Opposition Unity: विपक्षी एकता हेतु कांग्रेस की बदली रणनीति भी काम नहीं आ रही
सवाल उठता है कि 2024 में विपक्ष का मोर्चा बनेगा कैसे? कांग्रेस के साथ दिक्कत है कि राहुल को विपक्ष का नेता बनाने पर जोर देने पर कई दल बिदक जाते हैं।

Opposition Unity: पहली मार्च को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन का जन्मदिन था| उनके जन्मदिन के मौके पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राजद अध्यक्ष तेजस्वी यादव, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, नेशनल कांफ्रेंस के फारुख अब्दुल्ला पहुंचे थे| इस मौके पर स्टालिन ने साफ़ किया कि उन्होंने सभी को जन्मदिन पर नहीं बुलाया, बल्कि इस मौके को विपक्षी एकता के लिए इस्तेमाल करने के लिए बुलाया है| हालांकि उन्होंने यह तो नहीं कहा कि कांग्रेस के बिना विपक्षी एकता असंभव है, लेकिन उन्होने कहा कि तीसरे मोर्चे का विचार बेमानी है| इसका मतलब यही निकलता है कि कांग्रेस के नेतृत्व में ही विपक्षी एकता के मायने हैं|

हम सब जानते हैं कि कांग्रेस ने राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा उन्हें री-लांच करने और विपक्षी दलों को उनका नेतृत्व स्वीकार करवाने के लिए करवाई थी| अब उनका नेतृत्व स्वीकार करवाने के लिए कांग्रेस की तरफ से स्टालिन बैटिंग कर रहे हैं| लेकिन इस मौके पर भाजपा को सत्ता से बाहर करने की कोशिश में जुटे नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल और के. चन्द्रशेखर राव नहीं पहुंचे| क्या कोई सोच सकता है कि इनके बिना विपक्षी एकता संभव है|
स्टालिन इस बात को बखूबी जानते हैं, इसलिए उन्होंने इस मौके पर भाजपा विरोधी सभी राजनीतिक दलों से विनम्रता पूर्वक सरल चुनावी गणित को समझने का अनुरोध करते हुए एकजुट होने की अपील की| कांग्रेस की तरफ से उनका यह संदेश नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, के. चन्द्रशेखर राव और केजरीवाल को था| इसकी पुष्टि करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि उन्होंने यह कभी नहीं कहा कि कौन प्रधानमंत्री बनेगा या कौन नेतृत्व करेगा, यह सवाल है ही नहीं, कांग्रेस तो यही चाहती है कि सबको साथ मिलकर लड़ना चाहिए|
यह कांग्रेस की बदली हुई रणनीति है, कांग्रेस ने रायपुर अधिवेशन में अपने प्रस्ताव में विपक्ष की अगुवाई की बात छोड़कर सभी समान विचारधारा वाले दलों को साथ लाने की बात कही है| उन्हें लगता है शायद इससे बात बन जाए| इसलिए कांग्रेस ने यह बात स्टालिन और फारूख अब्दुल्ला से कहलवाई| मल्लिकार्जुन खड़गे के स्पष्टीकरण के बाद फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि हमें मिलकर चुनाव लड़ना चाहिए| यह बाद में तय कर लेंगे कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा| कुल मिलाकर तीसरे मोर्चे की कवायद कर रहे विपक्षी नेताओं को हतोत्साहित करने के लिए स्टालिन के जन्मदिन का इस्तेमाल किया गया| लेकिन जो विपक्षी नेता इस कार्यक्रम में नहीं आए थे, उनको तो छोडिए, वहां मौजूद अखिलेश यादव ही कह चुके हैं कि वह कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करेंगे|
पहली मार्च की विपक्षी एकता की इस कवायद के अगले ही दिन दो मार्च को आए तीन विधानसभाओं और विभिन्न राज्यों के उपचुनावों के नतीजों ने सारी कवायद पर पानी फेर दिया| पश्चिम बंगाल के सागरदिघि उपचुनाव में हारने के बाद तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन करने से सार्वजनिक तौर पर इनकार कर दिया| उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस अकेले ही चुनाव लड़ेगी|
सागरदिघि उपचुनाव में हार के कारण ममता का गुस्सा होना लाजमी था| क्योंकि इस मुस्लिम और आदिवासी बहुल सीट पर 51 साल बाद कांग्रेस जीती है, ममता को शक है कि कांग्रेस ने उन्हें हराने के लिए भाजपा से हाथ मिला लिया था, इसलिए हिन्दू वोट कांग्रेस को मिले| इस चुनाव नतीजे से तमतमाई ममता बनर्जी ने एलान कर दिया है कि आने वाले लोकसभा चुनाव अकेले लड़ेगी| हालांकि ममता सागरदिघी में हार से बेहद खफा हैं, लेकिन खुद ममता ने मेघालय में काग्रेस के साथ ऐसा ही किया है, जहां उन्होंने कांग्रेस को बेहद कमजोर कर दिया| पिछली बार कांग्रेस 21 सीटें जीतीं थीं, लेकिन इस बार ममता के सामने आ कर डट जाने से कांग्रेस 5 सीटों पर ही सिमट गई|
दरअसल कांग्रेस के सहयोगी दलों को लगता था कि कांग्रेस की सभी समान विचारधारा वाले दलों के इकट्ठा होने की अपील पर ममता बनर्जी सकारात्मक प्रतिक्रिया देंगी, लेकिन उन्होंने नकारात्मक प्रतिक्रिया दी है| आने वाले समय में क्या होगा, अभी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि राजनीति तो पल पल रंग बदलती है। हमने राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव में भी यह देख लिया था।
राष्ट्रपति के चुनाव में ममता खुद विपक्षी एकता करवा रही थी, लेकिन उपराष्ट्रपति के चुनाव में उन्होंने विपक्ष के उम्मीदवार को समर्थन नहीं दिया था| इसलिए यह पक्का नहीं माना जाना चाहिए कि ममता अपने आज के स्टैंड पर आखिर तक कायम रहेगी| वैसे पिछले कुछ वर्षों में विपक्ष को साथ लाने की कोशिश ममता बनर्जी करती रही थी। कभी वो सोनिया गांधी से भी मिलती थी, कभी शरद पवार से तो कभी अखिलेश यादव से, मुलाकातों का यह सिलसिला उपराष्ट्रपति के चुनाव के बाद से बंद है|
राष्ट्रपति चुनाव में वह शरद पवार को उम्मीदवार बनाना चाहती थी, उनके इंकार करने के बाद से वह उनसे भी नाराज़ हैं| वह कोशिश कर रही थीं कि गैर कांग्रेस गैर कम्युनिस्ट गठबंधन बने, लेकिन उसमें वह पूरी तरफ असफल हो गई| बिहार में नीतिश, तेजस्वी और कांग्रेस के साथ आने से वह नीतिश और तेजस्वी से भी खफा हैं|
तेलंगाना के मुख्यमंत्री भी ममता बनर्जी की तरह गैर भाजपा, गैर कांग्रेस गठबंधन की बात करते हैं| जबकि बिहार, झारखंड, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री कांग्रेस के साथ हैं और महाराष्ट्र का महाविकास आघाडी यानि शरद पवार और उद्धव ठाकरे भी कांग्रेस के साथ हैं| महाराष्ट्र के उपचुनाव में कांग्रेस ने भाजपा से एक सीट छीन ली है| भाजपा वहां 27 साल बाद हारी है, तो इससे महाविकास आघाडी का लोकसभा चुनाव में करिश्मा बनता दिख रहा है|
ऐसे में सवाल उठता है कि 2024 में विपक्ष का मोर्चा बनेगा कैसे? कांग्रेस के साथ दिक्कत है कि राहुल को विपक्ष का नेता बनाने पर जोर देने पर कई दल बिदक जाते हैं| यही वजह है कि कांग्रेस ने रायपुर अधिवेशन में अपने प्रस्ताव में विपक्ष की अगुवाई की बात छोड़कर सभी समान विचारधारा वाले दलों को साथ लाने की बात कही है| उन्हें लगता है शायद इससे बात बन जायेगी, लेकिन यह बात बनती नहीं दिखती| केजरीवाल, के. चन्द्रशेखर राव, ममता बनर्जी को तो छोडिए अखिलेश यादव भी कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन को तैयार नही दिखते, उनका कहना है कि कांग्रेस अपने वोट ट्रांसफर नहीं करवा पाती| यानी भानुमती के कुनबे को इकट्ठा करना इतना आसान नहीं है| या यह कहें कि मेढकों को एक बाल्टी में डालना आसान नहीं है, कोई इधर फुदक रहा है, तो कोई उधर फुदक रहा है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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