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Rahul Gandhi on China: क्यों देते हैं राहुल गांधी देश की सेना और जनता का मनोबल तोड़ने वाले बयान?

अगर राहुल गांधी के पास चीन के बारे में भारतीय सेना और गुप्तचर एजेंसियों से ज्यादा जानकारियां हैं, तो उन्हें प्रधानमंत्री को यह सब बताना चाहिए। नहीं तो, संसद की कार्यवाही में शामिल होकर वहां अपनी जानकारी साझा करनी चाहिए।

Why does Rahul Gandhi give statements that break the morale of the countrys army and people

राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के सौ दिन पूरे हो चुके हैं। जयपुर में सौ दिन का जश्न ऐसे मनाया गया जैसे फ़िल्मी दुनिया में किसी फिल्म के हिट होने पर प्रोड्यूसर पार्टी देता है। राहुल गांधी दौसा से हेलीकाप्टर द्वारा जयपुर गए, वहां पहले प्रेस कांफ्रेंस हुई, फिर शाम को जश्न मनाया गया, जिसमें खूब गाना बजाना हुआ।इतना जश्न तो हिमाचल प्रदेश की जीत पर भी नहीं मनाया गया था। लेकिन ऐसा हो नहीं सकता कि राहुल गांधी मुहं खोलें और कोई विवाद खड़ा न हो। वह कोई विवादास्पद बात न भी कहें, तब भी भाजपा वाले कुछ न कुछ ढूंढ ही लेते हैं।

अब राहुल को क्या जरूरत थी कि चीन के बारे में बयान देते। जब उन्हें पता है कि नेहरू से लेकर खुद उन्होंने चीन पर इतनी गलतियां कर रखी हैं कि जैसे ही वह मोदी पर एक उंगली उठाते हैं, तीन उंगलियाँ खुद उनकी तरफ उठ रही होती हैं। 13 दिसंबर को जब कांग्रेस ने संसद में तवांग में की घटना पर हंगामा किया था, उस दिन अमित शाह ने चीन पर नेहरू से लेकर खुद राहुल गांधी को कटघरे में खड़ा कर दिया था।उन्होंने राहुल गांधी के शी जिंगपिंग के साथ हुए गुप्त समझौते और चीनी दूतावास से 1 करोड़ 35 लाख रूपए लेने का सवाल उठा कर कांग्रेस को घेरा था।

इसके बावजूद राहुल गांधी ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में चीन को लेकर सवाल उठा दिया। जबकि वह आज भी देश को बता नहीं रहे कि उन्होंने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ किस गुप्त समझौते पर दस्तखत किए थे।अगर चीन के बारे में उन्हें भारतीय सेना और गुप्तचर एजेंसियों से ज्यादा कुछ जानकारियां हैं, तो उन्हें प्रधानमंत्री से समय लेकर उन्हें बताना चाहिए।नहीं, तो अच्छा होता कि चीन के बारे में वह अपनी चिंता 26 दिसंबर को लोकसभा में जाकर व्यक्त करते, जिस दिन वह दिल्ली में होंगे और संसद का शीत सत्र उस दिन चल रहा होगा।

मैं यह नहीं कहता कि चीन की ओर से की जा रही युद्ध की तैयारियों के बारे में उनका सरकार को सावधान करना गलत है।लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और पड़ोसी देशों से हमले की आशंका जैसी गंभीर बातें राजनीतिक मुद्दा नहीं बननी चाहिए। उन्होंने खुद कुछ ऐसे काम कर रखे हैं कि चीन पर कही गई उनकी कोई भी बात उनकी नियत पर शक जाहिर करती है।पिछली बार जब चीन ने भूटान सीमा पर डोकलाम में निर्माण की कोशिश की थी, भारतीय सेना ने चीनी सेना को वहां से वापस हटने को मजबूर कर दिया था, तवांग में भी यही हुआ, फिर कैसे कहा जा सकता है कि चीन की सैन्य तैयारियां हमसे ज्यादा हैं।

Why does Rahul Gandhi give statements that break the morale of the countrys army and people

बीच बीच में कुछ खबरें छपती रहती हैं कि चीन लद्दाख में घुस गया, चीन अरुणाचल में घुस गया। अभी ताज़ा खबर फिर छपी है कि चीन ने डोकलाम में फिर से निर्माण शुरू कर दिया है। जिसका 16 दिसंबर को राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेंस के बाद पूर्वी सैन्य कमांड के चीफ लेफ्टिनेंट जनरल कलिता ने खंडन किया है। इन्हीं झूठी खबरों के आधार पर राहुल गांधी सार्वजनिक बयानबाजी करते हैं।

राहुल गांधी का वाक्य था कि भारत के सैनिक पीटे जा रहे हैं, चीन युद्ध की तैयारी कर रहा है और भारत सरकार सो रही है, वह हमारी बात सुनने को तैयार नहीं। सरकार सीमा पर हो रही घटनाओं को छिपा रही है।यह वाक्य पूरी तरह तथ्यों के विपरीत और गैरजिम्मेदाराना है। भारतीय सैनिकों ने तवांग में चीनी सैनिकों को पीट पीट कर भगाया है, न कि भारतीय सैनिक पिटे हैं। उनका यह वाक्य भारत की सेना और जनता का मनोबल तोड़ने वाला है कि हमारे सैनिक पिट रहे हैं।

जहां तक चीन की युद्ध की तैयारी का सवाल है तो क्या भारतीय सेना और खुफिया एजेंसियां आंख मूंद कर बैठी हैं, क्या कोई भी सरकार अपनी सीमाओं के प्रति आँख मूँद कर बैठी होती है।उनकी यह टिप्पणी मोदी सरकार पर की गई राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि सेना की क्षमता पर संगीन आरोप है।

ठीक इसी तरह की बात तीन दिन पहले कांग्रेस के सांसद मनीष तिवारी ने की थी, जब उन्होंने कहा था कि सीमा पर पर्याप्त सेना मौजूद नहीं थी। क्या यह टिप्पणी सरकार पर है? नहीं, यह टिप्पणी सेना पर है। कांग्रेस बार बार भारतीय सेनाओं पर टिप्पणी क्यों कर रही है?

जहां तक सैन्य तैयारियों की बात है तो सारा देश अच्छी तरह जानता है कि नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से सीमा के बुनियादी ढांचे पर खर्च में तीन गुना वृद्धि हुई है। देश अब अपनी सीमाओं और सीमान्त क्षेत्र की मजबूती से रक्षा कर रहा है।कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में रक्षामंत्री ए।के। एंटनी ने तो राज्यसभा में यह कह दिया था कि सीमाओं के पास बुनियादी ढांचा बढ़ाना घाटे का सौदा हो सकता है।

जहां तक छोटी मोटी झड़पों का सवाल है, तो वह पहले भी होती रही हैं और अब भी हो रही हैं। इसकी वजह भी सब जानते हैं कि चीन अरुणाचल प्रदेश के लगभग 90 हजार वर्ग किलोमीटर को अपना मानता है। उसका कहना है कि वह तिब्बत का हिस्सा था, लद्दाख से लेकर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड से होते हुए अरुणाचल प्रदेश तक भारत की सीमा तिब्बत से लगती थी, जिस पर चीन ने 1951 में कब्जा कर लिया था।

1962 के युद्ध के समय चीन ने जम्मू कश्मीर के लद्दाख का 37,242 वर्ग किलोमीटर हथिया लिया था, उस युद्ध में भी उसका तर्क था कि वह तिब्बत का हिस्सा था। बाद में तिब्बत पर चीन के अधिकार को मानते हुए पाकिस्तान ने अपने कब्जे वाले कश्मीर का 5,180 वर्ग किलोमीटर चीन को सौंप दिया। क्या ये सब राहुल गांधी के पूर्वज जवाहर लाल नेहरू की गलतियों से नहीं हुआ था। नेहरू ने संसद में यहाँ तक कह दिया था कि अक्साई चिन की क्या चिंता करनी, वहां तो घास का एक तिनका तक नहीं उगता।

भाजपा के सांसद और भारतीय सेना के पूर्व कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने राहुल गांधी के बयान पर शायद ठीक ही टिप्पणी की है, जब उन्होंने कहा कि "यह उनके परदादा नेहरू का भारत नहीं है, जो सोते रहे और चीन से 37,242 वर्ग किमी हार गए।चीन के हाथों जमीन गंवाने के बाद अब उन्हें लगता है कि चीन के साथ निकटता होनी चाहिए, और उन्होंने चीन के साथ इतनी निकटता विकसित कर ली है कि उन्हें पता रहता है कि चीन अब क्या करेगा"।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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