NE Election Results: पूर्वोतर में कांग्रेस को नहीं मिला राहुल की यात्रा का फायदा
त्रिपुरा, मेघालय और नागालैंड में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा एवं सहयोगी दलों के सत्ताधारी गठबंधन की सत्ता में जोरदार वापसी से कांग्रेस एवं वाम दलों की उम्मीदों को गहरा झटका लगा है।

पूर्वोतर के तीनों राज्यों में दुबारा भाजपा और भाजपा समर्थक दलों की सरकार बन रही है। कांग्रेस को राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा का कोई राजनीतिक फायदा नहीं मिला। वह मेघालय में 21 सीटों से घट कर पांच पर आ गई, नगालैंड में उसका खाता ही नहीं खुला। त्रिपुरा में जरुर कम्युनिस्टों की मदद से तीन सीटें जीत गई, जबकि पिछली बार उसका खाता ही नहीं खुला था।
त्रिपुरा में फिर से भाजपा को अपने बूते पर बहुमत मिल गया। नगालैंड और मेघालय में भाजपा की सीटें तो नहीं बढीं, लेकिन भाजपा के सहयोगियों की सीटों में जोरदार इजाफा हुआ। इस तरह भारत जोड़ो यात्रा के बाद भाजपा ने कांग्रेस को पहली मात दे दी है।

त्रिपुरा में उम्मीद के मुताबिक़ ही टिपरा मोथा पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी से ज्यादा उसकी सहयोगी आईपीएफटी को भारी नुकसान पहुंचाया है। भाजपा को 36 की बजाए 32 सीटें मिलीं, लेकिन उसकी सहयोगी आईपीएफटी की सात सीटें घट गई, वह आठ सीटों से एक पर आ गई। टिपरा मोथा पार्टी हालांकि पहली बार चुनाव लड़कर 13 सीटें ले गई, लेकिन वह किंग मेकर नहीं बन पाई, जैसी कि चुनावों के दौरान भविष्यवाणी की जा रही थी।
अगर आख़िरी चुनाव रैली में टिपरा मोथा के अध्यक्ष प्रद्योत देब बर्मन हथियार न डालते तो वह भाजपा को ज्यादा नुकसान पहुंचाते और टिपरा मोथा किंग मेकर की भूमिका में जरुर होती। प्रद्योत ने यह कह कर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली थी कि चुनावों के बाद वह राजनीति छोड़ देंगे। सवाल यह खड़ा हुआ था कि उन्होंने आख़िरी रैली में ऐसा क्यों कहा, क्योंकि अपनी ही पार्टी को नुकसान और भाजपा को फायदा पहुँचाने वाला बयान दिया।
कहते हैं राजनीति में अपना कोई भी कदम सामने वाले से प्रभावित हो कर नहीं उठाना चाहिए। प्रद्योत से यही गलती हो गई थी। उस समय दो बातें हुई थीं। माकपा ने यह अफवाह फैला दी थी कि चुनावों के बाद टिपरा मोथा पार्टी कांग्रेस-माकपा गठबंधन की सरकार को समर्थन देगी। माकपा के नेताओं ने यहाँ तक कह दिया था कि उनका टिपरा मोथा के साथ गुप्त गठबंधन है।
प्रद्योत ने इसका खंडन नहीं किया, जिस पर उन्हीं की पार्टी के अनेक नेताओं को संदेह हो गया। संदेह का कारण यह भी था कि भाजपा से गठबंधन की बात टूट जाने के बाद प्रद्योत खुलेआम कह रहे थे कि वह भाजपा को सत्ता से बाहर करेंगे। इसका असर यह हुआ कि टिपरा मोथा के भीतर ही विद्रोह हो गया और कई बड़े नेता भाजपा के साथ जा मिले।
नरेंद्र मोदी की आख़िरी चुनाव रैली के समय 13 फरवरी को कई आदिवासी नेताओं ने उनसे मिलकर उनके नेतृत्व में आस्था प्रकट की। चुनाव के दौरान ही लगे इस झटके से प्रद्योत देब बर्मन का दिल टूट गया और उन्होंने आख़िरी चुनावी सभा में राजनीति छोड़ने का एलान कर दिया। यह एक तरह से आख़िरी दिन हथियार डालना था, इसी ने उनका गणित बिगाड़ दिया। टिपरा मोथा 18-20 सीटें जीतने की स्थिति में आ गई थी, लेकिन आख़िरी वक्त की गलती ने उसे 13 सीटों पर पहुंचा दिया।
वामपंथियों ने पहली बार कांग्रेस के साथ मिल कर चुनाव लड़ा था, लेकिन उन्हें फायदे की बजाए नुकसान हुआ। पिछली बार वामपंथी 16 सीटें जीते थे, जबकि इस बार 11 पर अटक गए, जबकि पिछली बार एक भी सीट न जीतने वाले कांग्रेस तीन सीटें जीत गई। गठबंधन का कांग्रेस को फायदा और वामपंथियों को नुकसान हुआ।
मेघालय में तृणमूल की कोशिश नाकाम
मेघालय में सबसे बड़ा झटका कांग्रेस को लगा है। पिछले चुनाव में वह 21 सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन जब सरकार नहीं बन पाई तो कांग्रेस हाईकमान की बेरूखी के चलते कांग्रेस के सभी विधायक मुकुल संगमा की रहनुमाई में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए थे। हालांकि उनमें से कुछ बाद में भाजपा और एनपीपी में भी शामिल हुए, लेकिन कांग्रेस शून्य पर आ गई थी।
चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी ने तृणमूल पर हमलावर रूख अपनाते हुए कहा था कि वह मेघालय और त्रिपुरा में कांग्रेस को नुकसान पहुँचाने और भाजपा को फायदा पहुँचाने के लिए चुनाव लड़ रही है। चुनाव नतीजों में कांग्रेस को तो नुकसान पहुंचा ही, वह 21 से घट कर सिर्फ 5 सीटों पर आ गई, लेकिन तृणमूल कांग्रेस भी कोई अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई। उसे सिर्फ 5 सीटें मिली, हालांकि ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी ने खुद कमान संभाली हुई थी और पैसा भी पानी की तरह बहाया गया था।
अभिषेक बनर्जी कोशिश कर रहे हैं कि तृणमूल कांग्रेस को कोनराड संगमा की सरकार में शामिल कर लिया जाए, लेकिन ऐसी संभावना इसलिए नहीं है क्योंकि संगमा विपक्षी खेमे में शामिल होने का जोखिम नहीं उठाना चाहते, इसलिए उन्होंने पहले ही अमित शाह को फोन करके समर्थन मांग लिया है। उन्हें पता है कि जिस तरह भाजपा ने पिछली बार पांच साल उनकी सरकार चलवाई, उसी तरह अगले पांच साल वह भाजपा के साथ ज्यादा सुरक्षित रहेंगे।
पिछले विधानसभा चुनाव में 20 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर आई कोनराड संगमा को भाजपा ने छोटे दलों से समर्थन दिलाकर सरकार बनवाई थी। भाजपा की रणनीति से बनी एनपीपी की सरकार पूरे पांच साल चली, लेकिन चुनाव के समय मुख्यमंत्री कोनराड संगमा ने गठबंधन सरकार के किसी भी घटक से मिल कर चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया था। गठबंधन सरकार के सभी दल अलग अलग लड़े।
अब यह तो पता नहीं कि पर्दे के पीछे कोई रणनीति थी या नहीं, लेकिन पिछली सरकार के सभी घटक दलों को अलग अलग चुनाव लड़ने का फायदा हुआ। कोनराड संगमा की पार्टी एनपीपी 20 से बढ़कर 26 सीटें ले गई, यूडीपी 6 से बढ़कर 11 सीटें ले गईं, लेकिन भाजपा को कोई फायदा नहीं हुआ, वह पिछली बार की तरह दो सीटों पर ही रह गई। एचएसपीडीपी भी दो सीटों पर ही रही, पीडीएफ को नुकसान हुआ, वह चार से घटकर 2 पर आ गई।
शाम पांच बजे जब साफ़ हो गया था कि गठबंधन सरकार ही बनेगी, तो कोनराड संगमा ने पहले असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व सरमा को फोन करके और बाद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को फोन कर समर्थन और आशीर्वाद माँगा। उनकी सरकार बनाने की जिम्मेदारी पिछली बार की तरह ही असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व सरमा ने ले ली है। उन्होंने ही संगमा की ओर से अमित शाह को फोन किए जाने की जानकारी दी। इसके बाद उन्होंने एक और ट्विट करके बताया कि भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने मेघालय ईकाई को बता दिया है कि कोनराड संगमा की सरकार बनवाएं।
नागालैंड में जोरदार वापसी
नगालैंड में भाजपा गठबंधन पहले से ज्यादा बहुमत के साथ सत्ता में लौटा है। भाजपा की सीटें भले ही 2018 की तरह 12 ही रही, लेकिन उसके सहयोगी दल एनडीपी की सीटें भी 18 से बढ़कर 26 हो गई है। पिछली बार की तरह इस बार भी एनडीपी ने 40 और भाजपा ने 20 सीटों पर चुनाव लड़ा था। बाद में 26 सीटें जीतने वाला नगा पीपल्स फ्रंट भी गठबंधन सरकार में शामिल हो गया था, जिससे नगालैंड विपक्ष विहीन हो गया था।
पिछली बार 26 सीटें जीतने वाले नगा पीपल्स फ्रंट को बड़ा झटका लगा है, उसके सिर्फ 2 उम्मीदवार ही जीत पाए हैं। मेघालय में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी कोनराड संगमा की पार्टी एनपीपी को भी नगालैंड में चार सीटें मिली हैं। अगर मेघालय में संगमा भाजपा के साथ मिल कर फिर से सरकार बनाते हैं, जिसकी प्रबल संभावना है, तो नगालैंड में भी एनपीपी सरकार में शामिल हो सकती है।
आश्चर्यजनक ढंग से एनपीपी की पैरेंट पार्टी एनसीपी (शरद पवार से अलग होकर पूर्णो संगमा ने नेशनलिस्ट पीपल्स पार्टी बना ली थी) नगालैंड में सात विधानसभा सीटें जीत गई है, जबकि पिछली बार उसका खाता भी नहीं खुला था।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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