कौन हैं Faisal Rathore? PoK में खून-खराबे के बीच चर्चा में आए प्रधानमंत्री, मुनीर से क्या है कनेक्शन?
Faisal Rathore: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में इन दिनों राजनीतिक माहौल बेहद तनावपूर्ण बना हुआ है। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) पर प्रतिबंध, बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन, गिरफ्तारियां और सुरक्षा बलों की कार्रवाई ने पूरे क्षेत्र को सुर्खियों में ला दिया है। हालिया प्रदर्शनों की शुरुआत PoK विधानसभा में शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों को लेकर हुई, जिसके बाद कई शहरों में हड़ताल और प्रदर्शन देखने को मिले। इन घटनाओं के बीच सबसे ज्यादा चर्चा जिस शख्स की हो रही है, वह हैं PoK के प्रधानमंत्री फैसल मुमताज़ राठौर। जानेंगे कौन हैं फैसल राठौर और उनपर क्यों लग रहे हिंसा के आरोप।
राजनीतिक परिवार से ताल्लुक
फैसल मुमताज़ राठौर का जन्म 11 अप्रैल 1978 को रावलपिंडी में हुआ था। उनका परिवार लंबे समय से PoK की राजनीति में प्रभावशाली माना जाता रहा है। उनके पिता राजा मुमताज़ हुसैन राठौर भी PoK के प्रधानमंत्री रह चुके थे, जबकि उनकी मां बेगम फरहत राठौर विधानसभा सदस्य और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) की सक्रिय नेता थीं। राजनीतिक माहौल में पले-बढ़े राठौर ने शुरुआती शिक्षा रावलपिंडी और मुजफ्फराबाद में प्राप्त की। बाद में उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी से स्नातक की पढ़ाई पूरी की।

राजनीति में शुरुआत
फैसल राठौर ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) से की। 2006 के चुनाव में उन्हें सफलता नहीं मिली, लेकिन उन्होंने पार्टी संगठन में सक्रिय भूमिका जारी रखी। 2011 में वह पहली बार विधानसभा सदस्य चुने गए और बाद में बिजली, स्थानीय निकाय तथा ग्रामीण विकास जैसे विभागों की जिम्मेदारी संभाली। इसी दौर में उन्होंने प्रशासनिक अनुभव हासिल किया और PPP नेतृत्व में अपनी पहचान मजबूत की।
PPP में बढ़ता प्रभाव
2010 के दशक के अंत तक फैसल राठौर PPP के प्रमुख नेताओं में शामिल हो चुके थे। 2021 के चुनाव में दोबारा विधानसभा पहुंचे और बाद में स्थानीय सरकार एवं ग्रामीण विकास मंत्री भी बने। पार्टी के भीतर उनका प्रभाव लगातार बढ़ता गया और उन्हें बिलावल भुट्टो जरदारी के करीबी नेताओं में गिना जाने लगा।
प्रधानमंत्री बनने का सफर
नवंबर 2025 में PoK की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी अनवर-उल-हक के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव सफल रहा और विधानसभा में हुए मतदान में फैसल राठौर को 36 वोट मिले। इसके बाद वह PoK के 16वें प्रधानमंत्री चुने गए। उनकी जीत में PPP के साथ-साथ PML-N के समर्थन की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनकी नियुक्ति को कुछ लोगों ने लोकतांत्रिक बदलाव कहा, जबकि आलोचकों ने इसे सत्ता समीकरणों और राजनीतिक समझौतों का परिणाम बताया।
हालिया विवादों के केंद्र में
प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही महीनों बाद राठौर सरकार को बड़े विरोध प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा। JAAC और अन्य संगठनों ने बिजली दरों, आर्थिक समस्याओं, संसाधनों के बंटवारे और विधानसभा की 12 आरक्षित सीटों के मुद्दे पर आंदोलन शुरू किया। हालिया प्रदर्शनों के दौरान कई लोगों की मौत और बड़ी संख्या में गिरफ्तारियों की खबरें सामने आईं। PoK में हुई हिंसा का आरोप भी फैसल राठौर पर लगा। कहा गया कि सेना के इशारे पर उन्होंने PoK में बवाल करवाया है। स्थानीय नेताओं का आरोप है कि सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए सख्त कदम उठाए और राजनीतिक असंतोष को संवाद के बजाय सुरक्षा कार्रवाई से जवाब दिया।
गिलगित-बाल्टिस्तान और PoK को लेकर आलोचना
PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान में लंबे समय से यह शिकायत उठती रही है कि स्थानीय लोगों को पर्याप्त राजनीतिक और आर्थिक अधिकार नहीं मिलते। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और स्थानीय समूहों का कहना है कि संसाधनों, बिजली परियोजनाओं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े कई मुद्दे अब भी अनसुलझे हैं। लोगों का आरोप है कि राठौर सरकार भी इन समस्याओं का स्थायी समाधान निकालने में अब तक सफल नहीं रही। हालांकि सरकार का दावा है कि वह आर्थिक सुधार और प्रशासनिक बदलावों पर काम कर रही है।
सबसे बड़ा आरोप क्या है?
फैसल राठौर पर व्यक्तिगत स्तर पर किसी बड़े भ्रष्टाचार या आपराधिक मामले में सार्वजनिक रूप से दोष सिद्ध न हुआ हो लेकिन ग्रामीण बैंक से लेकर PoK में होने वाले हर काम में उनका कमीशन फिक्स बताया जाता है। स्थानीय नेता बताते हैं कि PoK की राजनीतिक व्यवस्था वास्तव में स्वतंत्र नहीं है और अंतिम फैसलों पर इस्लामाबाद के साथ-साथ आखिरी मुहर पाकिस्तान आर्मी यानी कि आसिम मुनीर की लगती है। इसी वजह से राठौर को अक्सर "मुनीर का शागिर्द" कहकर निशाना बनाया जाता है।
आगे की चुनौतियां
फैसल मुमताज़ राठौर के सामने सबसे बड़ी चुनौती बढ़ते राजनीतिक असंतोष, आर्थिक समस्याओं और जनता के भरोसे को बनाए रखना है। हालिया प्रदर्शनों ने साफ कर दिया है कि PoK में राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संसाधनों के बंटवारे और प्रशासनिक अधिकारों को लेकर बहस अभी खत्म नहीं हुई है। आने वाले सालों में उनकी राजनीतिक विरासत इस बात से तय होगी कि वह इन चुनौतियों का सामना कैसे करते हैं। सवाल ये भी है कि क्या राठौर PoK के लोगों की लंबे समय से चली आ रही शिकायतों का समाधान निकाल पाते हैं या इस्लामाबाद के इशारे पर जनता का खून बहाते रहेंगे।
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