Ram Van Gaman: कब पूरी होगी अधर में लटकी राम वनगमन पथ परियोजना?

भारत में मंदिरों के कारण बहुसंख्यक समाज की आस्था राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से देश को प्रभावित करती है। यही कारण है कि सामाजिक एकता के साथ ही भारत के आर्थिक तंत्र को भी मजबूती देने का एक बड़ा माध्यम राम मंदिर बनने जा रहा है।

कंफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स ने अनुमान लगाया है कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण से पूरे भारत में कम से कम 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का व्यापार आने का अनुमान है। इसमें से 20 हजार करोड़ रुपये का व्यापार दिल्ली में हो सकता है। राममय होते देश में अब राम वन गमन पथ परियोजना की चर्चा भी प्रारंभ हो गई है।

When will the pending Ram Vanagaman Path project be completed

दरअसल, यह वह मार्ग है जिस पर अयोध्या से श्रीलंका तक राम, लक्ष्मण और जानकी वनवास के समय चले थे। 2015 में केंद्र सरकार ने रामायण सर्किट नाम से एक परियोजना बनाकर भगवान राम से जुड़े 21 स्थानों को पर्यटन के एक कॉरिडोर से जोड़ने और तीर्थों के विकास की योजना बनाई थी। राम से जुड़े जिन ऐतिहासिक स्थलों की पहचान की गई उनमें उत्तर प्रदेश में पांच, मध्य प्रदेश में तीन, छत्तीसगढ़ में दो, महाराष्ट्र में तीन, आंध्र प्रदेश में दो, केरल में एक, कर्नाटक में एक, तमिलनाडु में दो और श्रीलंका में एक स्थान शामिल था। जिन तीर्थों की पहचान की गई थी उनकी संख्या 248 थी।

केंद्र सरकार ने परियोजना के लिए 13 हजार करोड़ रुपए आवंटित किए थे। यदि केंद्र की यह परियोजना साकार होती है तो भारत में न केवल पर्यटन को बल्कि आर्थिक तंत्र को भी मजबूती मिलेगी। वर्तमान में कई राज्यों में रामायण सर्किट और राम वन गमन परियोजना से जुड़े विकास कार्य चल रहे हैं किंतु निर्माण स्थिति अधिक संतोषजनक नहीं है। कहीं परियोजना राजनीति का शिकार हुई तो कहीं सरकारी बाबुओं ने फाइल दबा ली।

राम वन गमन परियोजना के अंतर्गत उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार ने केंद्र सरकार की सहायता से नया नेशनल हाईवे बनाकर अयोध्या को चित्रकूट से जोड़ने का काम शुरू किया है। यह वही सड़क होगी जहां से होते हुए राम ने अयोध्या से चित्रकूट के लिए प्रस्थान किया था।

210 किलोमीटर लंबा यह राम वन गमन मार्ग अयोध्या, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, जेठवारा, श्रृंगवेरपुर, मंझनपुर और राजापुर के माध्यम से अयोध्या को चित्रकूट से जोड़ता है। वहीं राज्य सरकार द्वारा चित्रकूट के कामदगिरी पर्वत और मंदिर पर भी सुविधाओं का विकास किया गया है। इसके साथ ही प्रदेश सरकार द्वारा पर्यटन सुविधाओं को बढ़ाते हुए अयोध्या से चित्रकूट के बीच के तीर्थों को विकसित किया जा रहा है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने भगवान राम के जनकपुर जाने और वहां से माता सीता को लेकर आने के मार्ग को रामायण सर्किट और स्वदेश दर्शन योजना के तहत विकसित करने का खाका तैयार किया है। लेकिन चित्रकूट के बाद जहां से मध्य प्रदेश की सीमा शुरु होती है वहां यह परियोजना अधर में लटकी हुई है।

2007 में पहली बार मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राम वन गमन पथ के निर्माण का ऐलान किया और इस परियोजना को आध्यात्म एवं आनंद विभाग के अंतर्गत सौंप दिया। शिवराज सिंह स्वयं इस विभाग के मुखिया थे। 2008 में संस्कृति मंत्रालय ने पहली बार बैठक लेते हुए विद्वानों की समिति का गठन कर शोध कार्य करने का खाका तैयार किया किंतु सरकार की उदासीनता के चलते अगले 7 वर्षों तक परियोजना फाइलों में दबी रही।

2015 में केंद्र सरकार ने रामायण सर्किट का ऐलान किया तो तत्कालीन शिवराज सरकार ने प्रदेश की राम वन गमन परियोजना को रामायण सर्किट में शामिल करा लिया ताकि परियोजना की 40 प्रतिशत राशि केंद्र सरकार से प्राप्त हो सके। इसके बाद राम वन गमन परियोजना को केंद्र की रामायण सर्किट योजना में मर्ज कर संस्कृति मंत्रालय को सौंप दिया गया। 2018 में कमलनाथ सरकार ने परियोजना को धर्मस्व विभाग को सौंपते हुए 22 करोड़ रुपये स्वीकृत करते हुए 600 करोड़ रुपये की योजना का खाका तैयार किया किंतु काम आगे बढ़ता, इससे पहले ही कमलनाथ सरकार गिर गई।

2020 में शिवराज सिंह ने मुख्यमंत्री बनने के पश्चात परियोजना को पुनः संस्कृति मंत्रालय को सौंप दिया और 2023 के विधानसभा चुनाव से पूर्व राम पथ गमन ट्रस्ट बनाने का एलान किया। भाजपा चुनाव जीती और डॉ. मोहन यादव ने मुख्यमंत्री बनते ही ट्रस्ट गठन के 7 महीने बाद चित्रकूट में पहली बैठक ली। हालांकि ट्रस्ट में शामिल 33 सदस्यों में से 5 अशासकीय सदस्यों की नियुक्ति अभी तक नहीं हुई है। वर्तमान में परियोजना का यह हाल है कि इसे फाइलों से जमीन पर उतारने में भी एक वर्ष से अधिक का समय लगने वाला है।

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में राम वनगमन परियोजना तीन चरणों में पूरी होना है जिसमें प्रथम चरण में चित्रकूट के कामदगिरी परिक्रमा पथ को विकसित किया जाना है। द्वितीय चरण में चित्रकूट में ही 84 कोसी परिक्रमा पथ के विकास का रोडमैप तय है और तृतीय चरण में श्रीराम के वनवास के समय के मार्ग को विकसित करना है।

मध्य प्रदेश से ज्यादा बेहतर स्थिति छत्तीसगढ की है। छत्तीसगढ़ को भगवान राम का ननिहाल माना जाता है। वनवास का अधिकांश समय उन्होंने यहीं व्यतीत किया था। यहां की लोक गाथाओं में श्रीराम के वनवास के वर्षों का जिक्र मिलता है। छत्तीसगढ़ सरकार ने अपने यहां श्रीराम के मार्गों को चिन्हित करते हुए राम वनगमन परिपथ परियोजना को केंद्र की रामायण सर्किट परियोजना में शामिल करने का प्रस्ताव भेजा था किंतु इसे मंजूरी नहीं मिली तो तत्कालीन भूपेश बघेल सरकार ने अपने दम पर इस परियोजना का काम आगे बढ़ाया।

परियोजना के लिए 75 स्थलों की पहचान की गई जहां श्रीराम के चरण पड़ने के साक्ष्य मिले हैं। परियोजना के प्रथम चरण में 9 स्थानों का विकास हो चुका है जिनमें सीतामढ़ी-हरचौका (कोरिया) में 7 करोड़ 45 लाख रुपये की लागत से राम वाटिका के अलावा श्रीराम की विशाल प्रतिमा, सियाराम कुटीर, रामायण व्याख्या केंद्र, कैफेटेरिया, पर्यटक सूचना केंद्र आदि का निर्माण पूर्ण हो चुका है। रायपुर जिले के चंदखुरी के कौशल्या मंदिर में श्रीराम बाल रूप में अपनी माता की गोद में विराजमान हैं। मंदिर को भव्य स्वरूप दिया गया है।

वहीं रामगढ़ में श्रीराम की भव्य प्रतिमा की स्थापना की गई है तो जांजगीर-चांपा में सौंदर्यीकरण का कार्य चल रहा है। लोक मान्यता है कि यहीं राम-लक्ष्मण ने माता शबरी के जूठे बेर खाए थे। इसके अलावा राजिम, धमतरी, सुकमा, जगदलपुर, बलौदाबाजार में विकास एवं सौंदर्यीकरण कार्य तेजी से किए जा रहे हैं। हालांकि यहां भी परियोजना भाजपा-कांग्रेस की राजनीति का शिकार रही है और सरकार बदलने के बाद इसकी गति इसका भविष्य तय करेगी।

लेकिन अब समय आ गया है कि राम वनगमन पथ परियोजना को राम मंदिर की तरह ही युद्धस्तर पर पूरा किया जाए ताकि अगर कोई रामभक्त उस मार्ग पर जाना चाहे तो सुगमता के साथ अयोध्या से रामेश्वरम तक पहुंच जाए। भारत धर्म प्रधान लोगों का देश है और अगर इस मार्ग को जल्द से जल्द पूरा कर लिया जाता है तो न केवल रामभक्त इसके जरिए उत्तर से दक्षिण की यात्रा करेंगे बल्कि इससे राष्ट्रीय एकता और अखंडता को भी बल मिलेगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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