जनसंख्या असंतुलन पर योगी ने उठाया सही सवाल
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक बयान के बाद देश में जनसंख्या वृद्धि की समस्या एक बार फिर चर्चा में आ गई है। योगी ने जनसंख्या नियंत्रण एवं जनसांख्यिकीय असंतुलन को लेकर कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाये हैं।

योगी ने कहा है कि जनसंख्या नियंत्रण का कार्यक्रम सफलतापूर्वक आगे बढ़ना चाहिए, लेकिन इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि जनसांख्यिकीय असंतुलन की स्थिति पैदा ना हो। ऐसा ना हो कि मूल निवासियों की जनसंख्या कम हो जाये और किसी एक वर्ग की आबादी बढ़ती चली जाये, इससे अराजकता फैलने का खतरा रहता है। जिन देशों की जनसंख्या ज्यादा होती है, वहां जनसंख्या असंतुलन चिंता का विषय है, क्योंकि रिलीजियस डेमोग्राफी पर भी इसका असर पड़ता है। एक समय के बाद वहां अव्यवस्था और अराजकता जन्म लेने लगती है।
योगी आदित्यनाथ के बयान के बाद इस विषय को लेकर पूरे देश में बहस छिड़ गई है। राजद नेता तेजस्वी यादव ने चीन का हवाला देते हुए कहा कि चीन की जनसंख्या ज्यादा है फिर वह बेहतर कैसे कर रहा है? भारत को इस दिशा में सोचना चाहिए। एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि "देश में जनसंख्या नियंत्रण के लिये किसी कानून की जरूरत नहीं है।"
दरअसल, विपक्षी दल धार्मिक जनसांख्यिकीय असंतुलन की असली समस्या की अनदेखी कर इसे केवल जनसंख्या वृद्धि के तौर पर बहस का एजेंडा सेट करने की कोशिश कर रहे हैं। योगी धर्म के आधार पर बढ़ते जनसांख्यिकीय असंतुलन को लेकर लंबे समय से सवाल उठाते रहे हैं। खासकर उत्तर प्रदेश में भारत-नेपाल के सीमावर्ती जिलों में बढ़ते धार्मिक जनसांख्यिकीय असंतुलन को लेकर वह बीते दो दशक से लगातार सड़क से लेकर संसद तक अपनी आवाज बुलंद करते रहे हैं।
जनसंख्या वृद्धि दर तो भारत की चिंता का विषय है ही, धार्मिक असंतुलन उससे भी बड़ी समस्या है। देश के जिन राज्यों में धार्मिक आधार पर असंतुलन पैदा हुआ, वहां अराजकता एवं अव्यवस्था जैसी समस्याएं पैदा हुईं। जम्मू कश्मीर और पश्चिम बंगाल में धार्मिक जनसांख्यिकीय असंतुलन ने किस कदर मूल निवासियों के जीवन पर प्रभाव डाला है, यह एक उदाहरण हो सकता है।
एक अनुमान के मुताबिक जनसंख्या के मामले में भारत 2023 में चीन को भी पीछे छोड़ देगा। वर्ष 2011 की राष्ट्रीय जनगणना के अनुसार धार्मिक आधार पर मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि दर सबसे तेज रही है। इस दौरान मुसलमानों की प्रजनन दर 3.1, हिंदुओं की 2.3, सिखों की 2.0 एवं ईसाईयों की 1.7 रहा। वर्ष 1951 में मुसलमानों की आबादी 9.8 फीसदी थी, जो वर्ष 2011 के आंकड़ों में बढ़कर 14.23 फीसदी हो गई है। 1951 में देश में मुस्लिम आबादी 3.4 करोड़ थी, जिसके 2021 में 20 करोड़ के पार कर जाने की संभावना है।
आजादी के बाद पूरे देश की डेमोग्राफी पर इस असंतुलन का असर पड़ा है और कई इलाकों में धार्मिक असंतुलन बढ़ा है। 1951 में हिंदुओं की आबादी 84.1 फीसदी थी, जो घटकर 2011 में 79.8 हो गई। साफ है कि देश में बहुसंख्यकों की जनसंख्या वृद्धि दर कम हुई है, उसके विपरीत अल्पसंख्यकों में मुसलमानों की आबादी तेजी से बढ़ रही है। अमेरिकी संस्था पीईडब्लू के अनुसार भारत में 2050 तक मुसलमानों की संख्या 31 करोड़ को पार कर जायेगी, जो इंडोनेशिया के बाद दूसरे नंबर पर होगी। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) - 5 के आंकड़ों के हवाले से कुछ बुद्धिजीवी मुसलमानों की प्रजनन दर में आई गिरावट पर गर्व करते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि मुसलमानों का टीएफआर राष्ट्रीय औसत एवं अन्य सभी धर्मों के मुकाबले ज्यादा है।
एनएफएचएस-4 में मुसलमानों का टीएफआर यानी टोटल फर्टिलिटी रेट 2.62 था जो एनएफएचएस -5 में 0.26 घटकर 2.36 हो गया। इस दौरान हिदुओं का टीएफआर 1.9, ईसाइयों का 1.88, सिखों का 1.61, जैनों का 1.6 तथा बौद्धों का 1.39 रह गया है। सभी धर्मों में केवल मुसलमानों का टीएफआर ही राष्ट्रीय औसत 2 से ज्यादा है। जो नेशनल फेमिली हेल्थ सैम्पल सर्वे के आधार मुसलमानों में प्रजनन दर में आयी कमी का हवाला दे रहे हैं, उनसे यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि मुसलमानों में प्रजनन दर राष्ट्रीय औसत से अधिक क्यों है? क्या इससे जनसांख्यिकी असंतुलन नहीं पैदा होगा?
योगी आदित्यनाथ की चिंता देखी जाये तो उत्तर प्रदेश की बढ़ती आबादी और असंतुलन निश्चित तौर पर बड़ी समस्या है। विश्व में केवल चीन, भारत, अमेरिका, इंडोनेशिया और ब्राजील की जनसंख्या उत्तर प्रदेश से ज्यादा है। अनुमान है कि 2021 के आंकड़ों के बाद उत्तर प्रदेश जनसंख्या के मामले में ब्राजील को भी पीछे छोड़ कर 191 देशों से अधिक आबादी वाला राज्य हो जायेगा। यूपी की आबादी 24 करोड़ से ज्यादा हो जायेगी। 2011 के आंकड़ों के अनुसार राज्य की जनसंख्या 19.98 करोड़ थी, जिसमें 15.94 करोड़ हिंदू एवं 3.85 करोड़ मुसलमान थे। उत्तर प्रदेश देश का सर्वाधिक मुस्लिम आबादी वाला राज्य है और अन्य धर्मों के मुकाबले मुसलमानों में प्रजनन दर अधिक होने के चलते राज्य का धार्मिक संतुलन लगातार बदल रहा है।
उत्तर प्रदेश में साल 2001 की जनगणना आंकड़ों के अनुसार 80.61 फीसदी हिंदू तथा 18.50 फीसदी मुसलमान थे। 2011 के जनगणना में हिंदुओं की आबादी घटकर 79.73 फीसदी हो गई, जबकि मुसलमानों की आबादी बढ़कर 19.26 फीसदी तक पहुंच गई। 2021 के जनगणना में इसमें और अधिक अंतर आने का अनुमान है।
आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में से 57 जिलों में हिंदुओं की आबादी मुसलमानों के मुकाबले धीमी गति से बढ़ रही है। इससे कई जिलों में धार्मिक आधार पर जनसांख्यिकीय असंतुलन बढ़ रहा है। देश में केवल पांच राज्य हैं, जिनका प्रजनन दर राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। इसमें सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश भी शामिल है, जिसका टोटल फर्टिलिटी रेट 2.4 है। 2011 के जनगणना में उत्तर प्रदेश में हिंदुओं का टीएफआर 2.6 था, जबकि इस दौरान मुसलमानों का टीएफआर 2.9 रहा।
नेशनल फेमिलि हेल्थ सर्वे-5 में हिंदू एवं मुसलमान के अलग-अलग प्रजनन दर वाले आंकड़े जारी नहीं किये गये है, लेकिन राष्ट्रीय औसत की तरह यूपी में मुसलमानों का टीएफआर हिंदुओं से ज्यादा रहने का अनुमान है। नये आंकड़े 2021 की जनगणना के बाद सामने आयेंगे, लेकिन यूपी में बढ़ती जनसंख्या और धार्मिक असंतुलन निश्चित ही चिंता का विषय है। यूपी में भी मुसलमानों के टीएफआर में गिरावट आई है, लेकिन वह अब भी दूसरे धर्मों के मुकाबले ज्यादा बच्चे पैदा कर रहे हैं। योगी की चिंता भी यही है कि अन्य धर्मों के मुकाबले मुसलमानों के ज्यादा बच्चे पैदा करने से राज्य में धार्मिक जनसांख्यिकीय असंतुलन पैदा हो रहा है।
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(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)
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