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Saudi Arabia: तेजी से अपने आप को क्यों बदल रहा है सऊदी अरब?

इस महीने की शुरुआत में मलेशिया के क्वालालाम्पुर में मिस एशिया प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था। इस प्रतियोगिता में हालांकि विजेता फिलीपीन्स की डेन शेन मैग आबो रहीं लेकिन उनसे अधिक चर्चा में आयीं रूमी अलखातनी।

Saudi Arabia

रूमी अलखातनी सऊदी अरब की मॉडल हैं और उनका इस प्रतियोगिता में शामिल होना ही सोशल मीडिया के लिए चर्चा का विषय बन गया। अरब न्यूज ने भी इसकी जानकारी देते हुए बताया कि सऊदी अरब से पहली बार कोई औरत इस तरह की प्रतियोगिता में शामिल हुई है।

मिस सऊदी अरब रह चुकी रूमी अलग अलग समय में अब ऐसी प्रतियोगिताओं में सऊदी अरब का प्रतिनिधित्व करने के लिए जाने लगी हैं। मलेशिया से लेकर यूरोप तक। वो सऊदी अरब में महिला सौंदर्य, मेधा, प्रतिभा का प्रतिनिधित्व करने के साथ उस मर्दवादी मानसिकता को भी चुनौती दे रही हैं जो अब तक सऊदी अरब की पहचान रहा है। लेकिन यह सब वो अनायास ही नहीं कर रही हैं। इसके लिए सऊदी अरब के उसी मर्दवादी कबीले ने उन्हें आगे बढाया है जो कल तक किसी महिला के बिना "महरम" के घर से निकलने को भी अपराध मानता था।

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान सऊदी अरब में लगातार ऐसे सामाजिक और प्रशासनिक सुधार कर रहे हैं जो सऊदी अरब की कट्टर इस्लामिक मानसिकता पर ही प्रहार करते हैं। लड़कियों को सौंदर्य प्रतियोगिता में शामिल होने देना बिना इन सुधारों के संभव नहीं था। वर्तमान सऊदी अरब के संस्थापक किंग अब्दुल्ल अजीज इब्न सऊद के पोते मोहम्मद बिन सलमान अल सऊद बीते चार पांच सालों से सऊदी अरब में ऐसे सामाजिक सुधार को बढावा दे रहे हैं ताकि उनका देश बदलती दुनिया के साथ कदमताल कर सके।

इसमें सबसे बुनियादी सुधार महिलाओं को लेकर अब तक रहा सऊदी अरब का नजरिया है। इसके दो कारण हैं। पहला इस्लाम और दूसरा वह नज्द कबीला जिससे इब्न सऊद ताल्लुक रखते थे। सऊदी अरब का नज्द कबीला औरतों को लेकर बहुत कट्टर समझा जाता है। आज दुनियाभर में इस्लाम के नाम महिलाओं को जो काला बुर्का पहनाया जाता है वह इस्लाम का नहीं नज्द कबीले की निशानी है। अरब भूमि के अलग अलग हिस्सों और कबीलों में अलग अलग रंग के अबया और बुर्कों का चलन है। लेकिन जब किंग अब्दुल्ला ने सऊदी अरब का पुनर्गठन करके अपने आपको किंग घोषित किया तब इस्लाम के साथ साथ नज्द कबीले की रिवायतें भी सऊदी अरब की पहचान बन गयीं।

इसलिए उसी आले सऊद परिवार की तीसरी पीढी मोहम्मद बिन सलमान अगर महिलाओं को लेकर सऊदी अरब का नजरिया बदल रहे हैं तो वो इस्लाम से अधिक अपनी उस कबीलाई मानसिकता का त्याग कर रहे हैं जो उनकी पहचान रही है। इस्लाम में महिलाओं को पर्दे में रहने के लिए जरूर कहा गया है लेकिन एक खास रंग का बुर्का पहनने या सिर पर हिजाब बांधने से ही उसे पर्दा कहा जाएगा, ऐसा इस्लाम में कहीं कोई जिक्र नहीं है। काला बुर्का अगर अरब के नज्द कबीले के कारण मुस्लिम महिलाओं की पहचान बना तो हिजाब ईरान में
इस्लामिक राज्य स्थापित करनेवाले अयातोल्ला खोमैनी के कारण चलन में आया।

2017 में जब मोहम्मद बिन सलमान (एमबीएस) को उनके पिता किंग सलमान द्वारा अपना उत्तराधिकारी और क्राउन प्रिंस घोषित किया गया तब से ही एमबीएस ने यह बताने का प्रयास किया कि सऊदी का समाज कट्टर नहीं है। आज सऊदी अरब में जो इस्लामिक कट्टरता दिख रही है वह अयातोल्ला खोमैनी की वजह से है। हालांकि सुनने में यह बात उतनी सीधी नहीं लगती लेकिन ऐसा कहने के पीछे एमबीएस का अपना संकेत होता था। वह यह कि हम इस्लाम से अधिक अपने कबीलाई कल्चर में भरोसा करते हैं। इसलिए इस्लामिक कट्टरता का आरोप उन पर लगाना गलत होगा।

बहरहाल, बीते पांच सालों में एमबीएस ने सऊदी अरब के सामने एक नयी पहचान का प्रस्ताव किया है। वह पहचान अतीत के अरब की नहीं बल्कि भविष्य के यूरोप की है। इसलिए केवल सऊदी अरब की महिला विश्व की सौंदर्य प्रतियोगिताओं में ही हिस्सा नहीं ले रही है बल्कि सौंदर्य सामग्री के व्यापार को बढावा देने के लिए ब्यूटीवर्ल्ड सऊदी अरबिया का आयोजन करने लगा है। इस साल फरवरी महीने में यह आयोजन हो चुका है और अगले साल अप्रैल में आयोजन की घोषणा की जा चुकी है।

सिर्फ महिलाओं को ड्राइविंग का अधिकार देने, उन्हें सौंदर्य प्रतियोगिता में बिना हिजाब के शामिल होने या फिर अकेले घर से बाहर आने जाने की अनुमति ही वो सामाजिक सुधार नहीं है, जो सऊदी अरब में हो रहे हैं। सच्चे इस्लाम का प्रचार करने का दावा करनेवाली तब्लीगी जमात पर सऊदी अरब प्रतिबंध लगा चुका है। इन सामाजिक और धार्मिक सुधारों को जारी रखते हुए मस्जिदों में बच्चों के साथ प्रवेश, ऊंची आवाज वाले लाउडस्पीकर पर रोक, मस्जिदों में होनेवालों खुतबों को भी नियंत्रित कर दिया है।

अब सऊदी अरब में रमजान के महीने में मस्जिदों में इफ्तार का आयोजन नहीं होगा। मस्जिदों के इमामों द्वारा इसी महीने में सबसे अधिक जकात इकट्ठा किया जाता है। सऊदी अरब ने इस पर भी रोक लगा दी है। इमामों को सऊदी के इस्लामिक मंत्रालय द्वारा सलाह दी गयी है कि रमजान के दौरान वो लंबी तकरीर न दें और सिर्फ "लाभकारी" बातें ही मुसलमानों को बतायें जिससे उनका जीवन बेहतर हो सके। सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने हाल में ही कहा है कि कट्टरता को खत्म करने के लिए वो लंबे समय तक इंतजार नहीं कर सकते। हमें आज ही उसको खत्म करने के लिए काम करना होगा।

एक ओर सऊदी अरब इस्लामिक और कबीलाई कट्टरता को सीमित कर रहा है तो दूसरी ओर सऊदी अरब में पर्यटन को बढावा देने के लिए जमकर प्रचार प्रसार भी कर रहा है। यूएई को देखकर सऊदी अरब के शासकों को समझ में आने लगा है कि अपने मुताबिक दुनिया को बदलने की बजाय दुनिया के मुताबिक अपने आप को बदलने में ही समझदारी है। इसलिए रियाद में संसार का द मुकाब प्रोजेक्ट हो या सबसे लंबी दीवारों के द नियोम नामक शहर बसाने का प्रोजेक्ट। सऊदी अरब दुनिया के गैर मुस्लिमों के लिए अपने दरवाजे खोलना चाहता है। वह चाहता है कि तेल और गैस की अर्थव्यवस्था खत्म होते होते वह दुनिया के लिए एक टूरिस्ट हब बनकर उभरे जैसे आज दुबई बन चुका है।

इसलिए अपने प्रचार अभियान में वह मक्का मदीना की बजाय 'आभा' को प्रचारित कर रहा है जो सऊदी अरब का एकमात्र सर्वाधिक हरा भरा राज्य है। यह कहते हुए कि सऊदी अरब का अर्थ रेगिस्तान ही नहीं होता। एमबीएस समझते हैं कि अगर सऊदी अरब की ओर गैर मुस्लिमों को आकर्षित करना है तो उसे अपनी इस्लामिक कट्टरता वाली छवि खत्म करना होगा। इसलिए वह अपने आप को तेजी से बदल रहा है। भले ही दुनिया के कुछ हिस्से में रहनेवाले मुसलमानों को यह पसंद आये या न आये, सऊदी अरब बदलाव की दिशा में तेजी से आगे बढ़ चुका है।

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