Assam Child Marriage: बाल विवाह के खिलाफ कार्रवाई पर बवाल क्यों?

बाल विवाह के खिलाफ असम सरकार की कार्रवाई पूरे देश के लिए एक उदाहरण बन सकता है। इसे मजहबी चश्मे से देखना गलत है। कानून बनने के बाद भी जो कार्य 2006 से नहीं हुआ, यदि वह अब हो रहा है तो इससे समस्या किसे है?

Why the ruckus on action against child marriage in assam?

Assam Child Marriage: असम में इन दिनों बाल विवाह की प्रवृति को हतोत्साहित करने के लिए हेमंत बिस्वा सरमा सरकार फ्रंट फुट पर खेल रही है। बाल विवाह में शामिल होने के आरोप में 3,000 से अधिक व्यक्तियों की गिरफ्तारी ने जनता और राजनीतिक वर्गों को दो धड़ों में बांट दिया है। गिरफ्तार व्यक्तियों में मुस्लिम समुदाय से अधिक हैं अतः इस मुद्दे पर राजनीति भी जमकर हो रही है। एक वर्ग का कहना है कि मात्र कानून के बल पर इस समस्या को हल नहीं किया जा सकता है जबकि दूसरे वर्ग का मानना है कि कम से कम इस कानून पर चर्चा तो की ही जा रही है और इससे इस कुरीति पर लगाम लगाने में सहायता प्राप्त होगी।

हमारे देश में बाल विवाह आज भी बड़ी कुरीति के रूप में विद्यमान है। भारत में होने वाले विवाहों में लगभग 23 प्रतिशत बाल विवाह होते हैं जबकि असम में यह आंकड़ा 32 प्रतिशत से अधिक है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2019-20 में असम में एक लाख से अधिक लड़कियों का विवाह 18 वर्ष की आयु से पूर्व कर दिया गया। असम में 11.7 प्रतिशत लड़कियां कम आयु में ही गर्भवती हुईं और स्वास्थ्यगत समस्याओं के चलते राज्य में मातृ मृत्यु दर देश में सबसे अधिक हो गई है। इसमें मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी सर्वाधिक है।

मुस्लिम समुदाय में बाल विवाह की अधिकता चौंकाती है। चूंकि संविधान के अनुच्छेद 44 के अनुसार भारत में समान नागरिक संहिता की ठोस पहल शुरू नहीं हुई है अतः मुस्लिम समाज मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अनुसार विवाह और तलाक के मामले निर्धारित करता है। मुस्लिमों की मजहबी परंपरा के तहत मुस्लिम लड़कियों की शादी मासिक शुरु होने पर की जा सकती है जिसे सामान्यतः 12-14 साल की आयु माना जाता है। जबकि भारत के कानून के अनुसार ऐसा विवाह बाल विवाह की श्रेणी में तो आता ही है, यह पॉस्को एक्ट (18 वर्ष की आयु से कम लड़कियों/लड़कों को यौन अपराधों से संरक्षण देने का कानून) के अंतर्गत भी आपराधिक मामला बनता है।

क्या इस्लाम में बाल विवाह जायज है?

सामान्यतः मुस्लिम समुदाय की ओर से यह दलील दी जाती है कि लड़की जब रजस्वला हो तो उसका विवाह होना ठीक है। लड़कियों में यह आयु 12-14 वर्ष के बीच मानी जाती है। हालांकि इस पर मुस्लिमों के बीच ही असमंजस की स्थिति है क्योंकि ऐसा कहीं लिखित रूप में नहीं है। राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के प्रमुख राष्ट्रीय संयोजक मोहम्मद अफजाल कहते हैं, "मुसलमान कम उम्र में लड़कियों की शादी को तो सुन्नत मानते हैं लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि निकाह के समय लड़की की मर्जी पूछना बहुत जरूरी होता है। इससे भी अधिक जरूरी है आप जहां रहते हैं वहां के कानून मानना। कुरआन में भी कहा गया है कि आप जहां रहते हैं वहां के बादशाह के नियम-कायदे मानना जरूरी है।' मोहम्मद अफजाल के मुताबिक अगर भारत में बाल विवाह का निषेध है तो इसे मुसलमानों को भी मानना चाहिए क्योंकि यह यहां के निजाम का कानून है।

बाल विवाह पर रोक के लिए कानून

भारत में पहली बार बाल विवाह निषेध अधिनियम, 1929 के तहत बाल विवाह को प्रतिबंधित किया गया था। इसके प्रावधान के अनुसार, 14 वर्ष से कम आयु की लड़कियों और 18 वर्ष से कम आयु के लड़कों के विवाह को गैर-कानूनी करार दिया गया था। चूंकि इस कानून में आयु सम्बन्धी विसंगति थी अतः 1978 में इस कानून में संशोधन कर लड़कियों के विवाह की आयु 18 वर्ष और लड़कों के लिए 21 वर्ष कर दी गई।

2006 में बाल विवाह निषेध अधिनियम ने 1929 में बने कानून का स्थान ले लिया जिसमें विवाह की न्यूनतम आयु की सीमा दोनों पक्षों के लिए 18 वर्ष और 21 वर्ष ही रही। हालांकि बाल विवाह निषेध (संशोधन) विधेयक, 2021 के तहत लड़कियों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष से बढ़ाकर 21 वर्ष करने का प्रस्ताव है।

जया जेटली की अध्यक्षता वाली टास्क फोर्स की सिफारिश के अनुसार लड़कियों की शादी की उम्र 18 से 21 साल करने के लिए केंद्र सरकार ने दिसंबर, 2021 में कानून में बदलाव का बिल पेश किया था जिस पर केंद्र सरकार और राज्यों के बीच सहमति नहीं बनी है। यदि इस प्रस्ताव पर सहमति बनती है और इसे कानूनी रूप मिलता है तो यह कानून देश के सभी समुदायों पर लागू होगा।

न्यायालयों के फैसलों से उपजी भ्रम की स्थिति

मुस्लिम समुदाय पर बाल विवाह के मामलों में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का कानून लागू होना चाहिए अथवा पॉस्को कानून, इस बारे में कई उच्च न्यायालयों के अलग-अलग आदेशों ने भ्रम की स्थिति उत्पन्न की है। कर्नाटक और पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय ने नाबालिग मुस्लिम पत्नी के साथ यौन संबंध बनाने वाले पति के खिलाफ आपराधिक मामला रद्द कर दिया था। इसके विरुद्ध राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग ने दिसंबर, 2022 में उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की है जिस पर उच्चतम न्यायालय ने 13 जनवरी, 2023 को नोटिस जारी करके केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।

वहीं मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने केंद्र सरकार से अपील की है कि वह संसद के माध्यम से यौन संबंधों पर सहमति की निर्धारित आयु को 18 साल से कम करने पर विचार करे क्योंकि किशोर आयु के बच्चे प्रेम अथवा विवाह के बाद सहमति से संबंध बनाते हैं तो उनके विरुद्ध आपराधिक मामला दर्ज करना गलत है।

इसके अलावा केरल उच्च न्यायालय ने 2019 में कहा कि उच्चतम न्यायलय के फैसले के अनुसार बाल विवाह का भी रजिस्ट्रेशन हो सकता है। न्यायालय के अनुसार रजिस्ट्रेशन का मतलब शादी की वैधता का निर्धारण करना नहीं है किन्तु कानून और न्यायालयों के इन फैसलों से समाज में विरोधाभास बढ़ रहा है। कानून के अनुसार यदि बाल विवाह अवैध है तो फिर सरकारी विभाग में उसका रजिस्ट्रेशन कैसे होगा? राष्ट्रीय महिला आयोग तथा राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अनुसार संसद द्वारा पारित सर्वोपरि कानून के ऊपर पर्सनल लॉ को वरीयता देना असंवैधानिक है और बाल विवाह के कानून में एकरूपता आवश्यक है।

असम सरकार की पहल देश में समान नागरिक संहिता का मार्ग प्रशस्त करेगी?

बाल विवाह निषेध कानून, 2006 में बना था किन्तु इतने वर्षों बाद भी मुस्लिम तुष्टिकरण के कारण किसी सरकार ने इसके अनुपालन में रुचि नहीं दिखाई। अब जबकि असम सरकार बाल विवाह के मामलों पर सख्ती कर रही है तब मुस्लिम समुदाय, कांग्रेस और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट ने हेमंत बिस्वा सरमा के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया है जिसकी गूंज अब राष्ट्रव्यापी हो चली है।

असद्दुदीन ओवैसी से लेकर समाजवादी पार्टी के मुस्लिम नेताओं ने भी असम सरकार पर मजहबी राजनीति करने का आरोप लगाया है जबकि सत्य यह है कि असम सरकार एक ऐसे मुद्दे को बहस के केंद्र में ले आई है जिस पर मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते कभी चर्चा ही नहीं होती थी।

इसके अलावा असम सरकार ने 14 वर्ष से कम आयु की लड़कियों के विवाह पर पॉस्को कानून के तहत कार्रवाई के आदेश भी दिए हैं जिससे हडकंप मचा हुआ है और राज्य में बड़ी संख्या में होने जा रहे बाल विवाह निरस्त हुए हैं।

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    चूंकि बाल विवाह निषेध कानून, पॉस्को कानून और न्यायालाओं के पूर्व के निर्णयों से बड़े विरोधाभास उभरे हैं अतः असम सरकार की कार्रवाई देश में समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर बल दे रही है। विवाह, तलाक, संपत्ति आदि मामलों में कानूनी समानता रहना जरूरी है ताकि सभी वर्ग की महिलाओं को समान अधिकार प्राप्त हो।

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    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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