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जब हिन्दू धर्म के अपमान पर भड़क गए थे गांधीजी व अन्य राष्ट्रीय नेता

कुछ दिनों पहले एक फिल्मकार लीना मणिमेकलाई द्वारा देवी काली की एक आपत्तिजनक तस्वीर सोशल मीडिया पर जारी की गई। जिस पर हिंदुओं का नाराज होना स्वाभाविक था। वैसे अभिव्यक्ति की आजादी और रचनात्मकता का हवाला देकर हिन्दू देवी-देवताओं का मजाक एवं अपमान कोई नया नहीं है। वर्ष 1927 में भी ऐसा ही एक मामला सामने आया था। तब एक पुस्तक के माध्यम से हिंदुओं की आस्था को बहुत ही नकारात्मक एवं भड़काऊ तरीके से दर्शाया गया था।

When mahatma gandhi national leaders were furious over disgrace Hindu religion

उस पुस्तक का नाम 'मदर इंडिया' था, जिसमें भारतीय संस्कृति एवं परम्पराओं की गलत व्याख्या और हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान किया गया। इस पुस्तक की लेखिका एक अमेरिकी इतिहासकार, कैथरीन मेयो थी। उनका कहना था कि वह गाँधी और चीतों के अलावा भारत के बारे में कुछ नहीं जानती थी, इसलिए 1925-1926 की सर्दियों के तीन महीने भारत के दौरे पर आ गयी। इस दौरान उन्होंने जो कुछ भी देखा, उसे अपने पूर्वाग्रहों और निजी नजरिए से इस पुस्तक के रूप में पेश कर दिया।

पुस्तक मूलतः अंग्रेजी में थी लेकिन उसका भारतीय भाषाओँ जैसे हिंदी, उर्दू, बंगाली, तमिल, तेलगू में भी अनुवाद किया गया। ब्रिटिश एवं अमेरिकी प्रकाशकों द्वारा इस पुस्तक को छापा गया और अंग्रेजों द्वारा इतना जबरदस्त प्रचार किया गया कि जुलाई-दिसंबर 1927 के बीच इस पुस्तक के सात संस्करण अमेरिका और इंग्लैण्ड के बाजारों में बिक चुके थे।

मदर इंडिया के दुष्प्रचार के जवाब में बंबई की 'सिस्टर इंडिया ऑफिस' नाम की एक संस्था द्वारा 'Sister India: A Critical Examination of and A Reasoned Reply to Miss Katharine Mayo's Mother India' पुस्तक को प्रकाशित किया गया। जिसकी प्रस्तावना इस प्रकार थी, "बंबई की रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के पुस्तकालय में कुमारी मेयो की 'मदर इंडिया' की प्रति प्राप्त हुई। वहां के अनुभवी पुस्तकालय अध्यक्ष ने पाया कि पुस्तक में पाठकों के पढने जैसा कुछ भी नहीं है। जबकि वह एक रुढ़िवादी हिन्दू न होकर सामाजिक चेतना के प्रति सजग व्यक्ति थे। उन्होंने पाया कि पुस्तक में गंदगी, कीचड़ उछालना, सच को तोड़-मरोड़ना, और शालीनता का उल्लंघन किया गया है। इसलिए उन्होंने उसे अपने पुस्तकालय में रखने से मना कर दिया।"

कैथरीन की पुस्तक के कुछ अंश इस प्रकार से है: "वैष्णव तिलक के पीछे एक अश्लील अर्थ छुपा है", "हिन्दू धर्म में जीवित रहने के लिए प्रेरणा नहीं रह जाती। उसमें सब पदार्थ 'माया' बताये गए है; असंख्य योनियों का जिक्र है - संसार को असार बतलाया है और निसंदेह इनके पतन का यह भी एक कारण अवश्य है", और "हिन्दू महिलाओं के ज्ञान की सीमा केवल यहाँ तक सीमित होती है कि घर में देवताओं की पूजा किस तरह की जाए।"

कैथरीन, कलकत्ता के कालीघाट स्थित देवी काली के मंदिर भी गयी, जहां उन्होंने देवी की आध्यात्मिक शक्ति के स्थान पर सिर्फ गंदे फूल, पशु हत्या, पागल आदमी, फालतू लड़के, गन्दी नालियां, भिखारी को ही अपनी पुस्तक में जगह दी। यही नहीं, उन्होंने तो यहाँ तक लिखा कि भारत के मंदिरों में अश्लील मूर्तियाँ होती है, जिसके कारण भारतीय युवाओं में भी अश्लीलता बढ़ रही है।

कैथरीन ने भारत और यहां रहने वाले हिन्दुओं की यह नकारात्मक छवि ब्रिटिश सरकार के कहने पर प्रचारित की थी। दरअसल, हम सब जानते है कि सम्पूर्ण भारत तब ब्रिटिश सरकार से स्वशासन और स्वाधीनता की लड़ाई लड़ रह था। चूँकि ब्रिटिश क्राउन इस मांग लेकर असहज था। इसलिए हमेशा यही कुतर्क किया जाता था कि भारत के लोग स्वशासन करने के लिए सक्षम ही नहीं है। अतः दुनियाभर में भारत की कमजोर छवि बनाने के हरसंभव प्रयास किये गए, जिसमें से एक हथकंडा यह एक पुस्तक भी थी।

लाला लाजपत राय अपनी पुस्तक 'अनहैप्पी इंडिया' में लिखते है, "मिस मेयो की भारत यात्रा स्वतः स्फूर्त नहीं थी। उन्हें निहित स्वार्थ वाले अंग्रेजों द्वारा भारत आने का आग्रह किया गया था। जो सोचते हैं कि भारत में स्वशासन उनके लिए एक खतरा है।"

लाला लाजपत राय ने अंग्रेजो के नस्लवाद को भी उजागर करते हुए लिखा कि "मेयो की मानसिकता एशिया के काले या भूरे लोगों के खिलाफ श्वेत जातियों की मानसिकता दिखाती है। पूर्वी देशों की जागृति ने यूरोप और अमेरिका दोनों को डरा दिया है। इसलिए इतनी प्राचीन और इतनी सुसंस्कृत संस्कृति के खिलाफ जानबूझकर अध्ययन कर कुख्यात प्रचार का किया गया है।"

महात्मा गांधी ने भी यंग इंडिया में 15 सितम्बर 1927 को लाजपत राय का यह कहते हुए समर्थन किया कि कैथरीन के मन में पहले ही धारणा बनी हुई थी और उन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा समर्थन दिया गया था। गाँधीजी ने तो यहाँ तक लिख दिया कि "पुस्तक पढ़कर मुझे लगा कि यह एक नाली-निरीक्षक की रिपोर्ट है। जिसने देश के बारे में वास्तविकता न बताकर बस उस देश की नालियों की जानकारी दी है।"

वास्तव में, कैथरीन ने तब जो किया वही लीना ने आज किया है। लीना ने भी देवी काली की तस्वीर को कीचड़ उछालकर, सच को तोड़-मरोड़कर, और शालीनता का उल्लंघन कर प्रस्तुत किया। जैसे कैथरीन को ब्रिटिश और अमेरिकी सरकारों ने प्रोत्साहित किया वैसे ही लीना को उसी हिन्दू-विरोधी मानसिकता ने घेरा हुआ है। बस अंतर इतना है कि उस दौर में सभी ने कैथरीन का एकस्वर में विरोध किया लेकिन आज राजनीतिक तुष्टिकरण के चलते ऐसा करने की हिम्मत सभी में नहीं है।

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(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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