मदद की।
बाहरी मदद : उप्र के हेल्थकेयर इन्फ्रास्ट्रक्चर को लेकर सवाल और दुविधाएं बनी हुई थीं, ऐसे में राज्य को ज़ाहिर तौर पर बाहरी मदद की ज़रूरत थी। टाटा ट्रस्ट और एचसीएल जैसे कॉर्पोरेट्स ने न केवल मुख्यमंत्री कोविड केयर फंड में दान दिया बल्कि सामजिक संस्थाओं और वॉलेंटियरों ने सेवाएं दीं तो WHO और यूनिसेफ जैसी संस्थाओं ने राज्य को तकनीकी मदद भी दी। इसके साथ ही, लॉकडाउन जैसे सख्त कदमों के दौरान प्रभाव वाले सेलिब्रिटियों ने भी जागरूकता के लिए योगदान दिया।












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