Assam Child Marriage: असम में प्रसव के दौरान सबसे ज्यादा मौतें, इसलिए बाल विवाह पर सरकार सख्त

असम में बाल विवाह पर सरकारी कार्रवाई को लेकर हंगामा मचा हुआ है लेकिन मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने साफ कर दिया है कि यह अभियान साल 2026 तक लगातार चलेगा।

Assam govt strict on Child Marriage due to Most deaths during childbirth

Assam Child Marriage: असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने 23 जनवरी 2023 को पूरे राज्य में बाल विवाह के खिलाफ अभियान शुरू करने की घोषणा की। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि 14 साल से कम उम्र की लड़कियों से शादी करने वाले पुरुषों पर पॉक्सो एक्ट (Protection of Children from Sexual Offences Act) के तहत मामला दर्ज किया जाएगा। वहीं 14-18 साल की लड़की से शादी करने पर बाल विवाह रोकथाम कानून के तहत केस दर्ज किया जाएगा। इसके लिए सरकार पिछले 7 सालों में बाल विवाह में शामिल लोगों पर कार्रवाई करेगी।

यहां सरकार सिर्फ परिवार या लड़का-लड़की को ही फोकस नहीं करेगी बल्कि बाल विवाह कराने वाले मुल्लाओं, काजियों और पुजारियों पर नकेल कसने की तैयारी में हैं। साथ ही मुख्यमंत्री सरमा का कहना है कि राज्य में 2026 के विधानसभा चुनाव तक यह मुहिम जारी रहेगी। खबरों के मुताबिक अब तक 4,074 मामलों में 2,500 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया है। हालांकि, पुलिस के पास सबसे बड़ी चुनौती 60 से 90 दिन के भीतर चार्जशीट फाइल करना है। इस पूरे ऑपरेशन का मकसद राज्य में बाल विवाह की प्रवृति को खत्म करना है।

राज्य में बन रहीं अस्थायी जेलें

असम पुलिस अब तक बाल विवाह कानून के तहत 4 हजार से ज्यादा केस दर्ज कर चुकी है। सरकार का आदेश है कि यह अभियान 2026 तक चलेगा। इस लिहाज से असम के कई जिलों में इस मामले में पकड़े गए लोगों को रखने के लिए नयी अस्थायी जेलें बनाई जा रही हैं, ताकि जेलों में जगह न बचने पर इनका इस्तेमाल हो सकें।

क्यों हो रहा है विरोध?

दरअसल, असम सरकार ने हाल ही एक प्रस्ताव को मंजूरी दी, जिसमें 14 साल से कम उम्र की लड़कियों से शादी करने वाले पुरुषों के खिलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई की जाएगी। वहीं 14 से 18 साल की उम्र की लड़कियों से शादी करने वालों पर 2006 के बाल विवाह निषेध कानून के तहत मामला दर्ज किया जाएगा।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के 2020 के आंकड़ों के अनुसार, बाल विवाह निषेध अधिनियम के तहत देशभर में कुल 785 मामले दर्ज किये गये थे। पंजीकृत मामलों की संख्या कर्नाटक में सबसे अधिक 184 थी। इसके बाद असम में 138, पश्चिम बंगाल में 98, तमिलनाडु में 77 और तेलंगाना में 62 थे। हालांकि, बाल विवाह का मामला ऐसा है कि सामाजिक ताने-बाने के कारण ज्यादातर मामले पुलिस तक पहुंच ही नहीं पाते हैं। इसलिए असम सरकार ने बाल विवाह रोकने के लिए सभी 2197 ग्राम पंचायत सचिवों को बाल विवाह निषेध अधिनियम के तहत बाल विवाह रोकथाम अधिकारी के रूप में नामित किया हैं। जो बाल विवाह होने पर या ऐसे मामले सामने आने पर ये अधिकारी थानों में केस दर्ज करवाएंगे।

कितनी हो सकती है सजा?

वैसे तो भारत में विवाह की कानूनी उम्र लड़कों के लिए 21 साल और लड़कियों के लिए 18 साल है। इससे कम उम्र में शादी होने पर उसे बाल विवाह माना जाता है। बाल विवाह का कानून देश में आजादी से पहले का है। तब लड़कों की कानूनी उम्र 18 साल और लड़कियों के लिए 14 साल थी। इसके बाद साल 1978 में इसमें संशोधन कर शादी के लिए कानूनी उम्र लड़कों के लिए बढ़ाकर 21 साल और लड़कियों के लिए 18 साल कर दी गयी। उसके बाद साल 2006 में फिर संशोधन किया गया और बाल विवाह को गैर-जमानती अपराध बनाया गया। इसके तहत बाल विवाह पर दो साल तक की कैद और एक लाख रुपये के जुर्माने की सजा है। साथ ही अगर तय उम्र से कम में शादी हो भी जाती है तो कोर्ट उसे अमान्य घोषित कर देती है।

बाल विवाह के तहत बच्चों के यौन शोषण की घटनाएं भी सामने आई थी, तब इन अपराधों से बचाने के लिए 2012 में प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस एक्ट (POSCO) लाया गया। यह कम उम्र के लड़के और लड़कियों, दोनों पर लागू होता है। साल 2019 में इस कानून में संशोधन कर मौत की सजा को भी जोड़ा गया। इस कानून के तहत 7 साल की जेल से लेकर उम्रकैद तक हो सकती है। इस कानून के तहत अगर उम्रकैद की सजा मिली है तो दोषी को ताउम्र जेल में ही बिताना पड़ता है।

असम में क्यों पड़ी इसकी जरूरत?

सैम्पल रजिस्ट्रार सर्वे (SRS) की रिपोर्ट के मुताबिक असम में मातृ मृत्यु दर हर एक लाख जन्म पर 195 हैं। यह संख्या देश में सबसे ज्यादा हैं। मतलब एक लाख महिलाओं में से 195 की मौत प्रसव के दौरान ही हो जाती है। वहीं, नवजात मृत्यु दर हर एक हजार जन्म पर 36 है, जबकि राष्ट्रीय औसत 28 का है। मतलब हर एक हजार में से 36 बच्चे पैदा होते ही मर जाते हैं। गौरतलब है कि 2016-18 में मातृ मृत्यु दर तब प्रति एक लाख महिलाओं पर 215 थी।

वहीं नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 (NFHS 2019-21) के आंकड़े बताते हैं कि असम में 20 से 24 साल की उम्र की तकरीबन 32 प्रतिशत लड़कियां ऐसी हैं जिनकी शादी 18 साल की उम्र से पहले ही कर दी जाती है। ये सर्वे 2019 और 2021 में दो फेज में हुआ था, इस अवधि में बाल विवाह में 30.8% से 31.8% की वृद्धि दर्ज की गई थी। वहीं राष्ट्रीय स्तर पर 20 से 24 साल की उम्र की 23.3% महिलाओं की शादी 18 साल से पहले कर दी गई थी। इस सर्वे के मुताबिक असम में 15 से 19 साल की उम्र की करीब 12 प्रतिशत लड़कियां ऐसी थीं, जो या तो गर्भवती थीं या फिर मां बन चुकी थीं।

बाल विवाह पर यूनिसेफ की रिपोर्ट

यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की हर तीन 'बालिका वधुओं' में से एक भारत में रहती हैं। देश की 22.3 करोड़ 'बाल वधुओं' में से 10.2 करोड़ की शादी 15 साल की उम्र से पहले हो गई थी। यूनिसेफ की रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि भारत में 20 से 24 साल की 27% लड़कियां ऐसी हैं, जिनकी शादी 18 साल की उम्र से पहले ही हो गई थी। वहीं पाकिस्तान में ऐसी 21% लड़कियां हैं। जबकि भूटान में 26% और श्रीलंका में 10% लड़कियां ऐसी थीं। वहीं भारत से आगे बांग्लादेश 59%, नेपाल 40% और अफगानिस्तान 35% था।

क्या यह 'एंटी-मुस्लिम' हैं?

असम सरकार द्वारा बाल विवाह रोकने के अभियान को विपक्षी राजनीतिक दलों द्वारा एंटी-मुस्लिम बताया जा रहा है। जबकि सच ये है कि असम का बिस्वनाथ जिला जहां की 80 प्रतिशत आबादी हिंदू है। वहां सबसे ज्यादा गिरफ्तारियां हुईं हैं। हालांकि, ये बात भी सच है कि मुस्लिम बहुल जिलों में बाल विवाह के मामले ज्यादा सामने आये हैं। एनएफएचएस (NFHS-5) के आंकड़ों के अनुसार मुस्लिम बहुल धुबरी जिले में 50.8 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 साल की उम्र से पहले हो गई थी।

गौरतलब है कि असम के जिन जिलों में मुस्लिम आबादी 50 प्रतिशत से अधिक है वहां बाल विवाह के सर्वाधिक मामले दर्ज किये गए है। एनएफएचएस-5 के अनुसार धुबरी के बाद दारांग में 42.8 प्रतिशत, नौगांव में 42.6 प्रतिशत, गोलपाड़ा में 41.8 प्रतिशत और बारपेटा में 40.1 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 वर्ष से कम आयु में हो गयी थी। जबकि इन्ही जिलों में सर्वे के दौरान 15 से 19 साल की लड़कियों की मां बनने का प्रतिशत - धुबरी में 22.4, दारांग में 16.1, नौगांव में 15, बारपेटा में 14.2, और गोलपाड़ा में 13.3 हैं।

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    असम के अन्य जिलों में बाल विवाह की बात करें तो मारिगांव में 39.1 प्रतिशत, कोकराझार में 36.2 प्रतिशत, कछर में 29.9 प्रतिशत, नलबाड़ी में 28.1 प्रतिशत, करीमगंज में 27.7 प्रतिशत, और कामरूप में 21.9 प्रतिशत हैं। जबकि इन्ही जिलों में जिलों में सर्वे के दौरान 15 से 19 साल की लड़कियों की मां बनने का प्रतिशत क्रमशः 11.6, 11.3, 8.5, 8.6, 9.9 और 15.7 हैं।

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